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Channel: महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)
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How and Why MAGGI Banned in India

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जानिये... "मैगी"पर प्रतिबन्ध क्यों? 

अमेरिका में वहाँ की खाद्य मानक संस्थाएँ और उनके नियम इतने कठोर हैं कि कोई कोई कम्पनी इस प्रकार की हरकत के बारे में सोच भी नहीं सकती. भारत में यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. विदेश से आने वाली कम्पनियाँ हों या भारतीय कम्पनियाँ, मानक-नियम-क़ानून-सुरक्षा आदि के बारे में रत्ती भर भी परवाह नहीं करतीं. युनियन कार्बाईड (Union Carbide) मामले में हम देख चुके हैं कि हजारों मौतों और लाखों को विकलांग बना देने के बावजूद कम्पनी के कर्ताधर्ताओं का बाल भी बाँका न हुआ. भारत में जमकर रिश्वतखोरी होती है, और जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ जारी रहता है. चीन से आने वाले बेबी पावडर में भी "मेलामाइन"पाए जाने की रिपोर्ट भी सार्वजनिक हो चुकी हैं. चूँकि ताज़ा मामला हाई-प्रोफाईल "मैगी"से जुड़ा है, इसलिए इतना हो-हल्ला हो रहा है (हालाँकि रिपोर्ट में जहर पाए जाने के बावजूद कुछ "पत्रकार"मैगी की तरफदारी कर रहे हैं). वास्तव में आज की तारीख में कोई नहीं जानता कि भारत में बिकने वाली खाद्य सामग्री अथवा पैकेटबंद भोजन में कितना जहर है? कितना मोम है? कितना प्लास्टिक है? जब इसके भयानक नतीजे सामने आना शुरू होते हैं तब तक देर हो चुकी होती है.

मैगी की धोखाधड़ी और झूठ के बारे में कुछ चित्रों में सरलता से समझाया गया है, इसे देखें और सोचें कि क्या वास्तव में हम "महाशक्ति"बनने की ओर अग्रसर हैं?? महाशक्ति अपने नागरिकों का कैसा ख़याल रखती हैं, यह हम जानते हैं...



























(चित्र साभार :- दैनिक भास्कर.com)


Foundation Year of Cultural Nationalism in India

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव का एक वर्ष...


कल्पना कीजिए उस दिन की, जब आगामी 21 जून को “विश्व योग दिवस” के अवसर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध क्षेत्र अर्थात “राजपथ” पर रायसीना हिल्स के राष्ट्रपति भवन से लेकर ठेठ इण्डिया गेट तक हजारों बच्चे भारतीय ऋषियों की सर्वोत्तम कृतियों में से एक अर्थात “योगाभ्यास” का प्रदर्शन करें और उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हों. ज़ाहिर है कि इस विराट आयोजन का टीवी प्रसारण होगा, तथा “विश्व योग दिवस” के बारे में देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों एवं पुस्तकों में इसका उल्लेख किया जाएगा. इसका सामान्य जनमानस पर कैसा प्रभाव पड़ेगा? स्वाभाविक रूप से “योग” (जो अमेरिका रिटर्न होकर “योगा” बन गया है) के बारे में सामान्य भारतीय जनमानस, स्कूली बच्चों तथा युवाओं में एक सकारात्मक छवि बनेगी. योग पर चर्चाएँ होंगी, शोध होंगे, योग को लेकर भ्रान्तियाँ दूर होंगी तथा अमेरिका से वापस लौटा हुआ “योगा” पुनः एक बार विश्व पटल पर “योग” के रूप में स्थापित होगा.

एक वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत से केन्द्र में सरकार बनाई, तब इसके प्रखर आलोचक बुद्धिजीवियों(?) एवं पत्रकारों ने अल्पसंख्यकों को डराते हुए कहा था कि मोदी के आने देश में दंगे हो जाएँगे, साम्प्रदायिक सदभाव बिगड़ जाएगा और देश के सेकुलर ताने-बाने को क्षति पहुंचेगी. मोदी सरकार का एक वर्ष बीत चुका है, अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है और ना ही होने की कोई संभावना है. अलबत्ता नरेंद्र मोदी एवं संघ परिवार ने वामपंथियों एवं मिशनरियों से सबक सीखते हुए बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के क्षेत्र में कई ऐसी पहल शुरू की हैं, जिसके निश्चित रूप से दूरगामी परिणाम होंगे.अब सबसे पहला सवाल उठता है कि “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” अर्थात क्या? इसका अर्थ समझने के लिए हमें पिछले साठ वर्ष की सरकारों और उनकी नीयत तथा षड्यंत्र के बारे में संक्षेप में जानना-समझना होगा.

देश हो, समाजसेवा हो, अर्थशास्त्र हो या शिक्षा क्षेत्र हो... सभी क्षेत्रों में प्रतीकों एवं कर्मकाण्डों का अपना महत्व होता है. यदि प्रतीकों एवं सार्वजनिक क्रियाओं को योजनाबद्ध तरीके से संचालित एवं प्रचलित किया जाए, तो वे मनुष्य एवं समाज के अवचेतन मन पर अमिट छाप छोड़ते हैं. उदाहरण स्वरूप बात करें दिल्ली की. जब कभी चर्चाओं में, लेखन में अथवा सन्दर्भों में दिल्ली की बात होती है तो हमारी आँखों के समक्ष अथवा अवचेतन मन में लाल किले या कुतुबमीनार का चित्र उभरता है. ऐसा इसलिए होता है कि अभी तक पिछले साठ वर्षों में शासकीय कार्यक्रमों, सरकारी कर्मकाण्डों तथा वामपंथी प्रभुत्व वाले पाठ्यक्रमों में पिछली चार पीढ़ियों के दिमाग पर लाल किले और कुतुबमीनार के चित्रों को बड़ी सफाई और चतुराई से उकेरा गया है. पिछले कई वर्षों से हमें वही दिखाया-पढ़ाया-सुनाया गया है, जो भारत की “तथाकथित” सेकुलर-वामपंथी विचारधारा के “तथाकथित बुद्धिजीवियों” ने अपने राजनैतिक आकाओं के निर्देश पर जारी किया. 

तात्पर्य यह कि, जो भी सरकारें आती हैं, वे केन्द्र अथवा राज्यों में अपनी-अपनी विचारधाराओं तथा राजनैतिक लाभ-हानि के अनुसार पाठ्यक्रम, छवियाँ, प्रतीक रचती रही हैं. दुर्भाग्य से देश के स्वतन्त्र होने के पश्चात “राष्ट्रवादी विचारधारा” कही जा सकने वाली, पाँच-दस वर्ष की टूटी-फूटी सरकारों के अलावा सभी सरकारें (एवं उनके समर्थक दल) ऐसी रही हैं जिन्होंने अपने वोट बैंक के लिए छद्म सेकुलरिज़्म का सहारा लिया. भारतीय इतिहास को विकृत करने वाले इतिहासकारों को प्रमुख पदों पर बैठाया तथा हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, भारतीय संस्कृति जैसे शब्दों से घृणा करने वाले कथित बुद्धिजीवियों को पुरस्कृत-उपकृत किया. नतीजा यह हुआ कि भारत के विभिन्न पाठ्यक्रमों तथा चार पीढ़ियों के अवचेतन मानस पर ऐसी छवि रच दी गई मानो भारत सिर्फ पराजितों का देश है... ऐसा माहौल बनाया गया मानो अंग्रेजों के आने से पहले भारत में कुछ होता ही नहीं था... यह झूठ प्रचारित किया गया कि विश्व को देने के लिए भारत के पास कुछ नहीं था. 

यहीं आकर नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे कठिन एवं नई चुनौती आरम्भ हुई. भारत के प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने, भारतीय इतिहास के सच्चे नायकों को उनका उचित सम्मान दिलवाने तथा भारत की संस्कृति द्वारा समूचे विश्व को जो अनुपम एवं अनूठा ज्ञान और विचारधारा प्रदान की थी उसका पुनः प्रचार-प्रसार करने की महती जिम्मेदारी को ही “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” कहा जाना चाहिए. पिछले एक वर्ष में भाजपा सरकार ने इस मुद्दे के अनेक पहलुओं पर जमकर काम किया है और धीरे-धीरे अगले पाँच वर्ष में इसके मजबूत परिणाम दिखाई देने लगेंगे. 


नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज ने भारतीय संस्कृति की दो सबसे प्रमुख धरोहरों अर्थात “गीता” एवं “योग” पर सबसे पहले काम शुरू किया. विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने सबसे पहले गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की सुरसुरी छोड़ी और साथ ही यह भी कह दिया कि यह सरकार की प्राथमिकता एवं प्रक्रिया में है.उन्होंने गीता की वकालत करते हुए यह भी कहा कि मनोचिकित्सकों अपने मरीजों का तनाव दूर करने के लिए उन्हें दवाई के साथ-साथ गीता पढ़ने का परामर्श भी देना चाहिए। इससे भी एक कदम आगे बढ़ाते हुए हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खटटर ने मांग की कि गीता को संविधान से ऊपर माना जाना चाहिए। ज़ाहिर है कि नई-नवेली सरकार के इस कदम से सेकुलरिज़्म के पुरोधा भौंचक्के रह गए और उन्हें समझ में नहीं आया कि इसका विरोध कैसे करें? वास्तव में देखा जाए तो सुषमा स्वराज का यह बयान आकस्मिक और आश्चर्यजनक ही था. आकस्मिक इस अर्थ में कि गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने सम्बन्धी कोई बहस या चर्चा देश में नही चल रही थी और न ही इस आशय की कोई मांग किसी पक्ष की ओर से आई थी. फिर क्या था, लोकसभा की अप्रत्याशित चुनावी हार से तिलमिलाए समूचे विपक्ष ने बवण्डर खड़ा कर दिया... गीता को धार्मिक ग्रन्थ कहा गया, फिर भाजपा-संघ के कथित साम्प्रदायिक एजेण्डे की आलोचना की गई, मुस्लिमों के संगठनों पर दबाव बनाकर उनसे यह कहलवाया गया कि यदि गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया गया तो कुरआन और बाईबल को भी किया जाए. जमकर बहस-मुबाहिसे हुए, अखबारों ने गीता के मुद्दे पर अपने पन्ने रंगे, विभिन्न चैनलों पर इस विषय को लेकर आपसी जूतमपैजार भी हुई. लेकिन इससे जनता के बीच भगवतगीता को लेकर जो “छिपा हुआ सन्देश” पहुंचना चाहिए था, वह बराबर पहुँचा. 

इसके पश्चात नरेंद्र मोदी का नंबर आया. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने उजागर एजेण्डे के तहत उन्होंने अपने प्रत्येक विदेश यात्राओं में सभी देशों के शासनाध्यक्षों को गीता की प्रति भेंट करना शुरू किया. तत्काल ही विदेशी शासकों को भी समझ में आने लगा, कि भारत में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि “और भी बहुत कुछ बदला” है और आगे और भी बदलने वाला है.नरेंद्र मोदी ने जापान के सम्राट और वहाँ के प्रधानमंत्री दोनों को गीता की प्रति भेंट की. इसके बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी बहुचर्चित अमेरिका यात्रा के दौरान ओबामा दम्पति को भी गीता भेंट की. 

इधर जमीनी स्तर पर RSS भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाले इस कदम के साथ ताल में ताल मिलाकर चलने लगा. आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने घोषित किया कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी 2 दिसंबर को है और इस दिन “गीता जयंती” है। उनके मुताबिक इस दिन भगवतगीता अवतरण के 5151 साल पूरे होते हैं। आरएसएस नेता के अनुसार कलि कैलंडर के हिसाब से यह कलयुग का 5116 साल चल रहा है और गीता उससे 35 साल पहले लिखी गई थी. अतः भगवतगीता पर भारत में पहली बार एक विराट कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसका आयोजन आरएसएस से जुड़ी संस्था “ग्लोबल इंस्पिरेशन एंड इंलाइटमेंट ऑफ भगवत गीता (जियो गीता)” संस्था ने किया. 

विगत 2 दिसंबर को गीता के रचियता वेद व्यास की तस्वीर वाला डाक टिकट जारी किया गया. इस अवसर पर महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों जिन्होंने गीता को अपने जीवन में विशेष महत्व दिया, उनके परिजनों को भी लाल किले के समारोह में 7 दिसंबर को सम्मानित किया गया. अलग-अलग देशों से गीता की पांडुलिपियां भी मंगाई गईं. इन्हें एक विशेष प्रदर्शनी में लगाया गया. इस समारोह में 5151 जोड़े उपस्थित थे और 5151 युवक-युवतियां भी जिन्होंने अनुष्ठान करके गीता का पाठ किया. इसी समारोह में यहां 'विदेशी चिंतक और गीता', 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गीता का योगदान', 'गीता पांडुलिपि', 'गीता स्किल ऐंड मैनेजमेंट'विषय पर प्रदर्शनी भी लगाई गई. कहने का तात्पर्य यह कि जिस भगवतगीता को भारत की पूर्व सरकारों ने कभी भी समुचित स्थान, प्रचार एवं यथोचित सम्मान नहीं दिया था, भाजपा की इस सरकार ने मात्र एक वर्ष के अंदर गीता को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति का चमकता हुआ ब्राण्ड बना दिया. यही तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है... और जैसा कि मैंने ऊपर लिखा, प्रतीकों, स्मारकों, चित्रों, शासकीय कर्मकाण्डों का जनमानस पर बहुत प्रभाव पड़ता है... ठीक वैसा ही इस मामले में भी हुआ. 

गीताज्ञान एवं अध्यात्म के बारे में छात्रों का ज्ञान बढ़ाने तथा नैतिक बल के उत्थान के लिए मुम्बई महानगरपालिका के सभी स्कूलों में अब भगवदगीता पढ़ाई जाएगी. बृहन्मुंबई महानगरपालिका (एमसीजीएम) के निगम उपायुक्त ने कहा, कि हम छात्रों को स्वतंत्र बनाने और फैसला लेने की उनकी क्षमता को और धार देने के लिए उन्हें भगवदगीता की जानकारी देंगे. इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कष्णा कॉन्श्सनेस (इस्कॉन) की ओर से 15 मार्च को आयोजित गीता चैंपियन लीग प्रतिस्पर्धा के पुरस्कार वितरण समारोह में उन्होंने यह बात कही। एक प्रेस विज्ञिप्ति के मुताबिक, रामदास ने कहा कि एमसीजीएम के अंतर्गत 1,200 स्कूल हैं और कुल 4,78,000 छात्र हैं। कुल 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से नौ क्षेत्रीय भाषाओं में बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है। गिरगांव चौपाटी में इस्कॉन के राधा गोपीनाथ मंदिर के आध्यात्मिक गुरू राधानाथ स्वामी ने कहा, हमारे बच्चे हमारा भविष्य हैं. जरूरत इस बात की है कि हम उनकी सुरक्षा करें, भारतीय संस्कृति के बारे में उनका ज्ञानवर्धन करें और समझ विकसित करें। उन्होंने कहा कि भगवदगीता के पाठ से उनमें सकारात्मक सोच विकसित होगी और छात्रों को केंद्रित रहकर नैतिक फैसले लेने में मदद मिलेगी. मोदी-सुषमा के इन प्रयासों पर अंतिम “मास्टर-स्ट्रोक” तब लगा, जब मुम्बई में एक मुस्लिम बच्ची ने भगवतगीता पाठ की चैम्पियनशिप जीत ली. सेकुलरिज्म के पुरोधाओं की गहन चुप्पी से उनकी निराशा भी हाथोंहाथ प्रकट हो गई. 



भारतीय संस्कृति की दूसरी सबसे प्रमुख धरोहर अर्थात “योगाभ्यास” पर भी भाजपा की इस सरकार ने देश-विदेश में कई अभूतपूर्व कार्य किए. जैसा कि सर्वविदित है बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान काण्ड के बाद काँग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था और इस हेतु उन्होंने एक वर्ष तक दस हजार सभाएँ कीं और योग की कक्षाएं लेते-लेते जनता को जागरूक भी करते रहे. वैसे तो योग हजारों साल से भारतीयों की जीवन-शैली का हिस्सा रहा है. दुनिया के कई हिस्सों में इसका प्रचार-प्रसार हो चुका है. कई प्राचीन योगियों तथा योगाचार्य स्वर्गीय श्री अयंगार जैसे कई योगियों सहित बाबा रामदेव ने “योग” को पहले ही अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिला दी थी. परन्तु जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने विश्व पटल पर आक्रामक अंदाज में योग की मार्केटिंग और पैरवी की वह अदभुत था. गौरतलब है कि बीते 27 सितंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रस्ताव पेश किया था कि संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा था कि भारत के लिए प्रकृति का सम्मान अध्यात्म का अनिवार्य हिस्सा है. भारतीय प्रकृति को पवित्र मानते हैं. उन्होंने कहा था कि योग हमारी प्राचीन परंपरा का अमूल्य उपहार है. संयुक्त राष्ट्र में अपना प्रस्ताव रखते वक्त मोदी ने योग की अहमियत बताते हुए कहा था, कि 'योग मन और शरीर को, विचार और काम को, बाधा और सिद्धि को ठोस आकार देता है. यह व्यक्ति और प्रकृति के बीच तालमेल बनाता है. यह स्वास्थ्य को अखंड स्वरूप देता है. यह केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य के बीच की कड़ी है. यह जलवायु परिवर्ततन से लड़ने में हमारी मदद करता है. 

मोदी की इस अपील को मानते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को “विश्व योग दिवस” मनाने का ऐलान किया है. यह निश्चित रूप से भारतीयों एवं भारतीय संस्कृति के लिए गर्व की बात है. यूएन की इस घोषणा के बाद अब इसका फैलाव और तेजी से होने की उम्मीद है. भारत के नेतृत्व में रिकॉर्ड 177 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था. 

प्राप्त सूचना के अनुसार सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजपथ पर योग करेंगे. इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ 16 हजार स्कूली छात्र-छात्राएं भी राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक योग करते नजर आएंगे. खास बात यह है कि इस दौरान राजपथ पर दोनों ओर बड़ी तादाद में देशी और विदेशी योग साधक भी मौजूद रहेंगे। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर होने वाले इस आयोजन का जिम्मा “आयुष मंत्रालय” को सौंपा गया है। इसके लिए मंत्रालय ने अपनी तैयारियां भी शुरु कर दी हैं। मंत्रालय मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान से प्राणायाम के आसनों का एक वीडियो भी तैयार करा रहा है। वीडियो का इस्तेमाल योग के प्रचार प्रसार में किया जाएगा ताकि कोई भी व्यक्ति इस वीडियो के जरिए योग के तमाम आसनों को आसानी से सीख सकें। इन सभी तैयारियों के लिए एक विशेषज्ञ समिति भी बनाई गई है। जिसमें व्यास योग इंस्टीट्यूट, बंगलुरू के प्रमुख एस. व्यास और डॉ. ईश्वर वी. वासव रेड्डी शामिल हैं. 

योग दिवस के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का मई आखिर से प्रचार -प्रसार किया जाएगा। इसके लिए होर्डिंग्स, टीवी और अखबारों में विज्ञापन दिए जाएंगे। केंद्र की भाजपा सरकार अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने हेतु इस मौके को यादगार बनाने के लिए बड़ा कार्यक्रम कर रही है, जिसमें योग से संबंधित सिक्के और डाक टिकट भी जारी किए जा सकते हैं। सिक्कों और डाक टिकट पर योग व प्राणायाम के आसन को दर्शाने वाली तस्वीरें छापी जाएंगी. 

असल में इस तारीख के पीछे एक योग संस्थान की अहम भूमिका है जो पहले से ही 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मना रहा है। उस संस्थान का नाम है कैवल्यधाम योग संस्थान। कैवल्यधाम योग संस्थान महाराष्ट्र के लोनावाला में है और 1924 से ही योग पर प्रशिक्षण और अनुसंधान कर रहा है। कैवल्यधाम की स्थापना स्वामी कुवलयानंद ने की थी और योग पर अपने वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान के कारण कैवल्यधाम का नाम पूरी दुनिया में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। कैवल्यधाम देश में पहले ही कई सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर योग के क्षेत्र में काम कर रहा है जिसमें शिक्षण संस्था एनसीईआरटी भी शामिल है। हालांकि अमेरिका और यूरोप के कई देशों में पहले से ही विश्व योग दिवस का आयोजन होता आ रहा है लेकिन इसकी तिथियां अलग अलग होती हैं। भारत में कैवल्यधाम भी 21 जून को विश्व योग दिवस का आयोजन करता है। गत वर्ष 21 जून को उसने मुंबई में विश्व योग दिवस का आयोजन किया था। इसके तुरंत बाद 24 जून को स्वामी नारायण संप्रदाय के संतो का एक समूह प्रधानमंत्री से दिल्ली में मिला था। पहले से स्वामीनारायण संप्रदाय के साथ मिलकर योग का प्रचार प्रसार कर रहे कैवल्य धाम के प्रतिनिधि भी शामिल थे। आधिकारिक रूप से तो कोई जानकारी नहीं है लेकिन संभवत: इसी मुलाकात के दौरान 21 जून की तारीख विश्व योग दिवस के लिए सुझाई गयी जिसके बाद सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी ने 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने की अपील कर दी, जिसे दुनिया ने मान लिया। इधर हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री श्री अनिल विज ने कहा कि योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के ब्रांड एम्बेसडर स्वामी रामदेव एवं मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर की अध्यक्षता में आयोजित सभी मंत्रीगण एवं विभागाध्यक्षों की बैठक में भाग लेंगे। अनिल विज ने बताया कि बैठक में स्वामी रामदेव के साथ आचार्य बालकृष्ण भी मौजूद थे। इस बैठक में स्वामी रामदेव के साथ 21 जून को मनाये जाने वाले विश्व योग दिवस की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा हुई तथा योग दिवस को मनाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया। उन्होंने बताया कि चूँकि दुनिया में पहली बार विश्व योग दिवस मनाया जा रहा है, परन्तु हरियाणा में यह दिवस विशेष तैयारियों के साथ मनाया जाएगा। स्वामी रामदेव हरियाणा में योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए ब्रांड एम्बेसडर बनाये गये हैं, इसलिए उनकी सहमति से सभी तैयारियों को अन्तिम रूप दिया जाएगा. 

भारत के एक और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर, ब्रुसेल्स स्थित यूरोपीय संसद में 21 जून को योग दिवस के मौके पर एक विशेष योग समारोह का नेतृत्व करेंगे।यूरोपीय संसद व बेल्जियम में भारत के राजदूत मंजीव सिंह पुरी ने यूरोपीय संसद के राजनीति समूहों के सदस्यों की रजामंदी ली है तथा यूरोपीय संसद में ब्रुसेल्स योग समारोह की मेजबानी के लिए भारत के एक प्रतिनिधिमंडल को भी राजी किया। समस्त बेल्जियम व लक्जमबर्ग में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए ब्रुसेल्स स्थित भारतीय दूतावास ने योग संघ, स्कूलों तथा शिक्षकों को एक सूत्र में बांधा है। 21 जून को होनेवाले इस समारोह में यूरोपीय संसद तथा बेल्जियम के उच्च स्तरीय प्रतिनिधियों के भाग लेने की उम्मीद है. 



यह तो हुई दो प्रमुख मुद्दों अर्थात भगवतगीता और योग की बात... इनके अलावा भी सत्ता संभालने के पहले दिन से ही नरेंद्र मोदी इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के छोटे-छोटे तीरों से कथित बुद्धिजीवियों को घायल करना शुरू कर दिया था. नेपाल यात्रा के दौरान गले में रुद्राक्ष की माला, भगवा वस्त्र धारण किए हुए एवं पशुपतिनाथ मंदिर की पूजा करते हुए किसी प्रधानमंत्री को आज तक भारत की युवा पीढ़ी ने कभी देखा ही नहीं था, इसलिए सभी का अचंभित होना स्वाभाविक था. गंगा आरती में शामिल होना हो, अथवा दक्षिण एशियाई देशों के दौरे पर वहाँ स्थिति शिव मंदिरों में पूजन-अर्चन करना हो...नरेंद्र मोदी ने पुरानी सरकारों की तरह “वोट बैंक की राजनीति” की परवाह न करते हुए सभी हिन्दू धार्मिक कर्मकाण्ड सार्वजनिक रूप से किए, और जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ “छवियों” तथा “प्रतीकों” का जनमानस के मनोभावों पर गहरा प्रभाव पड़ता है.नरेंद्र मोदी जिस भी देश में जाते हैं, वहाँ की मूल संस्कृति को भारत के किसी सांस्कृतिक प्रतीक से जोड़ने का प्रयास अवश्य करते हैं. इसका कूटनीति पर भले ही अधिक प्रभाव ना पड़े, परन्तु उस देश की जनता पर सकारात्मक परिणाम होता है. उदाहरण स्वरूप हाल ही में मंगोलिया की यात्रा के दौरान वहाँ की संसद को संबोधित करते हुए मोदी ने मंगोलिया के राष्ट्रीय प्रतीक में स्थित कमल के फूल को भाजपा और भारत की संस्कृति से जोड़ा... इसी प्रकार दक्षिण कोरिया की यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने दो हजार वर्ष पूर्व अयोध्या की राजकुमारी सूर्यरत्ना द्वारा दक्षिण कोरिया की यात्रा एवं कोरियाई राजा किम सुरो से उनके विवाह की चर्चा छेड़ दी. नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत-दक्षिण कोरिया के रिश्ते बहुत प्राचीन हैं, इन्हें और मजबूत बनाना होगा. इस तरह सांस्कृतिक उद्धरणों के जरिये उस देश की जनता के दिल तक पहुँचने का यह अंदाज़ निराला है. इसके अलावा नरेंद्र मोदी श्रीलंका जैसे बौद्ध बहुल देश में बौद्ध भिक्षुओं के समक्ष शीश नवाते अथवा चीन में बौद्ध एवं हान सम्प्रदाय के मठों में धार्मिक क्रियाएँ करते देखे जाते हैं. चीन दौरे के प्रतिफल में नरेंद्र मोदी ने बहुप्रतीक्षित मानसरोवर मार्ग को खुलवाने की सहमति हासिल कर ली. अब भारतीय श्रद्धालुओं को अपेक्षाकृत आसान रास्ते से सीधे गाड़ियों के सहारे मानसरोवर की धार्मिक यात्रा करने का सुख मिलेगा. यह सारे उपक्रम उसी राष्ट्रवाद का एक हिस्सा हैं जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार बड़ी सफाई से इस युवा पीढ़ी के दिमाग में बैठाना चाहती है. गत चार मई को बुद्ध पूर्णिमा पर जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने विशाल पैमाने पर तालकटोरा स्टेडियम में बौद्ध धर्मगुरुओं का सम्मेलन एवं सम्मान समारोह आयोजित किया, उससे कई कथित दलित चिंतकों एवं जातिवादी नेताओं के माथे पर बल पड़ गए. 

हाल ही में मध्यप्रदेश के नर्मदा किनारे रावेरखेड़ी ग्राम में मराठा साम्राज्य के अपराजेय योद्धा बाजीराव पेशवा की समाधि पर उनकी पुण्यतिथि मनाई गई. मैं भी इस समारोह में उपस्थित था. वहाँ पर जानकारी मिली कि सरदार सरोवर एवं इंदिरा सागर बाँधों के जलभराव के कारण बाजीराव पेशवा की यह समाधि नर्मदा नदी के डूब क्षेत्र में आने वाली थी. स्थानीय ग्रामीणों तथा हिंदूवादी संगठनों के पदाधिकारियों ने पूर्ववर्ती UPA सरकार के समक्ष इस समाधि को बचाने की गुहार लगाई, परन्तु ठेठ प्रधानमंत्री स्तर तक पहुँचने के बावजूद कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. ऐसा लग रहा था मानो काँग्रेस की सरकार ने बाजीराव पेशवा के अंतिम स्मृति चिन्ह को खत्म करने की ठान ली हो. परन्तु ईश्वर की कृपा से केन्द्र में सरकार बदली, बाजीराव पेशवा की इस समाधि के नदी तरफ वाले हिस्से पर चालीस फुट ऊँची “रिटेन वाल” बनाई गई ताकि डूब में आने के समय नर्मदा का पानी अंदर प्रवेश ना करे. “तुगलक से लेकर औरंगजेब तक को महान बताने वाली पिछली सरकार के कर्ताधर्ताओं के लिए यह एक मानसिक झटका ही कहा जाएगा. 



भारत के गौरवशाली इतिहास को जानबूझकर विकृत करने तथा भारतीय राजाओं को “सदैव पराजित एवं अपमानित” दर्शाकर कई पीढ़ियों को मानसिक गुलाम बनाने तथा हीनभावना से ग्रसित करने का जो षड्यंत्र वामपंथी इतिहासकारों ने पिछले पचास वर्ष में लगातार चलाया था, अब इस मोदी सरकार में उसका खात्मा करने का वक्त आ गया है. भारतीय इतिहास शोध परिषद् (ICHR) की सलाहकार समिति से रोमिला थापर एवं इरफ़ान हबीब जैसे कथित इतिहासकारों को निकाल बाहर किया गया है. भाजपा सरकार की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर शपथ ग्रहण करते ही पहले दिन से जिस तरह वैचारिक हमले और बेसिरपैर की आलोचनाएँ हुईं वह कथित इतिहासकारों की उसी छटपटाहट का नतीजा है. हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बयान देकर पुनः खलबली मचा दी कि यदि अकबर महान माना जा सकता है तो महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं मानना चाहिए? राजनाथ सिंह ने कहा की महाराणा प्रताप ने बादशाह अकबर से हार ना मानते हुए अंत समय तक उनसे मुकाबला किया। वे चाहते तो बादशाह से संधि करके अपने प्राण बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया तथा अपने प्राणों की आहुति देना अधिक मुनासिब समझा. इसीलिए मैं स्वयं उन्हें महान मानता हूँ. उन्होंने कहा, कि ‘इतिहास को सही संदर्भों में पेश किया जाना चाहिए. महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे, मराठा साम्राज्य एवं विजयनगरम साम्राज्य को आने वाली पीढ़ियों के समक्ष एक मिसाल के रूप में पेश किया जाना चाहिए, जिससे देश को प्रेरणा मिलेगी। अर्थात विभिन्न पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास को विकृत करने की भद्दी बौद्धिक कोशिशों पर लगाम कसना भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही एक हिस्सा है. 

भाजपा सरकार के पहले रेल बजट में रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए विशेष ट्रेन यात्रा सर्किटों की भी घोषणा की. इसके अनुसार शक्तिपीठों की यात्रा हेतु “देवी सर्किट”, ज्योतिर्लिंगों की यात्रा हेतु “ज्योतिर्लिंग सर्किट” तथा “जैन रेलवे सर्किट” की घोषणा की गई... इसी के साथ “अजमेर-हैदराबाद मुस्लिम/सूफी सर्किट” “बौद्ध सर्किट” एवं नांदेड-अमृतसर सिख सर्किट की भी घोषणा करके विरोधियों का मुँह बन्द कर दिया. इन धार्मिक ट्रेनों के “सामाजिक व राजनैतिक प्रभाव” को समझना आसान है.इसके अलावा पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आने वाले हिंदुओं के लिए भाजपा सरकार ने आधार कार्ड बनवाने की अनुमति दे दी है, जिससे इन हिंदुओं को भारतीय नागरिक बनने एवं स्थायी शरण लेने का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ज़ाहिर है कि जब अवैध रूप से भारत में आने वाले और यहाँ आकर लूटपाट, भीख, वेश्यावृत्ति एवं गन्दगी फैलाने वाले बांग्लादेशी यहाँ आराम से ना सिर्फ रह सकते हैं, बल्कि वामपंथियों एवं ममता बनर्जी के वोट बैंक प्रेम में उनके मतदाता परिचय पत्र भी बन सकते हैं, तो फिर बुरी तरह लुटे-पिटे बेचारे पाकिस्तानी हिंदुओं ने क्या बिगाड़ा है? 


कुल मिलाकर बात यह है, कि भगवतगीता तथा योग से लेकर भारतीय संस्कृति के सभी सुस्थापित प्रतीक चिन्हों को पुनर्स्थापित करने, एवं उनका प्राचीन वैभव पुनः वापस दिलवाने की इस “राष्ट्रवादी” मुहिम में छोटे-बड़े क़दमों से सफर आरम्भ हो चुका है.नेहरू के प्रतीक को बड़ी समझदारी के साथ सरदार पटेल की छवि से विस्थापित किया जा रहा है... २ अक्टूबर नामक “शासकीय कर्मकांड अवकाश”को स्वच्छता अभियान से रिप्लेस किया जा रहा है.. स्वाभाविक है कि इस युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने एवं साथ लाने इस “मिशनरी छाप रणनीति” में समय जरूर लगेगा, परन्तु इसके दूरगामी परिणाम होंगे. और मजे की बात यह कि वामपंथियों एवं कथित रूप से सेकुलर बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को यह समझ में भी आने लगा है कि भाजपा सरकार का यह “सॉफ्ट राष्ट्रवाद” कैसे उनकी जमीन खिसकाने जा रहा है तथा भविष्य में इन्हें बहुत दुःख देने वाला है.ज़ाहिर है कि यह सरकार कम से कम चार साल तो और रहेगी ही, तब तक उन्हें और क्या-क्या देखने को मिलेगा खुदा जाने... नरेंद्र मोदी कतई जल्दी में नहीं लगते, गरम-गरम खाने से मुँह जलने की संभावना है, वे आराम से ठण्डा करके ही खाएँगे

Reality of Communists and Communism

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वामपंथ का सच... 

"सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है..."का घोषवाक्य मानने वाले वामपंथीभारत में अक्सर मानवाधिकार और बराबरी वगैरह के नारे देते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में इनका तीस वर्ष का शासनकाल गुंडागर्दी, हत्याओं और अपहरण के कारोबार का जीता-जागता सबूत है... वामपंथ का यही जमीनी कैडर अब तृणमूल काँग्रेस में शिफ्ट हो गया है... फिलहाल पढ़िए मनीष कुमार द्वारा वामपंथ पर लिखित एक लेख...

दुनिया को भ्रम हो गया था कि वामपंथ की खदान से स्टालिन, माओ और पॉलपॉट जैसे नरपिशाचों का निकलना बंद हो गया है. लेकिन फिर एक ऐसी घटना हुई जिससे यह साबित हो गया है कि जब तक यह वीभत्स विचारधारा जीवित है, तब तक इसके गर्भ से दानव पैदा होते रहेंगे. वामपंथी भी विचित्र किस्म के प्राणी होते हैं. विरोधियों का सर्वनाश और नेताओं को परलोक भेजने के अमानवीय कुकृत्य को वामपंथी अपनी विशिष्ट शब्दावली में “पार्टी की सफाई” कहते हैं. अंग्रेजी में इसे पर्ज भी कहा जाता है जिसका मतलब होता है सफाई करना. अब जरा कार्ल मार्क्स के दत्तकपुत्रों द्वारा की जाने वाली “पार्टी की सफाई” की असलियत समझते हैं. 

कम्युनिस्ट नार्थ कोरिया से खबर आई कि देश के रक्षा मंत्री योन योंग चोल को तोप के सामने खड़ा कर उड़ा दिया गया. सरकार ने इस हत्या को प्योंगयोंग शहर स्थित एक मिलिट्री स्कूल के प्रांगण में सैकड़ों लोगों के सामने अंजाम दिया. जिस तोप से उन्हें उड़ाया गया वह तोप एक एंटी-एयरक्राफ्ट गन थी. रक्षा मंत्री का कसूर बस इतना था कि नार्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग युन के भाषण के दौरान उनकी आंख लग गई.. वो उंघते हुए पकड़े गए. सुप्रीम लीडर ने इसे देशद्रोह बताया और उन्हें मौत की सजा सुना दी. भारत का यह सौभाग्य है कि देश में कभी भी कम्युनिस्टों का राज नहीं रहा वर्ना संसद में उंघने वाले कई सासंद जीवित नहीं बचते. नार्थ कोरिया में जब से किम जोंग युन गद्दी पर बैठा तब से लगातार सफाई कार्यक्रम चल रहा है. अब तक 70 से ज्यादा वरिष्ठ अधिकारियों और सैकड़ों आम लोगों का सफाया किया जा चुका है. नार्थ कोरिया में सरकार के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं बचा है क्योंकि सरकार के खिलाफ सोचने वालों को ही साफ कर दिया जाता है. वहां बाइबिल, कुरान या किसी अन्य धर्मग्रंथ के साथ पकड़े जाने पर भी मौत.. चोरी करने पर भी मौत.. यहां तक कि साउथ कोरिया की फिल्म या टीवी सीरियल की डीवीडी के साथ पकड़े जाने पर भी मौत की सजा मिलती है. राजनीतिक विपक्ष तो नार्थ कोरिया में है ही नहीं, लेकिन पार्टी के अंदर चुनौती देने वालों को भी मोर्टार और तोप के सामने खड़ा कर मौत के घाट उतार दिया जाता है. नार्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग युन कुछ नया नहीं कर रहे हैं. युन के पिता और दादा ने भी यही काम बड़ी निर्ममता के साथ किया था. नार्थ कोरिया के संविधान के मुताबिक यह एक सोशलिस्ट राज्य है. संविधान में नार्थ कोरिया की विचारधारा "creative application of Marxism–Leninism"है. मतलब यह कि यहां मार्क्सवाद-लेनिनवाद का सृजकात्मक प्रयोग हो रहा है. नार्थ कोरिया की विचारधारा मूलरूप से कम्यूनिज्म थी लेकिन बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में 1972 में कम्युनिज्म को बदलकर समाजवाद कर दिया गया. 1972 के बाद से यहां वर्कर्स पार्टी का शासन है... मजदूरों के नाम का ऐसा दुरुपयोग सिर्फ और सिर्फ मार्क्सवादी ही कर सकते हैं. 



दरअसल, मार्क्सवाद-लेनिनवाद वैचारिक फर्जीवाड़े का एक ऐसा बेहुदा कॉकटेल है जिसमें सिर्फ और सिर्फ हिंसा होती है. भारत में इस विचारधारा के सबसे बड़े अनुयायी नक्सली हैं और कुछ राजनीतिक दल हैं. इनके अलावा हिंदुस्तान में ऐसे कई लोग हैं जो अज्ञानतावश इस कॉकटेल के नशे में झूमते रहते हैं. पेंडुलम की तरह झूलते रहते हैं. ये वैचारिक कंगाल लोग कभी सामाजिक न्याय और संप्रदायिकता से लड़ने वाले लड़ाकू बन जाते हैं तो कभी प्रजातंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन में शामिल हो जाते हैं तो कभी पर्यावरण को बचाने के लिए पदयात्रा शुरु कर देते हैं, तो कभी मानवाधिकार के लिए आंदोलन करते नजर आते हैं.दरअसल, इस विचारधारा की मौलिक समझ के बगैर, आधी अधूरी जानकारी और प्रोपागंडा के शिकार लोग साधारण सी बात को नहीं समझ पाते हैं कि 20वीं सदी में मार्क्सवाद-लेनिनवाद की विचारधारा पर चलने वाले सोशलिस्ट स्टेट ने जितना जनसंहार किया है उतने लोग तो किसी विश्वयुद्ध में भी नहीं मारे गए. 20वीं सदी में मार्क्सवादी-लेनिनवादी सोशलिस्ट स्टेट ने कुल 90 से 100 मिलियन लोगों की हत्या की. सबसे ज्यादा 65 मिलियन चीन में, रूस में 20 मिलियन, कम्बोडिया में 2 मिलियन, नार्थ कोरिया में भी 2 मिलियन, इथोपिया में 1.7 मिलियन, अफगानिस्तान में 1.5 मिलियन, इस्टर्न यूरोप में 1 मिलियन, वियतनाम में 1 मिलियन, क्यूबा और लैटिन अमेरिका में करीब डेढ़ लाख लोगों का कम्युनिस्ट-सरकारों ने जनसंहार किया. इसके अलावा, जहां कम्युनिस्टों की सरकारें नहीं थीं वहां दस हजार से ज्यादा लोग पार्टी की सफाई के नाम पर मार दिए गए. वामपंथियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने न सिर्फ जनसंहार किया बल्कि उसका औचित्य बताकर खुद को दोषमुक्त भी साबित कर दिया. 



(चित्र में वामपंथी कास्त्रो के भाई अपने एक विरोधी की हत्या करते हुए) 

यह बात भारत में नहीं बताई जाती है कि लेनिन दुनिया के पहले नेता थे जिन्होंने अपने ही नागरिकों पर सैन्य कार्रवाई की. लेनिन के आदेश पर ही सेंट्रल एशिया के मुसलमानों का जनसंहार हुआ और हजारों मस्जिदों और इस्लामी संस्थानों को तबाह कर दिया गया. वैसे सोवियत संघ, चीन और कम्बोडिया की कई कहानियां ऐसी हैं जिन्हें सुनकर दिल दहल जाता है. इनकी कहानियां ऐसी है कि जिसे सुनकर हिटलर को भी शर्म आ जाए. वामपंथी विचारधारा के सृजकात्मक प्रयोग की वजह से कम्बोडिया में तो एक चौथाई जनसंख्या मौत के मुंह में समा गई. दुख इस बात का है कि हिंदुस्तान में ये बातें स्कूलों और कॉलेजों में नहीं पढ़ाई जाती हैं. वामपंथियों द्वारा दी गई दलीलों को किताब में पेश कर यह बता दिया जाता है कि वहां क्रांति हो रही थी. वहां “क्लास-एनेमी”, “क्रांति के दुश्मनों” व “सर्वहारा के दुश्मनों” को मारा गया था. यदि किसी को सच पर पर्दा डालना सीखना हो तो उसे भारत के वामपंथी लेखकों से सीखना चाहिए.भगवान भला करे कि क्रांति का यह वीभत्स रोग भारत के जनमानस को नहीं लगा. कुछ पथभ्रष्ट हो गए हैं लेकिन वे अपवाद ही हैं. सच्चाई यह है कि जहां जहां राज्य की सत्ता वामपंथियों के हाथ आई वहां सिर्फ और सिर्फ खून की नदियां बही हैं. 

वामपंथियों के बारे में समझने वाली बात बस इतनी सी है कि ये विपक्ष में रहते हुए अधिकार, प्रजातंत्र और आजादी जैसी बड़ी बड़ी बातें करते हैं और आंदोलन करतें है वही सत्ता में आने के बाद सबसे बड़े दमनकारी साबित होते हैं. यही उनकी चाल, चरित्र और चेहरे की हकीकत है.

Why Religious Endowment Act Must be Reformed

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मंदिरों के धन की "सेकुलर-प्रगतिशील"लूट का खुलासा... 

(Courtsey - Mr. Anand Kumar)

जब आपदाएं आती हैं तो सब लोग मदद के लिए आगे आते हैं | गुरूद्वारे से चंदा आ जाता है, चर्च फ़ौरन धर्म परिवर्तन के लिए दौड़ पड़ते हैं, आपदा ग्रस्त इलाकों में | ऐसे में मंदिर और मठ क्यों पीछे रह जाते हैं ? दरअसल इसके पीछे 1757 में बंगाल को जीतने वाले रोबर्ट क्लाइव का कारनामा है | लगभग इसी समय में उसने मैसूर पर भी कब्ज़ा जमा लिया था | सेर्फोजी द्वित्तीय के ज़माने में 1798 में जब थंजावुर को ईस्ट इंडिया ने अपने कब्जे में लिया तब से मंदिरों को भी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया था |

जब भारतीय रियासतों को अंग्रेजों ने अपने कब्ज़े में लेना शुरू किया तो अचानक उनका ध्यान गया की शिक्षा और संस्कृति के गढ़ तो ये मंदिर हैं | मंदिरों और मठों के पास ज़मीन भी काफी थी | देश पे कब्ज़ा ज़माने के साथ साथ आर्थिक फ़ायदे का ऐसा स्रोत वो कैसे जाने देते ? फ़ौरन ईस्ट इंडिया कंपनी के इसाई मिशनरियों ने इस मुद्दे पर ध्यान दिलाया | नतीज़न इसपर फौरन दो कानून बने | दक्षिण भारत और उत्तर भारत के लिए ये थोड़े से अलग थे |

1. Regulation XIX of Bengal Code, 1810
2. Regulation VII of Madras Code, 1817

"For the appropriation of the rents and produce of lands granted for the support of .... Hindu temples and colleges, and other purposes, for the maintenance and repair of bridges, sarais, kattras, and other public buildings; and for the custody and disposal of nazul property or escheats, in the Presidency of Fort Williams in Bengal and the Presidency of Fort Saint George, some duties were imposed on the Boards of Revenue…."

ऐसा जिस कानून में लिखा था, जाहिर है वो ये समझकर लिखा गया था जिस से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं ज्यादा ना आहत हो जाएँ | धार्मिक भावनाओं को भड़काने का नतीजा अच्छा नहीं होगा उन्हें ये भी पता था, पूरे भारतीय समाज को ये एक हो जाने का मौका देने जैसा होता | इसके अलावा मिशनरियों का तरीका भी धीमा जहर देने का होता है |

- ईस्ट इंडिया कंपनी को पता था की मंदिरों के पास कितनी संपत्ति है | उन्हें बचाना क्यों जरुरी है इसका भी उन्हें अंदाजा था 
- इन निर्देशों /कानूनों में कहीं भी चर्चों का कोई जिक्र नहीं है | उनकी संपत्ति को छुआ तक नहीं गया है |

1857 के विद्रोह को कुचलने के बाद जब पूरे भारत पर विदेशियों का कब्ज़ा हो गया तब उन्होंने अपनी असली रंगत दिखानी शुरू की | 1863 में ब्रिटिश सरकार अलग अलग मंदिरों के लिए अलग अलग ट्रस्टी बनाने की प्रक्रिया शुरू करवा दी | भारतीय तब विरोध करने लायक स्थिति में नहीं थे |



The Religious Endowments Act, 1863

· ट्रस्टी, मैनेजर और Superintendent नियुक्त करने का अधिकार
· संपत्ति Revenue board के अधीन होगी, जो ट्रस्टी चलाएंगे
· जिन मामलों में मंदिर या मठ की संपत्ति का सेक्युलर उदेश्यों के लिए इस्तेमाल करना हो
Beginning of the Loot, 1927

सरकार को नजर आया की मठों और मंदिरों की संपत्ति को आसानी से अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है | 1863 के बाद के सालों में वो भली भांति मंदिरों की संपत्ति पर अपने “सेक्युलर” अधिकारी बिठा चुके थे ऐसे में वो जो चाहे वो कर सकते थे | सही मौका देखकर Madras Hindu Religious Endowments Act, 1926(Act II of 1927) का निम्न किया गया |इस एक्ट के तहत सरकार सिर्फ एक Notification देकर मंदिर और उसकी संपत्ति का अधिग्रहण कर सकती थी | इस एक्ट की एक और ख़ास बात ये है की पिछली बार जहाँ मस्जिद भी थोड़े बहुत सरकारी नियंत्रण में थे अब वो एक इसाई सरकार के नियंत्रण से बाहर थे | ये कानून सिर्फ हिन्दू धार्मिक संस्थानों के लिए है | इसाई और मुस्लिम संस्थान इस से सर्वथा मुक्त हैं |

सिर्फ एक notification पूरे मंदिर की सारी चल अचल संपत्ति को ईसाईयों के कब्ज़े में डाल देता है |

“सेक्युलर” भारतीय सरकारों के कारनामे

हिन्दू धार्मिक संस्थानों पर पूरा कब्ज़ा, 1951 

सन 1951 में मद्रास सरकार ने THE MADRAS HINDU RELIGIOUS AND CHARITABLE ENDOWMENTS ACT, 1951 बनाया | ये कानून बाकि सभी पिछले कानूनों के ऊपर था और हिन्दू मंदिरों पर सरकारी “सेक्युलर” नियंत्रण को पुख्ता करता था | कमिश्नर और उनके अधीन कर्मचारी कभी भी मंदिर पर पूरा कब्ज़ा जमा सकते थे | इस अनाचार का पुख्ता विरोध हुआ | 1954 में सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के कई हिस्सों को असंविधानिक करार दिया | यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट ने एक हिस्से के बारे में कहा की वो 'beyond the competence of Madras legislature'है | 1956 में दक्षिण भारतीय राज्यों के पुनःनिर्धारण के बाद हर राज्य ने मंदिरों पर नियंत्रण के अपने अलग अलग कानून बनाये |

हमने देखा की कैसे हिन्दुओं के मंदिरों को अपने कब्ज़े में लेने की साज़िश 1810 के ज़माने में अंग्रेजों ने रची | लेकिन ऐसा नहीं है की भारत के आजाद होने के बाद इस प्रक्रिया में कोई रोक लगी थी | पंद्रह सौ बरसों की गुलामी कर चुका हिन्दू राष्ट्र इतना कमज़ोर हो चुका था की वो अपने मंदिरों की रक्षा करने में भी समर्थ नहीं था| एक कारण ये भी था की इतने सालों में इतिहास को गायब कर दिया गया था | मंदिरों के पास संपत्ति ना होने के कारण वो किसी समाज सेवा में समर्थ ही नहीं थे.

ऐसे मौके पर जब दुष्टों ने आरोप लगाया की इनका किसी की मदद करने का तो कोई इतिहास ही नहीं तो लोगों को लगा की हाँ पिछले सौ सालों में तो देखा ही नहीं कुछ करते ! यहाँ धूर्तता से ये नहीं बताया गया की उनकी सारी चल अचल संपत्ति ये कहकर कब्जे में ली गई है की धार्मिक के अलावा “सेक्युलर” समाजसेवी कार्यों के लिए उपयोग में लायी जाएगी | उस पैसे का जब सरकारें अपनी तरफ से इस्तेमाल करती थी तो ये कभी नहीं बताती की ये मदद का पैसा मंदिरों की ओर से मदद के लिए आया है | इस तरह मदद होती तो मंदिरों के पैसे से है मगर धूर्त-मक्कार सेकुलरों को ये कहने का मौका मिल जाता है की मंदिर तो कुछ करते ही नहीं | ऐसा नहीं है की इतिहासकारों, पत्रकारों, नेताओं को इनकी जानकारी नहीं थी | इनमे से कई ऐसे थे जिनके पास कानून की बड़ी बड़ी डिग्रियां भी थी | ये तथाकथित महान विश्वविद्यालयों से पढ़कर आये थे| आम भारतीय जनता की तरह इनमे से 50-60 फीसदी लोग अनपढ़ नहीं थे | ऐसे में ये सवाल पूछना भी बनता है की इन्होंने हमारे साथ ये छल किया क्यों ? आखिर इन्हें क्या फायदा हो रहा था की वो “मंदिर मदद नहीं करता” का झूठ बोलने लगे ? “अश्वथामा मर गया” का आधा सच बोलते समय युधिष्ठिर के पास महाभारत का युद्ध जीतने का लोभ था | जब इन इतिहासकारों ने, इन पत्रकारों ने ये आधा सच कहना शुरू किया तो इनके पास क्या लोभ था ? 

उत्तर भारतीय मंदिर महमूद गजनवी के आक्रमण के समय से ही लूटे जा चुके थे | दिल्ली के क़ुतुब मीनार पर स्पष्ट लिखा है की इसे कई हिन्दू मंदिरों को तोड़कर उनकी ईटों से एक विजयस्तंभ के रूप में बनाया गया | ऐसे में हमारे पास सिर्फ दक्षिण भारतीय मंदिर थे जहाँ धन था | जमीने उठा कर एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाई जा सकती थी | लेकिन मंदिरों में बरसों के दान से इकठ्ठा हुआ स्वर्ण अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में था | फ़ौरन इसे लूटने की योजना बनाई गई | गजनवी लौट आया, इस बार उसके साथ तलवार भाले लिए कोई फौज़ नहीं थी | इस बार उसके पास कानून की तोप थी | उसका विरोध करनेवालों ने गाय को देखकर हथियार नहीं रखे थे | पता नहीं किस लोभ, किस भय से उन्होंने अपनी कलम रख दी थी | लोकतंत्र के स्तंभ माने जाने वाली पत्रकारिता के बहादुरों ने देश को ये बताना जरुरी नहीं समझा की क्यों ऐसे काले कानूनों को फिर से जगह दी जा रही है

आज जब सूचना क्रांति के दौर में ये जानकारी जुटाना सुलभ है और सोशल मीडिया के संचार तंत्र हमें जानकारी आसानी से जुटा लेने की इजाजत देते हैं तो इन सभी तथाकथित लोकतंत्र के स्तंभों से पूछना हमारा धर्म है | अगर पत्रकारिता आपका धर्म था तो आपने जनता को सच क्यों नहीं बताया ? अगर कहीं आप नौकरी करते थे और विरोध करने से आपको नौकरी /आर्थिक क्षति का भय था तो नैतिकता की दुहाई किस मूंह से देते हैं ? जिन्हें आप भ्रष्ट कहते हैं, सत्ता लोलुप, घूस लेने वाला, बेईमान कहते हैं उसी की तरह पैसे के लालच में सच से मूंह आपने भी तो मोड़ रखा था न ? शर्मा क्यों रहे हैं बताइए न ?



आइये फ़िलहाल आजादी के बाद बने कानूनों पर एक नजर डालें | धन की चर्चा होते ही सबसे पहले दक्षिण के मंदिरों की चर्चा होती है | कहा जाता है की इनके पास काफी सोना चढ़ावे में आता है | उनकी संपत्ति कैसे कानूनों से कब्जे में लेकर उस धन का सरकार इस्तेमाल कर रही है इसे देखने के लिए हम तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों के कानून पर एक नजर डालते हैं | यहाँ बने 1951 के कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बता दिया था | 1954 में तीन चार साल मुक़दमा चलने के बाद ये कानून ख़ारिज हुआ और दूसरा कानून बनाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया |

The Tamil Nadu Hindu Religious and Charitable Endowments Act 1959 & Karnataka Religious Institutions and Charitable Institutions Act 1997 

तमिलनाडु की सरकार ने Tamil Nadu Hindu Religious And Charitable Endowments Act, 1959 बनाया था | उस समय वहां के. कामराज की सरकार थी | इन महान “सेकुलरों” ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ख़ारिज किये गए हर हिस्से को दोबारा से इस नए कानून में डाल दिया | 1954 में जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया था उन्ही सेक्शन 63-69 को इस नए एक्ट में सेक्शन 71-76 के रूप में दोबारा घुसेड़ दिया गया था | 

मैसूर राज्य और बाद में कर्नाटक ने 1951 के Madras act (और इसके सम्बंधित एक्ट्स) को 1997 तक जारी रखा | 1997 में The Karnataka Hindu Religious Institutions and Charitable Endowments Act, 1997 आया | ये एक्ट संविधान का सीधा उल्लंघन था | कर्नाटक हाईकोर्ट ने पाया की ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16, 25, और 26 का सीधा उल्लंघन है| ऐसा पाने पर 8 सितम्बर, 2006 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस एक्ट को निरस्त कर दिया | इसके बाद कर्नाटक सरकार The Karnataka Act 27 लेकर 2011 में आई जिसमे संविधान का उल्लंघन अपेक्षाकृत कम होता है | जैसे की इस एक्ट में ये प्रावधान है की राज्य और जिला स्तर पर हिन्दू पुजारियों और वेद के जानकारों की नियुक्ति हो सकती है | मंदिरों के संभाल के लिए कर्म कांडों के जानकार लोगों की नियुक्ति इस एक्ट के कारण संभव है | 


इधर हाल फ़िलहाल के सालों में अजीबो गरीब तरीकों से मंदिरों को ‘notification’ के जरिये कब्ज़े में लेने की घटनाएँ बंद नहीं हुई हैं | 1971 में श्री कपलीश्वर मंदिर की संपत्ति को एक ‘ex-parte’ आदेश के जरिये डिप्टी कमिश्नर ने अपने कब्ज़े में ले लिया था | ऐसे ही एक ‘ex-parte’ आदेश से 18 जुलाई, 1964 में श्रीसुगवानेश्वर मंदिर को सालेम में कब्ज़े में लिया गया था | दक्षिण भारत के लगभग सभी बड़े मंदिरों को ऐसे ही ‘ex parte’ आदेश के जरिये किसी न किसी डिप्टी कमिश्नर ने अपने कब्ज़े में लिया हुआ है | इनके लिए 1959 के एक्ट की धारा 64(5)A का इस्तेमाल किया जाता है | 

सन 1951 के एक्ट की धारा 63 और 1959 की धारा 71 की समानताएं नीचे कॉपी पेस्ट हैं | सीधा अंग्रेजी में ही डाल दिया है ताकि ये स्पष्ट दिख सके की एक असंवैधानिक घोषित किये जा चुके काले कानून को कैसे हमारी “सेक्युलर” सरकारें दोबारा इस्तेमाल कर रही हैं | इनमे क्या क्या किया जा सकता है उसपर भी आपका ध्यान जायेगा |

Sections 63 in the '51 act:

63. (1) Issue of notice to show cause why institution should not be notified.-Notwithstanding that a religious institution is governed by a scheme settled or deemed to have been settled under this Act, where the Commissioner has reason to believe that such institution is being mismanaged and is satisfied that in the interests of its administration, it is necessary to take proceedings under this Chapter, the Commissioner may, by notice published in the prescribed manner, call upon the trustee and all other persons having interest to show cause why such institution should not be notified to be subject to the provisions of this Chapter.
(2) Such notice shall state the reasons for the action proposed, and specify a reasonable time, not being less than one month from the date of the issue of the notice, for showing such cause.
(3) The trustee or any person having interest may thereupon prefer any objection he may wish to make to the issue of a notification as proposed.
(4) Such objection shall be in writing and shall reach the commissioner before the expiry of the time specified in the notice aforesaid or within such further time as may be granted by the Commissioner.


And here is the reading of Section 71 of the '59 Act:

71. (1) Not withstanding that a religious institution is governed by a scheme settled or deemed to have been settled under this Act, where the Commissioner has reason to believe that such institution is being mismanaged and is satisfied that in the interests of its, administration, it is necessary to take proceedings under this Chapter, the Commissioner may, by notice published in the prescribed manner, call upon the trustee and all other persons having interest to show cause why such institution should not be notified to be subject to the provisions of this Chapter.
(2) Such notice shall state the reasons for the action proposed, and specify a reasonable time, not being less than one month from the date of the issue of the notice for showing such cause.
(3) The trustee or any person having interest may thereupon prefer any objection he may wish to make to the issue of a notification as proposed.
(4) Such objection shall be in writing and shall reach the Commissioner before the expiry of the time specified in the notice aforesaid or within such further time as may be granted by the Commissioner.

जी नहीं ! एक ही कानून को दो बार कॉपी पेस्ट करने की भूल नहीं की है जनाब.... एक के ख़ारिज होने के बाद ये दूसरा ’71 का कानून आया है | इस तरह एक ही असंवैधानिक कानून को दोबारा नए नाम से परोस कर अभी भी मंदिरों में दान किये गए हिन्दुओं के पैसे की लूट जारी है... इसीलिए मंदिरों को विधर्मियों से मुक्त करवाना बेहद जरूरी है... हिंदुओं के दान का पैसा हज सब्सिडी जैसे कामों तथा और ईसाई धर्मांतरण में लग रहा है और हिंदुओं को पता भी नहीं... 

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(यह लेख श्री आनंद कुमार द्वारा साभार... 
विस्तार से लिखा गया एक उत्तम लेख... शायद इससे हिंदुओं की आँखें खुलें). 

After JNU Now its IIT Madras on Communist Target

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JNU के बाद अब IIT मद्रास को डसने का वाम-मिशनरी षड्यंत्र...


जिस समय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने IIT मद्रास के एक छात्र समूह “अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल” (APSC) के बारे में एक गुमनाम शिकायत मिलने पर IIT मद्रास के निदेशक को इसकी जाँच करने का पत्र लिखा, उस समय शायद उन्हें भी यह भान नहीं होगा कि वे साँपों के पिटारे में हाथ डालने जा रही हैं और ना ही भारत की जनता को यह पता था कि इस पत्र के बाद IIT-मद्रास में जो “नाटक” खेला जाने वाला है, वह अंततः उन्हीं समूहों की पोल खोल देगा जो पिछले पचास वर्ष से इस देश की शिक्षा व्यवस्था पर कुण्डली मारे बैठे हैं. लेकिन न सिर्फ ऐसा हुआ, बल्कि मार्क्सवादी/मिशनरी और द्रविड़ राजनीति के गठजोड़ का जैसा चेहरा सामने आया, उससे सभी भौंचक्के रह गए. देश के अकादमिक क्षेत्र में काम कर रहे लगभग सभी कुलपति, प्रोफेसर्स एवं कर्मचारी अच्छे से जानते हैं कि देश की शिक्षा व्यवस्था, पाठ्यक्रम निर्धारण एवं विश्वविद्यालयों की आंतरिक राजनीति में पिछले साठ वर्ष से परोक्ष रूप में वामपंथी विचारधारा, लेकिन वास्तव में अपरोक्ष रूप से भारत को तोड़ने में जुटी मिशनरी विचारधारा के लोग “ग्रहण” बनकर छाए हुए हैं. 



IIT मद्रास के इस आंबेडकर-पेरियार विवाद के समय, मैंने बारहवीं कक्षा के एक छात्र से पूछा कि क्या वह IIT मद्रास से M.A. करना चाहता है? वह हँसने लगा... बोला कि IIT से M.A.?? भला IIT से कभी M.A. कोर्स भी किया जाता है क्या? विगत कई वर्षों से IIT की जैसी छवि देश में बनी हुई थी, उसके हिसाब से उस नादान बालक की समझ यही थी, कि IIT मद्रास में सिर्फ इंजीनियरिंग, तकनीकी और रिसर्च पाठ्यक्रम ही होते हैं. IIT में पढ़ने वाले छात्र सिर्फ मेधावी, पढ़ाकू और राजनीति से दूर रहने वाले होते हैं. उस बेचारे को क्या पता था, कि इस देश में वामपंथ और प्रगतिशीलता नामक धाराएँ हैं, जो ईसाई मिशनरी के तटों का सहारा लेकर बहती हैं. IIT से इंजीनियरिंग और उच्च तकनीक में रिसर्च का सपना मन में पाले बैठे, उस मासूम को क्या पता था, कि जिस प्रकार दिल्ली के ह्रदय-स्थल में स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जिसे प्यार से JNU पुकारा जाता है) सहित देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों को वामपंथी विचारधारा ने इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब वह पढ़ाई-लिखाई, विमर्श-चिंतन और शोध आदि की बजाय “किस ऑफ लव”, “फ्री सेक्स” तथा “समलैंगिकों के अधिकार” जैसे क्रान्तिकारी टाईप के आंदोलन चलाने का अड्डा बन चुका है... उसी प्रकार पिछले कुछ वर्षों में बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से IIT-मद्रास को भी इस विचारधारा ने “डसना” शुरू कर दिया है.चूँकि स्मृति ईरानी इस गिरोह की आँखों में पहले दिन से ही खटक रही हैं, इसलिए IIT-मद्रास पर काबिज इस गिरोह ने आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल” (APSC) पर लगाए गए प्रतिबन्ध को लेकर जैसा हंगामा और कोहराम मचाया वह अदभुत था. अदभुत इस श्रेणी में, कि यह “वामपंथी-मिशनरी बौद्धिक गिरोह” किस तरह शिक्षण संस्थाओं पर कब्ज़ा करता है और अपनी वैचारिक लड़ाई के लिए छात्रों का उपयोग करता है वह हिंदूवादी नव-बुद्धिजीवियों के लिए सीखने वाली बात है. पढ़ाई, रिसर्च, अध्ययन वगैरह छोड़कर, इन विश्वविद्यालयों के माध्यम से अपनी राजनैतिक युद्ध तथा केन्द्र व राज्यों द्वारा पोषित विश्वविद्यालयों में अपने-अपने अकादमिक मोहरे किस प्रकार फिट किए जाते हैं, IIT-मद्रास इसका शानदार उदाहरण है. “आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल” यह विचार ही अपने-आप में कितना विरोधाभासी हैतथा यह मानव संसाधन मंत्रालय के साथ हुआ इनका विवाद क्यों हुआ, इसके बारे में हम आगे देखेंगे. पहले हम देखते हैं इस जहरीली समस्या की जड़ और पृष्ठभूमि... 

सन 2006 से पहले IIT-मद्रास, देश का एक अग्रणी शैक्षिक संस्थान था.जहाँ भारत के सर्वोत्तम दिमाग अपनी-अपनी मेधा व प्रतिभा लेकर तकनीकी, विज्ञान, इंजीनियरिंग एवं शोध-विकास के लिए स्कॉलरशिप वगैरह लेकर आते थे. पढ़ाई-लिखाई का गजब का माहौल था... गंभीरता थी. 2006 में डॉक्टर अनन्त ने इंग्लिश डेवलपमेंट स्टडीज़ एंड इकोनोमिक्स के नाम से पाँच वर्ष का समेकित M.A. कोर्स एक नए विभाग के अंतर्गत आरम्भ किया. बस उसी दिन से IIT-मद्रास का अधःपतन आरम्भ हो गया. “मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान” नाम का एक विभाग शुरू होते ही योजनानुसार मधुमक्खी की तरह मार्क्सवादी/ईसाई मिशनरी/द्रविड़ राजनीति से सम्बन्धित प्रोफेसरों-अध्यापकों का जमावड़ा वहाँ एकत्रित होने लगा तथा भारत की संस्कृति, हिन्दी, हिन्दू, संस्कृत भाषा आदि से घृणा करने वाले, विभिन्न जातिवादी-धर्मांतरणवादी समूहों ने इस संस्थान को भी JNU की ही तरह अकादमिक रसातल में पहुँचाने की ठान ली. 



मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के झण्डे तले एक से बढ़कर एक छंटे हुए लोग इकठ्ठा होने लगे. नंदनम आर्ट्स कॉलेज अथवा प्रेसीडेंसी कॉलेज जैसे स्थानीय कॉलेजों में जिस प्रकार की छात्र राजनीति, गुण्डई और हिंसा होती थी, वही अब IIT-मद्रास में भी धीरे-धीरे अपने पैर जमाने लगी. अर्थात एक समय पर अपनी रिसर्च, तकनीक एवं ज्ञान के शिखर पर विराजमान इस विश्वविख्यात IIT में भी वामपंथी अराजकता के कीटाणु घर करने लगे.यूरोपियन ईसाई मिशनरियों ने सत्रहवीं, अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में एक विशेष लक्ष्य लेकर भारत में प्रवेश किया था, कि वे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों, विश्वविद्यालयों का एक ऐसा जाल बिछाएँगे जो उन्हीं के द्वारा वित्तपोषित अथवा स्थानीय चर्च सत्ता द्वारा नियंत्रित होगा. 1996 से लगातार देश में भाजपा और हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव को लेकर ईसाई मिशनरी और वामपंथियों ने काफी पहले से ही देश के सभी प्रमुख संस्थानों में अपने मोहरे बिछाने शुरू कर दिए थे. उद्देश्य यह था कि विभिन्न वामपंथी और कथित प्रगतिशील प्रोफेसरों के माध्यम से छात्रों की मानसिकता को हिन्दू विरोधी, संस्कृत विरोधी और संघ-भाजपा विरोधी बना दिया जाए, ताकि ये छात्र अकादमिक एवं विभिन्न शोध संस्थानों में इनके राजनैतिक हित बरकरार रख सकें. इसीलिए IIT जैसे तकनीकी/इंजीनियरिंग संस्थानों में भी मानविकी और सामाजिक विज्ञान जैसे फालतू विषयों एवं विभागों को “सफ़ेद हाथी” के तौर पर पाला-पोसा गया. सन 2002 के आरम्भ से ही इस “गिरोह” को आभास हो गया था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता महाभ्रष्ट काँग्रेस को ठुकराने वाली है तथा भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. बुद्धिजीवियों के इस जमावड़े ने अनुमान लगाया था कि भाजपा को गठबंधन की सरकार चलानी पड़ेगी, इसीलिए वे पहले ही अपने युद्धक्षेत्र को वैचारिक भूमि पर ले गए. HSS विभाग की विभिन्न फैकल्टी द्वारा अपने राजनैतिक विचारधारा के चलते उन्हीं के समान वक्ताओं को इस विभाग के बैनर तले विभिन्न संगोष्ठियों में भाषण देने हेतु आमंत्रित किया जाने लगा. इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सफलता से चिढ़ के कारण नवंबर 2014 में IIT-मद्रास में भी “किस ऑफ लव” नामक क्रांतिकारी आयोजन किया गया. आईये पहले देखते हैं कि सामाजिक क्रान्ति लाने का दावा करने वाले इस वामपंथी गिरोह ने IIT में किन-किन महानुभावों को लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया...

- सिद्धार्थ वरदराजन :- “जस्टिस एंड द पोलिटिक्स ऑफ मेमोरी एंड फोर्गेटिंग – 1984 and 2002 दंगे. (लेक्चर था 11 नवंबर 2012 को). 
- नरेन्द्र नायक :- विषय “द नीड फॉर रेशनल थिंकिंग” (23 जनवरी 2013) 
- डॉक्टर राजीव भार्गव :- (आप CSDS के निदेशक हैं, जहाँ से अभय दुबे जैसे “पत्रकार” निकलते हैं), इन्होंने व्याख्यान दिया, “हाउ शुड स्टेट्स रिस्पांस टू रिलीजियस डाईवर्सिटी” (31 जनवरी 2013). 
- जय कुमार क्रिश्चियन :- आप विश्व की सबसे बड़ी ईसाई धर्मांतरण संस्था “वर्ल्ड विजन” के भारतीय निदेशक हैं... ज़ाहिर है कि इन्होंने ईसाईयों पर हो रहे कथित अत्याचारों का रोना रोया. 
- आनंद पटवर्धन :- बाबरी ढाँचे के गिराए जाने के बाद, फिल्म-डाक्यूमेंट्री एवं विज्ञापन की दुनिया में सबसे अधिक कपड़े फाड़ने वाले ये सज्जन “सिनेमा ऑफ रेजिस्टेंस : अ जर्नी” विषय पर छात्रों का ब्रेनवॉश करते रहे. (हाल ही में पटवर्धन साहब FTII के नवनियुक्त निदेशक गजेन्द्र चौहान के विरोध में भी कोहराम करते नज़र आए थे). 
- तीस्ता सीतलवाड :- “ह्यूमन राईट्स एंड कम्युनल हार्मनी” (10 फरवरी 2014). इन मोहतरमा के बारे में अलग से बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इनके झूठे हलफनामों से तंग आकर इन्हें जेल भेजने की चेतावनी दे चुका है, इसके अलावा इनके विभिन्न NGOs में धन की अफरा-तफरी की जाँच हाईकोर्ट के निर्देशों पर जारी है. 
- राजदीप सरदेसाई :- इन्हें मोदी की जीत के बाद इस वर्ष अमेरिका में भारतवंशियों के चांटे खाने के बाद “हैज़ 2014 इलेक्शंस रियली चेंज्ड इण्डिया?” विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. बताया जाता है कि ये सज्जन सिर्फ टीवी एंकर नहीं हैं ये ऊपर बताई गई कुख्यात संस्था “वर्ल्ड विजन” के ब्राण्ड एम्बेसेडर भी रह चुके हैं.  

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि जानबूझकर चुन-चुन कर ऐसे लोगों विभागों में भर्ती किया जाता है जो पूरी तरह से भारतीय संस्कृति के विरोधी हों तथा वक्ता के रूप में भी ऐसे ही लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अपनी “बौद्धिक चाशनी” से समाज में विभाजन करने की क्षमता रखते हों. इसीलिए दिल्ली के JNU में चलने वाले “गौमांस उत्सव” जैसे प्रत्येक फूहड़ आयोजनों को IIT मद्रास में भी दोहराया गया. 



अब हम देखते हैं कि छात्रों में “वैचारिक प्रदूषण” फैलाने वाले इस विभाग अर्थात “ह्यूमैनिटी एंड सोशल साईंसेस” (HSS) के चन्द विद्वान प्रोफ़ेसर कौन-कौन हैं... और इस विभाग का सिलेबस क्या है?? 

- आयशा इकबाल :- एमए (साहित्य), पीएचडी (साहित्य)... रूचि एवं अध्ययन क्षेत्र है ड्रामा, साहित्य और फिल्म. 
- बिनीथा थम्पी :- एमए (राजनीति विज्ञान), पीएचडी. 
- एवेंजेलिन मनिक्कम :- एमए, पीचडी (साहित्य), अमरीका के फुलब्राइट से छात्रवृत्ति प्राप्त. 
- जोए थौमस कर्कट्टू :- JNU से एमए, पीचडी (अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध)  
- जॉन बोस्को :- पुदुचेरी से एमए (धर्म एवं विज्ञान) 
- कल्पना के. :- JNU से एमए (इतिहास) और पीचडी (मद्रास) 
- मलाथी डी. :- एमए, पीएचडी (साहित्य)... अमेरिका के रोकफेलर फाउन्डेशन से छात्रवृत्ति प्राप्त 
- मिलिंद ब्रह्मे :- एमए पीएचडी (JNU) 
- साबुज कुमार मंडल :- M.Sc. (इकोनोमिक्स), पीएचडी (इकोनोमिक्स). 
- संतोष अब्राहम :- हैदराबाद विवि से पीएचडी (इतिहास) 
- सोलोमन जे बेंजामिन :- MS (Arch.) 
- सुधीर चेल्ला राजन :- IIT मुम्बई से बी.टेक.  

IIT मद्रास के अलिप्त और पढ़ाई-लिखाई के माहौल को बचाने के इच्छुक छात्र दबी ज़बान में बताते हैं कि, इस सूची में सबसे अंत वाले सज्जन सुधीर चेल्ला राजन साहब, इनकी लिव-इन पार्टनर सुजाथा बिरावन तथा मिलिंद ब्रह्मे ही इस सारे विवाद की जड़ हैं. इन्हीं तीनों ने मिलकर HSS विभाग को एक हिन्दू विरोधी विभाग बना दिया है. कई तरह के छात्र समूह गठित करके जातिगत विद्वेष की राजनीति एवं वैचारिक प्रदूषण फैलाया है.चूँकि सुधीर राजन इस विभाग के विभागाध्यक्ष हैं इसलिए उन्होंने चुन-चुनकर मार्क्सवादियों एवं ईसाई मिशनरी के समर्थकों को भर लिया है. हालाँकि फैकल्टी के सदस्यों में कुछ हिन्दू भी हैं, लेकिन संख्याबल में कम होने के कारण वे “घबराए हुए, दब्बू टाईप के हिन्दू” हैं जो भारी बहुमत में वहाँ स्थापित मार्क्सवादियों तथा मिशनरी के सदस्यों के सामने असहाय से हैं. इसके अलावा वामपंथियों को पिछले दरवाजे से घुसाने के उद्देश्य से यहाँ “सेंटर फॉर चाईनीज़ स्टडीज़” नामक विभाग भी खोल दिया गया है.भारत के इतिहास एवं संस्कृति को विकृत करके छात्रों का ब्रेनवॉश करने के सभी साधन पाठ्यक्रम में अपनाए गए हैं, जो कि इस विभाग का सिलेबस देखकर तत्काल ही कोई भी बता सकता है. JNU में वैचारिक कब्जे के लिए जो-जो हथकण्डे आजमाए गए थे (या हैं), वही हथकण्डे IIT-मद्रास को हथियाने के लिए भी किए गए. यदि वर्तमान भाजपा सरकार में स्मृति ईरानी की बजाय कोई और भी मानव संसाधन मंत्री बनता, तब भी अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल वाला “रचा गया हंगामा” जरूर होता. क्योंकि IIT में ऐसे समूहों का गठन इसीलिए किया गया है, ताकि सरकार विरोधी तथा हिन्दू धर्म-संस्कृति विरोधी गतिविधियाँ लगातार चलाई जा सकें. 



APSC द्वारा जानबूझकर गढे गए इस ताजे विवाद की चिंगारी उसी दिन भड़क गई थी जिस दिन इस छात्र समूह ने आंबेडकर-पेरियार के चित्रों वाले विभिन्न पोस्टरों को IIT कैम्पस में लगाया. बेहद भड़काऊ किस्म के ये पोस्टर वेदों की आलोचना करने, गौमांस का समर्थन करने, ब्राह्मणों को कोसने, संस्कृत भाषा को “बाहरी”(??) लोगों की भाषा बताने जैसी बेहद आपत्तिजनक बातों से भरे हुए थे. “राजनैतिक विचारधारा अथवा मतभेदों के बारे में समझा जा सकता है, परन्तु APSC द्वारा जिस तरह से हिन्दू धर्म के खिलाफ ज़हर उगला जा रहा था वह निश्चित रूप से आंबेडकर रचित संविधान की धाराओं में भी सजा योग्य ही है. परन्तु इस समूह को मार्क्सवादियों तथा हिंदुओं को तोड़ने की साज़िश में लगी ईसाई मिशनरी का हमेशा की तरह पूरा समर्थन हासिल था. अंततः त्रस्त होकर कुछ छात्रों ने स्मृति ईरानी को एक गोपनीय पत्र लिखकर IIT-मद्रास में चल रही इस विषम परिस्थिति और खराब माहौल के बारे में बताया. सारी बातें जानने-समझने के बावजूद, संयम बरतते हुए मानव संसाधन मंत्री ने संविधान अथवा नियमों के खिलाफ रत्ती भर भी कदम नहीं उठाया, बल्कि IIT-मद्रास के निदेशक से पत्र लिखकर सिर्फ हालात की जानकारी लेने तथा “नियमों के अनुसार” कदम उठाने को कहा. IIT निदेशक ने सारे दस्तावेजों एवं पोस्टरों को देखकर APSC की गतिविधियों को कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया. बस फिर क्या था!!! यह गिरोह इसी मौके की तलाश में था ताकि हंगामा किया जा सके और इन्होंने वैसा ही किया भी. 

मिशनरी पोषित संस्थाएँ किस तरह से भारतीय समाज को तोड़ने और हिंदुओं में विभाजन पैदा करने के लिए अकादमिक क्षेत्रों का उपयोग करती हैं, इसका क्लासिक उदाहरण है IIT-मद्रास. ऊपर प्रोफेसरों की जो सूची डी गई है, उसमें एक नाम है मिलिंद ब्रह्मे का जो IIT-मद्रास के बाहर एक संस्था IGCS (Indo-German Centre for Sustainability) के भी निदेशक बने बैठे हैं. इस IGCS की प्रायोजक है “वर्ल्ड विजन”. जैसा कि पहले बताया जा चुका है वर्ल्ड विजन पूरी दुनिया में ईसाई धर्मांतरण की सबसे बड़ी एजेंसी है. समाजसेवा के नाम पर ये विभिन्न NGOs खड़े करके धर्मांतरण की गतिविधियों को बढ़ावा देना इसका मुख्य काम है. आंबेडकर-पेरियार समूह के विवादित पोस्टर भी इसी संस्था द्वारा प्रायोजित किए गए थे. चर्च की ही एक और “वैचारिक दुकान” IIT-मद्रास कैम्पस के अंदर ही खोलने की अनुमति दी गई है, जिसका नाम है “आईआईटी क्रिश्चियन फेलोशिप”. हिन्दू छात्रों के मुताबिक़ इस समूह के कैथोलिक छात्र खुल्लमखुल्ला IIT के आसपास विभिन्न बस स्टैंडों, होस्टल तथा IIT के ही विभिन्न विभागों में यीशु संबंधी धर्म प्रचार के पर्चे बाँटते फिरते हैं. 9 जनवरी 2015 को कुछ छात्रों ने IGCS नामक इस संदिग्ध संस्था के एक “बाहरी तत्त्व” को कैम्पस में धर्म प्रचार करते हुए पकड़ लिया था, परन्तु IIT प्रशासन इस गिरोह के इतने दबाव में हैं कि उसने “अवैध धर्मांतरण प्रचार” की धाराओं की बजाय सिर्फ अवैध घुसपैठ का मामला पुलिस में दर्ज करवाया. इस तरह धीरे-धीरे IIT के छात्रों का ब्रेनवॉश करके “अ-हिन्दूकरण” किया जा रहा है. 

हालाँकि जब तक मिशनरी-वामपंथी गिरोह का यह प्रयास IIT कैम्पस तक सीमित था, तब तक उनका वैचारिक खोखलापन सामने नहीं आया था. परन्तु जैसे ही यह विवाद राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा, तो तुरंत ही ज़ाहिर हो गया कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत के संस्कृत विरोधी, हिन्दू विरोधी तथा भारत विरोधी समूहों को आपस में जोड़ने के लिए जिस APSC समूह का गठन किया गया है वह वास्तव में पाखण्ड और वैचारिक दिवालिएपन से कितना बुरी तरह ग्रस्त है. परन्तु जब उनका उद्देश्य सिर्फ “दुष्प्रचार” ही करना हो तो क्या किया जा सकता है? पेरियार का नाम लेकर उसे आंबेडकर के साथ जोड़ना तो ठीक ऐसा ही जैसे “सावरकर-जिन्ना स्टडी सर्कल” का गठन किया जाए. इन दोनों व्यक्तित्त्वों को आपस में जोड़कर दक्षिण भारत में आम्बेडकर तथा उत्तर भारत में पेरियार को स्थापित करने की इस गिरोह की यह कोशिश निहायत ही फूहड़ है, क्योंकि आम्बेडकर और पेरियार, वैचारिक स्तर पर एक दूसरे से बिलकुल विपरीत दिशा में खड़े हैं.आंबेडकर तो निश्चित रूप से दलितों के मसीहा हैं, लेकिन पेरियार को दलितों से कोई विशेष मोह नहीं था, वे तो सिर्फ हिन्दी विरोधी द्रविड़ मानसिकता से ग्रसित थे. आईये इन दोनों का विरोधाभास उजागर करें, ताकि वाम-ईसाई गठजोड़ के इस षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश हो... 



१) आंबेडकर नस्लवादी नहीं थे:- ईवी रामास्वामी उर्फ “पेरियार” विशुद्ध रूप से नस्लवादी थे. पेरियार को “आर्य बाहरी नस्ल है” जैसे झूठे विचारों पर दृढ़ विश्वास था, जबकि दूसरी तरफ आंबेडकर विशुद्ध मानवतावादी थे, उन्होंने भी इस “आर्यन नस्ल वाली झूठी थ्योरी” का अध्ययन किया और इसे तत्काल खारिज कर दिया था. अपनी पुस्तक “शूद्र कौन हैं?” में आम्बेडकर ने साफ़ लिखा है कि “आर्य आक्रमण” का सिद्धांत बिलकुल गलत और गढा हुआ है. अपने एक अन्य लेख “अन-टचेबल्स” में वे लिखते हैं कि भारत के सामाजिक ढाँचे की संरचना का किसी नस्ल विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं है. जबकि “नस्लवादी श्रेष्ठता” से ग्रस्त पेरियार लिखते हैं कि “हम तमिलों का जन्म शासन करने के लिए हुआ है, पहले हम ही इस भूमि के राजा थे, लेकिन बाहरी आर्यों ने आक्रमण करके हमारी शक्ति, सत्ता और शानोशौकत को समाप्त किया है, हमें गुलाम बना दिया है. 

२) आंबेडकर “एकेश्वरवादी” नहीं थे :- ईवी रामास्वामी उर्फ पेरियार ने “विधुथलाई, दिनाँक 04 जून 1959) में लिखा है कि “मैं आपसे भगवान की पूजा नहीं करने को नहीं कहता, परन्तु आपको मुस्लिमों एवं ईसाईयों की तरह सिर्फ एक ही भगवान की पूजा करनी चाहिए”. जबकि दूसरी तरफ बीआर आंबेडकर ने ऐसे किसी भी विचार का कभी समर्थन नहीं किया. आंबेडकर का कहना था कि हमारा धर्म लोकतांत्रिक है और यह व्यक्ति की अंतरात्मा पर निर्भर करता है कि वह किस धर्म या पंथ अथवा ईश्वर को माने. आंबेडकर ने भी बौद्ध धर्म ही अपनाया था, इस्लाम नहीं. 

३) आंबेडकर लोकतंत्र में भरोसा रखते थे, पेरियार नहीं :- पेरियार पूरी तरह से लोकतंत्र के विरोधी थे, उन्हें तानाशाही पसंद थी. 08 फरवरी 1931 को एक सम्पादकीय में पेरियार लिखते हैं, “देश की सारी समस्याओं की जड़ लोकतंत्र ही है, एक ऐसे देश में जहाँ विभिन्न भाषाएँ, धर्म और जातियाँ मौजूद हैं और शिक्षा का स्तर बहुत कम है, लोकतंत्र कतई सफल नहीं हो सकता... सिर्फ लोकतंत्र से किसी का विकास होने वाला नहीं है..”. जबकि बीआर आंबेडकर तो स्वयं भारत के संविधान के रचयिता थे और यह उनका ही प्रसिद्ध वाक्य है कि, “सामाजिक लोकतंत्र एक जीवन पद्धति है, जो भारत की आत्मा में है तथा यही लोकतंत्र हमें स्वतंत्रता, समानता और जीवन मूल्य प्रदान करता है. 

४) ईवी रामास्वामी राष्ट्र-विरोधी थे, आंबेडकर नहीं :- दक्षिण के आर्य विरोधी, संस्कृत और हिन्दी विरोधी आंदोलन में यह बात स्पष्ट हुई थी कि पेरियार ने कभी भी भारत की स्वतंत्रता के बाद उसे “एक देश” के रूप में स्वीकार नहीं किया. वे हमेशा भारत को भाषाई और नस्लीय आधार पर छोटे-छोटे टुकड़ों में देखना चाहते थे. जबकि भीमराव आंबेडकर भारत की सांस्कृतिक विविधता में विश्वास रखते थे. आंबेडकर का मानना था कि भारत की राजनैतिक विविधता को मतदान की ताकत से और मजबूत किया जाना चाहिए. 



५) आंबेडकर संस्कृत समर्थक थे,जबकि पेरियार घोर-विरोधी :- यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि जब 1956 में एक आयोग द्वारा संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव आया था, उस समय संसद में संस्कृत भाषा के प्रबल समर्थन ने सिर्फ दो ही लोग खड़े हुए थे, पहले थे आंबेडकर और दूसरे ताजुद्दीन अहमद (और आज की सेकुलर-वामपंथी राजनीति की विडंबना और धूर्तता देखिए कि पिछले साठ साल में दलितों और मुस्लिमों को ही संस्कृत का विरोधी बना दिया गया). एक स्थान पर आंबेडकर लिखते हैं संस्कृत भाषा भारत की संस्कृति का खजाना है, यह भाषा व्याकरण, राजनीति, नाटक, कला, आध्यात्म, तर्क व आलोचना की मातृभाषा है..” (कीर, पृष्ठ 19). जबकि दूसरी तरफ ईवीआर यानी पेरियार संस्कृत और हिन्दी से घृणा करते थे. उनके द्वारा लिखे लेखों के संकलन “द ग्रेट फ़ाल्सहुड”, विधुतलाई, 31 जुलाई 2014) के अनुसार “...संस्कृत भाषा आर्यों और ब्राह्मणों की भाषा है. ब्राह्मण जानबूझकर संस्कृत में बात करते हैं ताकि वे खुद को अधिक ज्ञानी साबित कर सकें...”. 

६) अम्बेडकर यहूदियों के समर्थक थे, लेकिन पेरियार यहूदियों से घृणा करते थे :- पेरियार ने अपने लेखों द्वारा हमेशा ब्राह्मणों की तुलना यहूदियों से की है. पेरियार के अनुसार जिस प्रकार यहूदियों का कोई देश नहीं है, उसी प्रकार ब्राह्मणों का भी कोई देश नहीं है, इसलिए इस नस्ल को समाप्त हो जाना चाहिए. तत्कालीन तमिलनाडु में पेरियार का वह कथन बेहद कुख्यात हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि, “यदि साँप और ब्राह्मण एक साथ दिखाई दें तो पहले ब्राह्मण को मारो, क्योंकि साँप के तो सिर्फ फन में जहर होता है, लेकिन ब्राह्मण के पूरे शरीर में..”. वहीं दूसरी तरफ हिन्दू समाज को तोड़ने में सक्रिय मिशनरियों के छद्म रूप से प्रिय अम्बेडकर कभी भी ब्राह्मणों के विरोध में नहीं थे. अम्बेडकर की यहूदियों के प्रति सहानुभूति रही. उन्होंने इज़राईल का भी समर्थन किया था. मिशनरी-वामपंथी दुष्प्रचार यह है कि अम्बेडकर ब्राह्मण विरोधी थे, जबकि ना तो वे ब्राह्मण विरोधी थे और ना ही संस्कृत विरोधी. जब अम्बेडकर ने “पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी” के तहत मुम्बई में सबसे पहला सिद्धार्थ कॉलेज शुरू किया तब उन्होंने एक ब्राह्मण प्रोफ़ेसर श्री एबी गजेंद्रगडकर से विनती की, कि वे इस कॉलेज के पहले प्रिंसिपल बनें.गजेंद्रगड़कर उस समय एलफिन्स्टन कॉलेज, मुम्बई के प्रिंसिपल थे, लेकिन उन्होंने अम्बेडकर को सम्मान देते हुए वहाँ से इस्तीफा देकर उनके कॉलेज को सम्हालने में मदद की. 

इन तमाम बिंदुओं के अलावा अम्बेडकर और पेरियार के बीच इतने ज्यादा विरोधाभास और विसंगतियाँ हैं कि IIT-मद्रास में जिस समूह का गठन जातिवादी जहर फैलाने के लिए हुआ है, उसके नाम पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाते हैं. डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने “महार रेजिमेंट” की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, तथा विभाजन के समय पाकिस्तान से मर-कट के आने वाले हिंदुओं की रक्षा हेतु आव्हान भी किया. जबकि नायकर पेरियार सिर्फ क्षेत्रवाद और आर्य नस्ल के प्रति घृणा तक ही सीमित रहे. इस्लाम के कुख्यात नरसंहारों पर आंबेडकर ने कभी भी वामपंथियों की तरह “दोहरा व्यवहार” नहीं किया. केरल के कुख्यात “मोपला नरसंहार” पर आंबेडकर ने जिस तरह खुल्लमखुल्ला कलम चलाई है, वह करना किसी प्रगतिशील बुद्धिजीवी के बस की बात नहीं. जिस तरह से वामपंथी लेखक प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगे पर लिखते समय अक्सर वैचारिक रूप से दाँये-बाँए होते रहते हैं, वैसा आंबेडकर ने कभी नहीं किया. वास्तव में आंबेडकर के साथ पेरियार का नाम जोड़ना परले दर्जे की वैचारिक फूहड़ता और पाखण्ड ही है.उल्लेखनीय है कि पेरियार का जन्म एक धनी परिवार में हुआ था. 1919 में काँग्रेस में अधिक महत्त्व नहीं मिलने के कारण वे कुंठित हो गए थे. उसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और काँग्रेस का विरोध करने का निश्चय किया तथा खुन्नस में आकर आर्य-द्रविड़ राजनीति शुरू की. 1940 आते-आते पेरियार ने “द्रविड़-नाडु” नामक राष्ट्र के समर्थन के बदले में मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग का भी समर्थन कर दिया. कहने का अर्थ यह है कि “सेकुलर-प्रगतिशील-वामपंथी” विचारधारा सिर्फ विरोधाभासों, पाखण्ड और वैचारिक दुराचार पर टिकी हुई है. उदाहरण के तौर पर, यदि इस गिरोह के गुर्गों द्वारा “गौमांस खाने के समर्थन” में लगाए गए पोस्टर पर महान क्रान्तिकारी भगतसिंह अपना चेहरा देखते, तो निश्चित ही आत्महत्या कर लेते. 

यदि आप स्वामी विवेकानन्द के विचारों अथवा योग की संस्कृति पर कुछ बोलते हैं, तो तत्काल आपको संघ का वैचारिक समर्थक घोषित कर दिया जाता है. जबकि यदि कोई प्रोफ़ेसर घोषित रूप से वामपंथियों का लाल-कार्डधारी है तब भी उसे “राजनैतिक विश्लेषक” अथवा “तटस्थ” व्यक्ति मान लिया जाता है. यही दोगलापन हमारी शिक्षा व्यवस्था को पिछले साठ वर्ष से डस रहा है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान के नाम पर जो शोध केन्द्र अथवा विभाग और फेलोशिप खोली गई हैं उनमें ऐसे ही “तथाकथित तटस्थ” लोग योजनाबद्ध तरीके से भरे गए हैं. फिर शिक्षा के इन पवित्र मंदिरों में छात्रों के बीच राजनीति, घृणा, जातिवाद फैलाया जाता है और उनके माध्यम से अपना उल्लू सीधा किया जाता है. कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में जो NGOs सामने आए थे, उनकी हरकतों और उसमें शामिल लोगों की पहचान से ही पता चल जाता है कि इनका “छिपा हुआ एजेण्डा” क्या है. 

तात्पर्य यह है कि IIT-मद्रास में HSS के तत्त्वावधान में चल रहे पाँच वर्षीय एमए के पाठ्यक्रम, प्रोफेसरों और ड्रामेबाज छात्रों ने इस महान तकनीकी-इंजीनियरिंग कॉलेज को बदनाम और बर्बाद करने का बीड़ा उठा लिया है. मानव संसाधन मंत्रालय एवं केन्द्र की भाजपा सरकार को इन संस्थानों पर न सिर्फ कड़ी निगाह रखनी चाहिए, बल्कि IIT जैसे संस्थानों में इस प्रकार के फालतू कोर्स जिनसे न सिर्फ “वैचारिक प्रदूषण” फैलता हो, बल्कि शासकीय संसाधनों और धन की भारी बर्बादी होती हो, तत्काल बन्द कर देना चाहिए... देश के शैक्षिक संस्थानों में ऐसे सैकड़ों “अड्डे” हैं, जहाँ से विभिन्न पाठ्यक्रमों द्वारा पिछली चार पीढ़ियों को वैचारिक गुलाम बनाया गया है. 

Presstitutes as Demon Maarich

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ध्यान बँटाने और भटकाने में सफल मारीच... 


“मारीच” नामक स्वर्णमृग की कथा हम सभी ने रामायण में पढ़ रखी है. मारीच का उद्देश्य था कि किसी भी तरह भगवान राम को अपने लक्ष्य से भटकाकर रावण के लिए मार्ग प्रशस्त करना. मारीच वास्तव में था तो रावण की सेना का एक राक्षस ही, लेकिन वह स्वर्णमृग का रूप धरकर भगवान राम को अनावश्यक कार्य में उलझाकर दूर ले गया था... नतीजा सीताहरण. वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार को एक वर्ष से अधिक हो गया है. लेकिन इस पूरे साल में लगातार यह देखने में आया है कि भारत के तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया के रवैये में कोई बदलाव आना तो दूर, वह दिनोंदिन गैर-जिम्मेदार, ओछा एवं मोदी-द्वेष की अपनी पुरानी बीमारी से ही ग्रसित दिखाई दे रहा है.भारत का मीडिया भी इस समय स्वर्णमृग “मारीच” की तरह व्यवहार कर रहा है. पिछली पंक्ति में मैंने मीडिया के लिए “तथाकथित” इसलिए लिखा, क्योंकि यह मीडिया कहने के लिए तो खुद को “राष्ट्रीय” अथवा नेशनल कहता है, लेकिन वास्तव में इस नॅशनल मीडिया (खासकर चैनलों) की सीमाएँ दिल्ली की सीमाओं से थोड़ी ही दूरी पर नोएडा, गुडगाँव या अधिक से अधिक आगरा अथवा हिसार तक खत्म हो जाती है... इसके अलावा मुम्बई के कुछ फ़िल्मी भाण्डों के इंटरव्यू अथवा फिल्मों के प्रमोशन तक ही इनका “राष्ट्रीय कवरेज”(?) सीमित रहता है. 


इस मीडिया को “मारीच” की उपमा देना इसलिए सही है, क्योंकि पिछले एक वर्ष से इसका काम भी NDA सरकार की उपलब्धियों अथवा सरकार के मंत्रियों एवं नीतियों की समीक्षा, सकारात्मक आलोचना अथवा तारीफ़ की बजाय “अ-मुद्दों” पर देश को भटकाना, अनुत्पादक गला फाड़ बहस आयोजित करना एवं जानबूझकर नकारात्मक वातावरण तैयार करना भर रह गया है. जिस तरह काँग्रेस आज भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री स्वीकार नहीं कर पा रही, ठीक उसी तरह पिछले बारह-तेरह वर्ष लगातार मोदी की आलोचना और निंदा में लगा मीडिया भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ उन्होंने इतना दुष्प्रचार किया, आज वह देश का प्रधानमंत्री बन चुका है.विकास के मुद्दों एवं सरकार के अच्छे कामों की तरफ से देश की जनता का ध्यान बँटाने की सफल कोशिश लगातार जारी है. जैसे ही सरकार कोई अच्छा सकारात्मक काम करने की कोशिश करती है या कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेती है अथवा विदेश में हमारे प्रधानमंत्री कोई लाभदायक समझौता करते हैं तो इनकी समीक्षा करने की बजाय हमारा “नेशनल मीडिया”(??) गैर-जरूरी मुद्दों, धार्मिक भेदभावों, जातीय समस्याओं से सम्बन्धित कोई ना कोई “अ-मुद्दे” लेकर सामने आता है तथा ऐसी चीख-पुकार सहित विवादों की ऐसी धूल उड़ाई जाती है कि देश की जनता सच जान ही ना सके. वह समझ ही ना सके कि वास्तव में देश की सरकार ने उनके हित में क्या-क्या निर्णय लिए हैं. आईये कुछ उदाहरणों द्वारा देखते हैं इस “मारीच राक्षस” ने भाजपा सरकार के कई उम्दा कार्यों को किस प्रकार पलीता लगाने की कोशिश की है. 


पाठकों को याद होगा कि कुछ माह पहले यमन नामक देश में शिया-सुन्नी युद्ध के कारण वहाँ पर काम कर रहे हजारों भारतीय फँस गए थे. इन भारतीयों के साथ विश्व के अनेक देशों के कर्मचारी भी युद्ध की गोलीबारी के बीच खुद को असहाय महसूस कर रहे थे. इनमें से अधिकाँश भारतीय केरल एवं तमिलनाडु के मुस्लिम भारतीय नागरिक हैं. ऐसी भीषण परिस्थितियों में फँसे हुए लोगों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को लगातार ट्वीट्स करके अपनी व्यथाएँ बताईं. सुषमा स्वराज ने भारत के विदेश मंत्रालय को तत्काल सक्रिय किया, उन भारतीयों की लोकेशन पता की तथा उन्हें वहाँ के दूतावास से संपर्क करने की सलाह दी. सिर्फ इतना ही नहीं, सुषमा स्वराज ने अपने अधीनस्थ काम कर रहे पूर्व फ़ौजी और इस परिस्थिति के अनुभवी जनरल वीके सिंह को बड़े-बड़े मालवाहक हवाई जहाज़ों के साथ यमन में तैनात कर दिया. जनरल साहब ने अपना काम इतनी बखूबी निभाया कि वे वहाँ से तीन हजार से अधिक भारतीयों को वहाँ से निकाल लाए. लेकिन भारत में बैठे “मारीचों” को यह कतई नहीं भाया.जनरल सिंह साहब की तारीफ़ करना तो दूर, इन्होंने भारत में अपने-अपने चैनलों पर “Presstitutes” शब्द को लेकर खामख्वाह का बखेड़ा खड़ा कर दिया. अर्थात यमन से बचाकर लाए गए मुस्लिमों का क्रेडिट कहीं मोदी सरकार ना लूट ले जाए, इसलिए सुषमा स्वराज एवं वीके सिंह के इस शानदार काम पर विवादों की धूल उड़ाई गई... 


इन “मारीच राक्षसों” ने ठीक ऐसी ही हरकत नेपाल भूकम्प के समय भारत की सेना द्वारा की जाने वाली सर्वोत्तम एवं सबसे तेज़ बचाव कार्यवाही के दौरान भी की. उल्लेखनीय है कि नेपाल में आए भूकम्प के समय खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री को ट्वीट कर के सबसे पहले त्वरित सन्देश दिया था. भूकम्प की तीव्रता पता चलते ही प्रधानमंत्री कार्यालय ने तीन घंटे के भीतर भारत के NDRF को सक्रिय कर दिया तथा भारतीय सेना का पहला जत्था पाँच घंटे के अंदर नेपाल पहुँच चुका था. नेपाल में बचाव एवं राहत का सबसे बड़ा अभियान सेना आरम्भ कर चुकी थी तथा उसका नेपाल सरकार के साथ समन्वय स्थापित हो चुका था. नेपाल की त्रस्त एवं दुखी जनता भी भारत की इस सदाशयता तथा भारतीय सेना के इस शानदार ऑपरेशन से अभिभूत थी. चीन और पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से रोकने तथा एक गरीब देश में आपदा के समय पश्चिमी मिशनरी की धूर्त धर्मान्तरण पद्धतियों को रोकने हेतु मोदी सरकार तथा भारतीय सेना ने अपना मजबूत कदम वहाँ जमा लिया था... लेकिन भारतीय मीडिया और कथित बुद्धिजीवियों को एक “हिन्दू राष्ट्र” में की जाने वाली मदद भला कैसे पचती? लिहाज़ा यह “मारीच” वहाँ भी जा धमका.गरीब उर बेघर नेपालियों के मुँह में माईक घुसेड़कर उनसे पूछा जाने लगा, “आपको कैसा लग रहा है?”, बेहद भले और सौम्य नेपालियों को कैमरे के सामने घेर-घार कर उनसे जबरिया उटपटांग सवाल किए जाने लगे. इस आपदा के समय भारतीय सेना की मदद करना तो दूर, इन मारीचों ने दूरदराज के अभियानों के समय हेलीकॉप्टरों तथा सेना के ट्रकों में भी घुसपैठ करते हुए उनके काम में अड़ंगा लगाया. ज़ाहिर है कि चीन का मीडिया इसी मौके की ताक में था, उसने जल्दी ही दुष्प्रचार आरम्भ कर दिया, नतीजा यह हुआ कि भारत सरकार तथा भारतीय सेना की इस पहल का लाभ तो मिला नहीं, उल्टा वहाँ चीन-पाकिस्तान प्रायोजित “इन्डियन मीडिया गो बैक” के शर्मनाक नारे लगाए जाने लगे. जो मीडिया इस भीषण आपदा के समय एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था, उस मीडिया के कुछ नौसिखिए और कुछ चालाक कर्मियों तथा दिल्ली के एसी कमरों में बैठकर समाजसेवा करने वाले कुछ बुद्धिजीवियों ने भारतीय सेना और मोदी सरकार की मिट्टी-पलीद करने में कोई कसर बाकी न रखी. 


तीसरा उदाहरण है, बेहद चतुराई और धूर्तता के साथ गढा गया IIT_मद्रास का “अम्बेडकर-पेरियार” विवाद.जैसा कि सभी जानते हैं, मोदी सरकार द्वारा शपथ ग्रहण के पहले दिन से ही भारतीय चैनलों एवं (कु)बुद्धिजीवियों के सर्वाधिक निशाने पर यदि कोई है, तो वे हैं मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी. जिस प्रकार उन्होंने स्कूली शिक्षा, मध्यान्ह भोजन व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदम उठाए, वर्षों से चले आ रहे भारत के सही इतिहास विरोधी पाठ्यक्रमों की समीक्षा करने तथा महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों पर नकेल कसना आरम्भ किया, उसी का नतीजा है कि वर्षों से शिक्षा क्षेत्र में काबिज “एक गिरोह विशेष” शुरू से ही बेचैन है. यह कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी गिरोह अभी तक दिल्ली के एक खास विश्वविद्यालय द्वारा अपनी घिनौनी राजनीति के साथ, समाज को तोड़ने वाले “किस ऑफ लव” अथवा “समलैंगिक अधिकारों” जैसे फूहड़ आंदोलनों के सहारे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाए हुए था. परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले सुधारों तथा डॉक्टर दीनानाथ बत्रा द्वारा भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के सच्चे प्रकटीकरण के प्रयासों ने इस बौद्धिक गैंग को तगड़ा झटका दिया. IIT-मद्रास में “आम्बेडकर-पेरियार स्टडी ग्रुप” द्वारा रचा हुआ “हाय दैया, ज़ुल्म हुआ!!” छाप राजनैतिक नाटक इसी खुन्नस का नतीजा था. जिस मामले में मानव संसाधन मंत्रालय अथवा स्मृति ईरानी का कोई सीधा दखल तक नहीं था, उसे लेकर आठ-दस दिनों तक दिल्ली में नौटंकी खेली गई. “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हनन” एवं “विचारों को कुचलने का फासीवाद” जैसे सदैव झूठे नारे दिए गए. इस मामले में इस गिरोह का पाखण्ड तत्काल इसलिए उजागर हो गया क्योंकि जहाँ एक तरफ तो वे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की बात करते रहे, वहीं दूसरी तरफ स्मृति ईरानी द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन में हस्तक्षेप का आरोप भी लगाते रहे. “मारीचों” ने हमेशा की तरह इस मामले का भी कतई अध्ययन नहीं किया था, उन्हें “रावण” की तरफ से जैसा निर्देश मिलता रहा वे बकते रहे... उन्हें अंत तक समझ में नहीं आया कि वे स्मृति ईरानी द्वारा आईआईटी में दखल का विरोध करें या उनके द्वारा बयान किए गए स्वायत्तता के मुद्दे पर उनका घेराव करें.अंततः आठ दिन बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि सारा झमेला IIT-मद्रास का अंदरूनी झगड़ा ही था, जिसे कुछ जातिवादी प्रोफेसरों एवं सुविधाभोगी छात्रों द्वारा जबरन रंगा गया था... तब इन्होंने अपनी ख़बरों का फोकस तत्काल दूसरी तरफ कर लिया. परन्तु मोदी सरकार को यथासंभव बदनाम करने तथा मंत्रियों पर खामख्वाह का कीचड़ उछालने में वे कामयाब हो ही गए... और वैसे भी इन मारीचों का मकसद भारत की छवि देश-विदेश में खराब करना था और है, वह पूरा हुआ. हालांकि एक “सबसे तेज़” चैनल ने खुद को अधिक समझदार साबित करने की कोशिश में स्मृति ईरानी की कक्षा लेनी चाही, परन्तु उसका यह कुत्सित प्रयास ऐसा फँसा कि स्मृति ईरानी ने अपनी तेजतर्रार छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए, एक तथाकथित पत्रकार की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं एवं वे महोदय लाईव कार्यक्रम में पिटते-पिटते बचे. 

जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी विदेश दौरे पर जाते हैं, वहाँ किसी महत्त्वपूर्ण समझौते अथवा दोनों देशों के बीच व्यापार सहमति के बारे में कोई निर्णय लेते हैं, ठीक उसी समय यहाँ भारत में “मारीच” अपना “ध्यान भटकाओ” खेल शुरू करते हैं. हाल ही की घटना का उदाहरण देना ठीक रहेगा. प्रधानमंत्री बांग्लादेश के दौरे पर गए. वहाँ पर उन्होंने पिछले चालीस वर्ष से उलझा हुआ भूमि के टुकड़े वाला विवाद समझौता करके हमेशा के लिए समाप्त कर दिया. इस समझौते में पक्ष-विपक्ष सभी की पूर्ण सहमति थी, परन्तु देश की जनता में भ्रम ना फैले इस हेतु किसी भी चैनल या प्रमुख अखबार ने इस समझौते पर कोई लेखमाला अथवा बहस आयोजित नहीं की, कि भूमि की इस अदला-बदली से दोनों देशों को किस प्रकार फायदा होगा? अथवा अभी तक दोनों देशों को क्या-क्या नुक्सान हो रहा था? इसकी बजाय नरेंद्र मोदी द्वारा ढाकेश्वरी मंदिर के दर्शन की खबरों को प्रमुखता दी गई. इसी दौरे में प्रधानमंत्री ने कोलकाता से शुरू होकर बांग्लादेश, म्यांमार होकर थाईलैंड तक जाने वाले सड़क मार्ग पर सभी देशों की आम सहमति को लेकर भी एक समझौता किया, क्या किसी चैनल ने भविष्य के लिए फायदेमंद इस प्रमुख खबर को दिखाया? नहीं दिखाया.क्योंकि इन तमाम चौबीस घंटे अनथक चलने वाले ख़बरों के भूखे बकासुर चैनलों को वास्तविक ख़बरों के लिए वाद-विवाद, प्लांट की गई खबरों, कानाफूसियों अथवा नकारात्मकता पर निर्भर रहने की आदत हो गई है. 


म्यांमार से अपनी गतिविधियाँ चलाने वाले आतंकी संगठनों के एक गुट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर हमला करके अठारह जवानों को शहीद कर दिया. इस पर चैनलों ने खूब हो-हल्ला मचाया. तमाम कथित बुद्धिजीवियों एवं मोदी-द्वेषियों ने 56 इंच का सीना, 56 इंच का सीना कहते हुए खूब खिल्ली उड़ाई... लेकिन जब कुछ ही दिनों बाद मनोहर पर्रीकर के सशक्त नेतृत्त्व एवं अजीत डोभाल की रणनीति एवं हरी झंडी के बाद भारत की सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों को नष्ट करते हुए दर्जनों आतंकियों को ढेर कर दिया तब भारत में यही “मारीच” इस गौरवशाली खबर को पहले तो दबाकर बैठ गए. लेकिन जब सरकार और सेना ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति देकर इस घटना के बारे में बताया तो कहा जाने लगा कि “सेना की ऐसी कार्रवाईयों का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए”... अर्थात इन “दुर्बुद्धिजीवियों” के अनुसार भारत की सेना के जवान मारें जाएँ तो ये खूब बढ़चढ़कर उसे दिखाएँ, लेकिन वर्षों बाद देश के नेतृत्व की वजह से सीमा पार करके हमारे सैनिकों ने जो बहादुरी दिखाई है उसकी चर्चा ना की जाए. इनका यही नकारात्मक रवैया पहले दिन से है.इसीलिए देश को NDA सरकार की अच्छी बातों की ख़बरों के बारे में बहुत देर से, या बिलकुल भी पता नहीं चलता. जबकि विवाद, चटखारे, झगड़े, ऊटपटांग बयानों, धार्मिक विद्वेष, जातीयतावादी ख़बरों के बारे में जल्दी पता चल जाता है. 

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के प्रति यह नकारात्मकता सिर्फ मीडिया अथवा संस्थानों में बैठे (कु)बुद्धिजीवी छाप “मारीच” ही फैला रहे हैं. असल में इन मारीचों को भाजपा की अंदरूनी कलह तथा सरकार में बैठे कुछ शक्तिशाली मंत्री ही ख़बरें परोस रहे हैं, खाद-पानी दे रहे हैं. विदेश मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज की जबरदस्त सफलता तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता भारत में कुछ खास लोगों को पची नहीं और उन्होंने ललित मोदी के बहाने सुषमा स्वराज पर तीर चलाने शुरू कर दिए. उल्लेखनीय है कि पिछले चार दशक से अधिक समय से राजनीति के क्षेत्र में रहीं सुषमा स्वराज पर आज तक भ्रष्ट आचरण संबंधी कोई आरोप नहीं लगा है. कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं से उनके मधुर सम्बन्ध हों अथवा ललित मोदी से उनके पारिवारिक सम्बन्ध हों वे हमेशा विवादों से परे रही हैं, उनकी छवि आमतौर पर साफसुथरी मानी जाती रही है. लेकिन ललित मोदी से सम्बन्धित ताज़ा विवाद में सुषमा स्वराज पर जिस तरह से कीचड़ उछाला गया और कीर्ति आज़ाद ने “आस्तीन के साँप” शब्द का उल्लेख किया वह साफ़ दर्शाता है कि इस सरकार में सब कुछ सही नहीं चल रहा. ज़ाहिर है कि “एक विशिष्ट क्लब” वाले लोग हैं, जो नहीं चाहते कि यह सरकार आराम से काम कर सके. इसीलिए सरकार में जो “मीडिया-फ्रेंडली” नेता हैं उन पर कभी कोई उँगली नहीं उठती. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में ये “मारीच” धीरे-धीरे इतने अंधे हो चले हैं कि मोदी से घृणा करते-करते वे भारत की संस्कृति और देश से ही नफरत और अपने ही देश को हराने की दिशा में जा रहे हैं. पाठकों को याद होगा कि हाल ही में राहुल गाँधी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि मोदी के “मेक इन इण्डिया” कार्यक्रम से सिर्फ अंडा मिलेगा. इसका अर्थ यह होता है कि राहुल गाँधी समेत सभी प्रगतिशील बुद्धिजीवी चाहते हैं कि “मेक इन इंडिया” योजना फेल हो जाए. भारत में रोजगारों का निर्माण ना हो तथा चीन के सामान भारत समेत पूरी दुनिया को रौंदते रहें. ये कैसी मानसिकता है?मारीच राक्षसों का यही रवैया “जन-धन योजना” को लेकर भी था तथा यही रवैया 330 तथा 12 रूपए वाली “जन-सुरक्षा बीमा” योजना को लेकर भी है. यानी चाहे जैसे भी हो सरकार की प्रत्येक योजना की आलोचना करो. चैनलों पर गला फाड़कर विरोध करो. बिना सोचे-समझे अपने-अपने आकाओं के इशारे पर अंध-विरोध की झड़ी लगा दो, फिर चाहे देश या देशहित जाए भाड़ में. जरा याद कीजिए कि जब देश की नौसेना ने मुम्बई-कराची के बीच पाकिस्तान की एक संदिग्ध नौका को उड़ा दिया था तब ये कथित बुद्धिजीवी और “सेमी-पाकिस्तानी” चैनल कैसे चीख-पुकार मचाए हुए थे? सभी को अचानक मानवाधिकार और अन्तर्राष्ट्रीय क़ानून वगैरह याद आ गए थे. पाकिस्तान से आने वाली बोट और उसमें मरने वाले आतंकवादियों के साथ सहानुभूति दिखाने की जरूरत किसे और क्यों है? परन्तु इन मारीचों को भारत की सुरक्षा अथवा सेना की जाँबाजी से कभी भी मतलब नहीं था और ना कभी होगा. इनका एक ही मकसद है नकारात्मकता फैलाना, देश को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक चले जाना. 

अंत में हम संक्षेप में भाजपा सरकार के कुछ और महत्त्वपूर्ण निर्णयों तथा योजनाओं के बारे में देखते हैं जिन पर इन चैनलों ने अथवा स्तंभकारों या लेखकों और बुद्धिजीवियों(?) ने कभी भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. 


१) आधार कार्ड के सहारे गैस सिलेंडरों को जोड़ने की महती योजना DBTL “पहल” (PAHAL) के कारण इस सरकार ने पिछले एक साल में लगभग दस हजार करोड़ रूपए की बचत की है जो कि इस क्षेत्र में दी जाने वाली कुल सब्सिडी अर्थात तीस हजार करोड़ का एक तिहाई है.लगभग चार करोड़ फर्जी गैस कनेक्शन पकड़े गए हैं जिनके द्वारा एजेंसियाँ भ्रष्टाचार करती थीं. क्या इस मुद्दे पर कभी किसी “बुद्धिजीवी मारीच” ने सरकार की तारीफ़ की?? नहीं की. 

२) पिछले एक वर्ष में विद्युत पारेषण की कार्यशील लाईनों में 32% की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यूपीए सरकार के दौरान अंतिम एक वर्ष में विद्युत पारेषण की जो लाईनें सिर्फ 16743 किमी ही शुरू हुई थीं, मोदी सरकार ने सिर्फ एक वर्ष में उसे बढ़ाकर 22101 किमी तक पहुँचा दिया गया है. क्या किसी अखबार ने इसके बारे में सकारात्मक बातें प्रकाशित कीं?? नहीं की.  

३) वर्ष 2013-14 में यूपीए सरकार ने एक साल में सिर्फ 3621 किलोमीटर हाईवे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी और उस पर काम आरम्भ हुआ, जबकि इस NDA सरकार ने विगत एक वर्ष में 7980 किलोमीटर हाईवे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देकर उस पर द्रुत गति से काम भी आरंभ कर दिया है. अर्थात पूरे 120% की वृद्धि. क्या इस काम के लिए नितिन गड़करी की तारीफ़ नहीं की जानी चाहिए? लेकिन क्या “मारीच राक्षसों” ने ऐसा किया? नहीं किया...बल्कि गड़करी के खिलाफ उल्टी-सीधी बिना सिर-पैर की ख़बरों को प्रमुखता से स्थान दिया गया. 


आखिर ये (कु)बुद्धिजीवी इस सरकार के प्रति नफरत से इतने भरे हुए क्यों हैं? ऐसा क्यों है कि पिछले तेरह साल से “गुजरात 2002” नामक दिमागी बुखार इन्हें रातों को सोने भी नहीं देता? जनता द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नामक व्यक्ति से घृणा का यह स्तर लगातार बढ़ता ही क्यों जा रहा है? ऐसा क्यों है कि विभिन्न मुद्दों पर जो “गिरोह” पिछले साठ वर्ष से सोया हुआ था, अचानक उसे सिर्फ एक वर्ष में ही सारे परिणाम चाहिए? इस गैंग को एक ही वर्ष में काला धन भी चाहिए... इस सरकार के एक ही वर्ष में सभी भ्रष्टाचारियों को जेल भी होना चाहिए... वास्तव में इस “वैचारिक खुन्नस” की असली वजह है मोदी सरकार द्वारा इस गिरोह के “पेट पर मारी गई लात”. जी हाँ!!! पिछले एक वर्ष में इस मारीच के मालिक अर्थात दस मुँह वाले NGOs छाप रावण के पेट पर जोरदार लात मारी गई है. विदेशों से आने वाली “मदद”(??) को सुखाने की पूरी तैयारी की जा चुकी है.भारत में अस्थिरता और असंतोष फैलाने वाले दो सबसे बड़े गिरोहों अर्थात “ग्रीनपीस” पर पाबंदियाँ लगाई गईं जबकि फोर्ड फाउन्डेशन से उनके चन्दे का हिसाब-किताब साफ़ करने को कहा गया है. इन दो के अलावा कुल 13470 फर्जी NGOs को प्रतिबंधित किया जा चुका है. क्योंकि इनमें से अधिकाँश गैर-सरकारी संगठन सिर्फ कागजों पर ही जीवित थे. इनका काम विदेशों से चन्दा लेकर भारत की नकारात्मक छवि पेश करना तथा असंतुष्ट गुटों को हवा देकर अपना उल्लू सीधा करना भर था. ज़ाहिर है कि इस सरकार की अच्छी बातें जनता तक नहीं पहुँचने देने तथा देश के प्रमुख मुद्दों से ध्यान भटकाते हुए फालतू की बातों पर चिल्लाचोट मचाना इन मारीचों की फितरत में आ चुका है. संतोष की बात सिर्फ यही है कि देश की जनता समझदार होती जा रही है. सोशल मीडिया की बदौलत उस तक सही बातें पहुँच ही जाती हैं. इन चैनलों-अखबारों की “दुकानदारी” कमज़ोर पड़ती जा रही है, विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है, इसीलिए ये अधिक शोर मचा रहे हैं... परन्तु इन मारीचों को अंततः मरना तो “राम” के हाथों ही है.

Puri Jaganath Case - Scrap Religious Endowment Act

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ब्रह्म विवादः ओडिशा के मुख्यमंत्री की सेकुलर चुप्पी 

हिंदुओं के मामले में सेकुलरिज़्म"किस तरह सुविधाजनक चुप्पी ओढ़ लेता है यह देखना बेहद दुखदायी होता है. उड़ीसा में नवीन पटनायक साहब काफी वर्षों से मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में धर्मांतरण को रोकना तो दूर, उस पर थोड़ी लगाम कसने में भी वे नितान्त असमर्थ सिद्ध हुए हैं. वेटिकन के गुर्गों द्वारा भारत के "लाल झंडाबरदार"की सहायता से स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या एवं कंधमाल की घटनाएं आज भी हिंदुओं के दिलो-दिमाग पर ताज़ा है. पुरी जगन्नाथ हिंदुओं का एक और प्रमुख तीर्थ-स्थल है, लेकिन धीरे-धीरे यहाँ भी प्राचीन परम्पराओं के साथ खिलवाड़ की शुरुआत हो चुकी है, जो आगे चलकर विकृति बनते देर नहीं लगेगी. एक शासक एवं सभी धर्मों के प्रति रक्षा भाव का कर्त्तव्य होने के नाते नवीन पटनायक का यह दायित्व बनता था कि वे इस मामले में अपनी तरफ से कोई पहल करें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ... इस विवाद से एक बात और स्पष्ट होती है कि मंदिरों के रखरखाव एवं नियंत्रण में शासकीय हस्तक्षेप किस तरह से हिंदुओं को दुखी किए हुए है.

मामला कुछ यूँ है कि - पुरी में महाप्रभु श्रीजगन्नाथ के नव कलेवर के दौरान पुराने विग्रह से नये विग्रह में ब्रह्म परिवर्तन की प्रक्रिया को लेकर जो विवाद पैदा हुआ है, उससे करोडों हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है. पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य पूज्य निश्चलानंद सरस्वती तथा श्रीजगन्नाथ के प्रथम सेवक पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव ने इस मामले में गहरा असंतोष व्यक्त किया है. करोडों भक्तों की भावनाएं आहत होने के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की चुप्पी ने भक्तों के असंतोष को और बढा दिया है. 


पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर के परंपरा के अनुसार किसी भी वर्ष जब भी जोडा आषाढ (अर्थात दो आषाढ) माह आते हैं तब पुरी मंदिर में मूर्तियों का अर्थात विग्रहों का नव कलेवर होता है. यह आम तौर पर 12 से 19 साल के बीच होता है. मंदिर परंपरा के अनुसार नव कलेवर में चारों मूर्तियों भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा तथा श्री सुदर्शन के नीम के पेड से बने विग्रहों का परिवर्तन कर उनका नया विग्रह बनाया जाता है, अर्थात नई लकड़ी से नई मूर्ति स्थापित की जाती है. नव कलेवर की प्रक्रिया कई माह पूर्व "वनयाग यात्रा"से शुरु होती है. इस दौरान एक विशेष प्रकार के सेवादार जिन्हे दइतापति कहा जाता है, वे विग्रहों के लिए उपय़ुक्त नीम के पेड की तलाश हेतु जंगल में जाते हैं. इन पेडों के चयन के लिए निर्धारित व कडा सिद्धांत है, जिसके तहत पेडों में दिव्य चिह्न जैसे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि चिह्न होना जरुरी है तथा कोई सांप उन पेडों को सुरक्षा देता हुआ पाया जाए. ये पेड किसी श्मशान व नदी के निकट होने चाहिए.


नई मूर्तियों अर्थात विग्रहों के लिए पेड की पहचान होने के बाद, उसकी संपूर्ण रीति नीति से पूजा की जाती है तथा इन पेडों को काट कर पुरी के श्रीमंदिर लाया जाता है. इसके बाद निर्धारित समय में इस कार्य को हजारों साल से करते आ रहे सेवायतों (बढई) द्वारा इन चार नए विग्रहों का निर्माण शुरू किया जाता है. मंदिर परंपरा के अनुसार चार वरिष्ठ दइता जिन्हें बाडग्राही कहा जाता है, वे पुराने विग्रहों से पवित्र ब्रह्म (आत्मा) को नये विग्रहों में स्थानांतरित करते हैं. यह प्रक्रिया दर्शाती है कि शरीर का तो नाश होता है लेकिन आत्मा अविनाशी है. यह केवल एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है. यह सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण जगत के नाथ के साथ भी होता है. नव कलेवर प्रक्रिया में यह ब्रह्म परिवर्तन सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है. इस बार ब्रह्म परिवर्तन को लेकर हुए विवाद के केन्द्र में दइतापति नियोग व नवीन पटनायक सरकार नियुक्त श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन हैं.

स्थापित परंपरा के अनुसार ब्रह्म का परिवर्तन, मध्य रात्रि को घने अंधेरे में किया जाता है, लेकिन इस बार ब्रह्म परिवर्तन काफी देरी से अर्थात अगले दिन दोपहर को संपन्न हुआ.इस कार्य को करने के लिए मंदिर के अंदर केवल दइतापति ही रहते हैं, तथा और किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं होती. इस बार के ब्रह्म परिवर्तन में हुई देरी तथा विभिन्न दइतापतियों द्वारा विरोधाभासी बयान दिये जाने के कारण, पूरे विश्व में श्रीजगन्नाथ के भक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं.

दइतापतियों द्वारा दिये जा रहे बयान के अनुसार, ब्रह्म परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए इन दइताओं में भी विवाद हुआ. अनेक दइता इसमें शामिल होना चाहते थे, जो कि हजारों साल की मंदिर परंपरा के खिलाफ है. केवल इतना ही नहीं, यह धार्मिक प्रक्रिया पूर्ण रुप से गुप्त होनी चाहिए और इसीलिए इसे "गुप्त सेवा"भी कहा जाता है. लेकिन कुछ दइताओं द्वारा मंदिर के अंदर मोबाइल फोन लेकर जाने की बात भी अब सामने आने लगी है.दइताओं के बीच हुए इस कटु विवाद के कारण ब्रह्म परिवर्तन जो कि मध्य रात्र को सम्पन्न हो जाना चाहिए था, वह अगले दिन दोपहर को पूरा हुआ.

इस घटना के बाद शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा – शिक्षा, रक्षा, संस्कृति, सेवा, धर्म व मोक्ष का संस्थान श्रीमंदिर पुरी को छल-बल से डंके की चोट पर दिशाहीनता की पराकाष्ठा तक पहुंचाकर, अराजक तत्वों को प्रश्रय देने वाला ओडिशा का शासनतंत्र, शीघ्र ही अपनी चंगुल से श्रीमंदिर पुरी को मुक्त करे. जब भक्तों के असंतोष का दबाव बढने लगा, तब श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने कहा कि मामले की जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कडी कार्रवाई की जाएग. भाजपा व कांग्रेस ने इस मामले में कहा है श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के मुख्य प्रशासक सुरेश महापात्र ही इसके लिए जिम्मेदार हैं तथा जो दोषी है वह खुद कैसे जांच कर सकता है

भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय महापात्र ने कहा कि हजारों साल की धार्मिक परंपरा को तोड दिया गया है. एक समय जगन्नाथ मंदिर पर हमला करने वाला कालापहाड भी ब्रह्म को स्पर्श करने का साहस नहीं कर सका था. लेकिन बीजद नेता व सरकार ने इसे दिन के समय दोपहर में किया, तथा भगवान जगन्नाथ के हजारों साल की परंपरा को तोडा है. जिन दइताओं के कारण यह विवाद हुआ, वे बीजद पार्टी के नेता हैं. इसलिए इस मामले में मुख्यमंत्री ने आश्चर्यजनक रुप से चुप्पी साध रखी है. जिस कारण भक्तों में भारी असंतोष है.

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि मंदिरों का प्रशासन, नियंत्रण एवं धार्मिक सत्ता पूर्णरूप से सेकुलर शासन के हाथ में होने से आए दिन इस प्रकार के धार्मिक हस्तक्षेप, परम्पराओं का खंडित होना एवं धन-संपत्ति-चढावे के गबन के मामले सामने आते रहते हैं. अतः मोदी सरकार को जल्दी से जल्दी Religious Endowment Act में बदलावकरके हिन्दुओं के सभी प्रमुख मंदिरों से शासन का नियंत्रण समाप्त कर, उन्हें धर्माचार्यों के हवाले करना चाहिए.

अंग्रेजों के समय बनाए गए इस क़ानून में कितना अन्याय और लूट छिपी हुए है यह इसी ब्लॉग पर एक अन्य आलेख से और भी स्पष्ट होता है... समय निकालकर इसे भी पढ़ें... 
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(प्रस्तुत लेख :- उड़ीसा से भाई समन्वय नंद की रिपोर्ट से साभार... चित्र सौजन्य भी उन्हीं द्वारा)

What is Naivaidya and Prasad...

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“नैवेद्यं” की परंपरा...

आजकल पश्चिमी शिक्षा एवं वामपंथी दुष्प्रचार तथा सेकुलर ब्रेनवॉश के कारण हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं संतों के खिलाफ बोलना व उनकी खिल्ली उड़ाना आम बात हो गई है. सामान्यतः कोई भी हिन्दू ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों पर जल्दी उत्तेजित नहीं होता, परन्तु धीरे-धीरे यह प्रमाण बढ़ता ही जा रहा है. ऐसी ही एक घटना हाल ही में घटित हुई जब सोशल मीडिया पर हिन्दू संस्कृति का मजाक उड़ाने वाले एक “मित्र”(??) से चर्चा हुई... 

एक मित्र की फेसबुक वाल पर, उसके दूसरे मित्र “सलीम” ने उसे एक चित्र दिखाते हुए मजाकिया अंदाज में कहा – “तुम्हारे भगवानों को तो अक्सर अपच की शिकायत होती होगी??करोड़ों लोग ढेरों मंदिरों और घरों में उन्हें नैवेद्य समर्पित करते हैं. जैसा कि एक सहिष्णु हिन्दू करता है, उसने भी शुरू में अपने मित्र के इस कमेन्ट को हलके-फुल्के मजाक के तौर पर लिया और कहा – “हाँ, खासकर उस स्थिति में जब आजकल के पदार्थों में केमिकल की मात्रा भी काफी बढ़ गई है...”.  


लेकिन लगता था, “सलीम” बात आगे बढ़ाने के मूड में है... उसने कहा, “नहीं, मजाक नहीं भाई... जब मैं लाखों हिंदुओं को भगवान की इन मूर्तियों के समक्ष नैवेद्यं और प्रसाद अर्पित करते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्या ये निष्प्राण मूर्तियाँ कभी ये पदार्थ खा सकती हैं? क्या भगवान इस नैवेद्य को खाते हैं? कैसी मूर्खतापूर्ण और बकवास परंपरा है... 

मित्रने कहा - हाँ, ये सही है कि हम हिन्दू लोग भगवान को नैवेद्य समर्पित करते हैं, जो वापस हमारे पास “प्रसाद” के रूप में आता है. यह परंपरा तो हम घर में, मंदिरों में सदियों से निभाते आ रहे हैं. 

सलीम : वही तो मैं कह रहा हूँ, आप जैसे पढ़े-लिखे पत्रकार भी ऐसा करते हैं तो आश्चर्य होता है. क्या आप नहीं जानते कि ये नैवेद्य भगवान नहीं खा सकते? ये मूर्तियाँ अपना मुँह नहीं खोल सकतीं? जब भगवान एक सामान्य व्यक्ति की तरह बोल नहीं सकते, अपना मुँह नहीं खोल सकते तो उन्हें यह नैवेद्य अर्पित करना सिर्फ दिखावा है, इसमें आध्यात्म का कोई अंश नहीं है... ऐसे लोग मूर्ख और अंधविश्वासी होते हैं...बड़ा दुःख होता है देखकर... (कथित नास्तिक वामपंथी तर्क सिर चढ़कर बोल रहा था). वास्तव में देखा जाए तो भगवान आपसे कुछ नहीं चाहता, लेकिन आप भगवान से सब कुछ चाहते हैं. तो हमें सिर्फ भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए, जैसा कि इक्कीसवीं सदी के पढ़े-लिखे लोग करते हैं... ये नैवेद्यं वगैरह सिर्फ दिखावा है. 

मित्र : तो क्या भगवान हमारी प्रार्थनाएँ सुनेंगे??  

सलीम : हाँ जरूर... उन्हें आपका भोजन या नैवेद्य नहीं चाहिए. भगवान तो अपने-आप में परिपूर्ण और शक्तिशाली होते हैं, दुनिया की हर बात उन्हीं की मर्जी से चलती है... फिर ये नैवेद्य दिखाने का ढोंग किसलिए? 

मित्र : सलीम भाई, तुम कहना चाहते हो कि भगवान यानी ये मूर्तियाँ, भोजन ग्रहण नहीं कर सकतीं, अपना मुँह तक नहीं खोल सकतीं, बोल तक नहीं सकतीं. तुमने कहा कि भगवान हमारी प्रार्थनाओं को सुनते हैं. यानी तुम्हारे अनुसार हमें सिर्फ भगवान की पूजा-प्रार्थना करना चाहिए. भगवान हमसे कुछ नहीं चाहते. वे सर्वव्यापी और परिपूर्ण हैं... इसी को तुम आधुनिक और वैज्ञानिक विचार कहते हो... ठीक??  

सलीम : हाँ बिलकुल, मैं यही आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि ये भगवान की मूर्तियों के सामने नैवेद्य लगाने की ये प्राचीन परंपरा बकवास है और ये बन्द होनी चाहिए.  

मित्र : नहीं, सलीम... 

सलीम : क्यों?? वह आश्चर्य में पड़ गया... 

मित्र : मैं तुम्हारे तर्क से सहमत नहीं हूँ. तुमने कहा कि भगवान ना तो खा सकता है, ना बोल सकता है और ना ही मनुष्यों की तरह व्यवहार कर सकता है...

सलीम : हाँ हाँ वही... 

मित्र : तो फिर भगवान मनुष्यों द्वारा की गई प्रार्थनाओं को सुन कैसे सकता है? भगवान या अल्लाह से प्रार्थना करने के लिए किसी न किसी भाषा में कुछ ना कुछ उच्चारण तो करना पड़ेगा ना? तो क्या भगवान के मुँह या नाक नहीं हैं, लेकिन कान हैं?? जब वे मनुष्यों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते, तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि प्रार्थना किस भाषा में की जा रही है? यानी तुम्हारे हिसाब से भगवान खा नहीं सकते, बोल नहीं सकते... लेकिन सुन सकते हैं?? ये कैसा तर्क हुआ?  

सलीम : नहीं ऐसा नहीं है, भगवान अपने दूतों के माध्यम से बात करते हैं. सभी धर्मों में देवदूतों की परंपरा है. 

मित्र : अच्छा!!! तो फिर भगवान अपने इन दूतों के माध्यम से नैवेद्य क्यों नहीं खाते? 

सलीम : सब कुछ भगवान की इच्छा और सोच पर निर्भर है, इसलिए.  

मित्र : लेकिन तुमने तो कहा था कि “इच्छा” और “सोच” तो मानवों का गुण है, भगवान यह नहीं करते. यदि भगवान की सोच है और वे मनुष्य की इच्छा को समझ सकते हैं, इसका मतलब है कि हमारा भगवान के साथ भौतिक सम्बन्ध है. तो फिर सैद्धान्तिक रूप से नैवेद्य अर्पण करने में क्या गलत है?  

सलीम : नहीं, ऐसा नहीं है... हम सिर्फ प्रार्थना कर सकते हैं... भगवान हमारी सुनेंगे... सभी पवित्र धार्मिक पुस्तकों में ऐसा ही लिखा है. 

मित्र : लेकिन तुमने तो अभी कहा था कि भगवान को मनुष्य से कुछ नहीं चाहिए, वह परिपूर्ण है. तो फिर तुम्हारे भगवान ने पवित्र पुस्तकों में उसकी पूजा करने और प्रार्थना करने को क्यों कहा है? 

सलीम : प्रार्थना तो हमारे करने का कार्य है, ईश्वर तो सब जानते हैं. 

मित्र : सलीम, तुम फिर से भ्रमित हो रहे हो, और परस्पर विरोधी बात कर रहे हो. यदि तुम्हारे ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, जो सभी कुछ जानते हैं, तो हमें भगवान को कुछ बताने की जरूरत क्या है? वे सब जानते हैं कि क्या होने वाला है, वैसा ही होगा, प्रार्थना करने से कुछ बदलने वाला तो नहीं है. या फिर यह हो सकता है कि तुम्हारे भगवान इतने दम्भी और घमंडी हों कि जब तक तुम प्रार्थना नहीं करो, तब तक वे तुम्हारी नहीं सुनेंगे. यदि भगवान परिपूर्ण और सर्वज्ञाता हैं तो नमाज पढ़ने अथवा अज़ान की क्या जरूरत है?  

सलीम कुछ क्षण चुप रहा... बोला एक मिनट रुको, मैं इसका उत्तर सोच रहा हूँ... 

मित्र : तुम्हें इसका उत्तर नहीं मिलेगा, क्योंकि जब आप दूसरे की आस्थाओं की खिल्ली उड़ाते हो, तब स्वयं भी यह सोचना चाहिए कि तुम्हारी आस्थाएँ सही हैं या नहीं?जब अतार्किक आस्थाओं का प्रश्न आता है तब सभी धर्म अनावश्यक हैं, परन्तु जब किसी आस्था का आधार वैज्ञानिक हो तब ऐसा नहीं होता. 

सलीम : चलो कोई बात नहीं, तो फिर तुम ही बताओ कि भगवान को नैवेद्य समर्पित करने के पीछे का तर्क क्या है? 


मित्र : तुम अपनी गर्लफ्रेंड को गुलाब का फूल क्यों भेंट करते हो? प्रेम और समर्पण व्यक्त करने के लिए... इसी तरह भगवान के समक्ष अन्न अथवा मिठाई का नैवेद्य समर्पित करना उनके प्रति प्रेम और समर्पण का सांकेतिक तरीका है. यह उनके प्रति आभार प्रदर्शन का भी तरीका है, क्योंकि उन्हीं के कारण यह अन्न हमें मिला. हिन्दू परिवारों में नैवेद्य का निर्माण पूरे भक्तिभाव, समर्पण एवं शरीर तथा दिमाग की शुद्धता के साथ किया जाता है. उसके बाद यह नैवेद्य भगवान को भेंट किया जाता है.हम जानते हैं कि भगवान खुद तो सीधे यह नैवेद्य खाने वाले नहीं हैं, यह सिर्फ सांकेतिक है. परन्तु धार्मिक क्रियाओं, भजन-आरती के पश्चात इस अन्न-मिठाई को “प्रसाद” के रूप में भक्तों में वितरित कर दिया जाता है. मूर्ति तो नैवेद्य नहीं खा सकती, परन्तु भगवान हमारे माध्यम से उसे ग्रहण करते हैं... क्योंकि हम भी उसी भगवान का अंश हैं. 

मित्र ने आगे कहा : जब हम भगवान को अन्न, नैवेद्य अथवा पुष्प अर्पित करते हैं तो कहते हैं, “समर्पयामि”, अर्थात यह आपका ही है, एवं सर्वप्रथम आपको ही दिया जा रहा है. फिर यही नैवेद्य, प्रसाद के रूप में वापस हमें मिल जाता है. जिस भक्तिभाव से हमने नैवेद्य समर्पित किया था, उसी भक्तिभाव से हम पुनर्वापसी के रूप में प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं.ऐसा भी माना जाता है कि प्रतिदिन भगवान का प्रसाद ग्रहण करने से भगवान हमें सदैव अन्न देते रहेंगे तथा घर में खुशहाली होगी. नैवेद्यं की परंपरा सिर्फ घरों में नहीं, बल्कि मंदिरों में भी है. मकर संक्रांति, पोंगल, होली, दीपावली सभी त्यौहारों पर मंदिरों में नैवेद्य अर्पित किया जाता है. भगवान के प्रति समर्पण एवं श्रद्धा दर्शाने की यह एक पद्धति है. 

सलीम : क्या आपके धर्मग्रंथों में भी नैवेद्य के बारे में लिखा है? 

मित्र : सभी ग्रंथों में कहा गया है कि तुम्हें अपने ईश्वर को वस्तुएँ, अन्न आदि समर्पित करना चाहिए. गीता में भी कहा गया है कि, “जो भी तुम खाते हो, जो भी तुम पहनते हो, जो भी तुम करते हो, वह ईश्वर को समर्पित करो.. यहाँ तक कि तुम जो भी तपस्या करते हो, वह भी ईश्वर को भेंट कर दो क्योंकि तुम जो भी करते हो, वास्तव में वह “मैं” (अर्थात ब्रह्म या ईश्वर) ही करता हूँ. इसलिए कुछ भी खाने से पहले उसे ईश्वर को समर्पित करना हमारी संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग है. 

हमारे पुरखों एवं ऋषि-मुनियों ने अपने ज्ञान एवं शोध से पाया कि भोजन मनुष्य के शरीर एवं मस्तिष्क की ऊर्जा का स्रोत है. मनुष्य को अपने जीवन एवं शक्ति के लिए भोजन करना जरूरी है, लेकिन यह भोजन सिर्फ उसकी व्यक्तिगत खुशी अथवा आनंद के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति विनम्रता एवं प्रकृति के प्रति जागरूकता के साथ होना चाहिए. मनुष्य के शरीर एवं मस्तिष्क से सम्बन्धित प्रत्येक बीमारी अथवा विकृति “भोजन” के माध्यम से आती है. जैसा कि तुम जानते हो, बाद में इलाज की अपेक्षा पहले परहेज करना उत्तम होता है. इसलिए ऋषियों ने बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से पारंपरिक औषधीय व्यवस्था का निर्माण किया, जिसे हम और आप “आयुर्वेद” के नाम से जानते हैं. सलीम, तुम्हें शायद पता नहीं होगा कि आयुर्वेद में “विरुद्ध आहार” एवं “पथ्य-कुपथ्य” (परहेज) पर काफी ध्यान दिया गया है.यदि मनुष्य आयुर्वेद के निर्देशों का पालन करें तो वह बिना किसी बड़ी बीमारी के 120 वर्ष तक जीवित रह सकता है. इसलिए “भोजन” को पवित्र माना गया है. 

प्राचीनकाल में ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था मंदिरों पर आधारित थी, इसलिए ऋषियों ने प्रत्येक मास, ऋतु एवं कालचक्र के अनुसार मनुष्य के शरीर एवं पर्यावरण तथा प्रकृति को ध्यान में रखकर मंदिरों में नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा आरम्भ की. यदि व्यक्ति भोजन के इस “पथ्य-कुपथ्य” का पूर्ण पालन करे, तो वह सदैव स्वस्थ रहेगा. ऋषियों ने हमें “सात्त्विक” भोजन की सलाह दी है, ऐसा सात्त्विक भोजन जो पवित्रता एवं समर्पण के साथ पकाया गया हो तथा ईश्वर को अर्पित किया गया हो. वे चाहते थे कि उनके अनुयायी इस वैज्ञानिक सिस्टम का पालन करते रहें, इसलिए उन्होंने इसे भगवान और विश्वास के साथ जोड़ दिया ताकि जो अज्ञानी हों, वे भी भय के कारण ही सही इस “पथ्य” और “विरुद्ध आहार” नियम का पालन करें.आधुनिक लोग तो इन नियमों के बारे में जानते ही नहीं हैं. यहाँ तक कि आजकल के अल्पज्ञानी पुजारी भी इन परम्पराओं के पूरी तरह जानकार नहीं रहे. इसलिए कहीं-कहीं दिखावा अधिक हो जाता है.  

सलीम : मुझे क्षमा करना मित्र, मैंने इस दृष्टि से कभी विचार ही नहीं किया. इसीलिए मुझे नैवेद्यं तथा प्रसाद के बारे में कभी जानकारी मिली नहीं. 

मित्र : कोई बात नहीं सलीम, वैसे भी आजकल यह ज्ञान धीरे-धीरे भारत से वैसे ही विलुप्त होता जा रहा है. मनुष्य के अप्राकृतिक भोजन एवं उसके कारण मानव व्यवहार में विकृति बढ़ती ही जा रही है. क्योंकि हिन्दू धर्म में कहावत है, “जैसा खाओगे अन्न, वैसा ही रहेगा मन”. आधुनिकता एवं प्रगतिशीलता के नाम पर जिस तरह लगातार हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं पर हमला जारी है, ऐसे में मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि किसी दिन मंदिरों में “सात्त्विक भोजन” के स्थान पर पिज्जा अथवा चिकन बिरयानी का “प्रसाद”(??) भी दिखाई दे जाए. जिस तरह अज्ञानी पुजारी-पण्डे तथा ब्रेनवॉश किए जा चुके कथित बुद्धिजीवीचारों तरफ बढ़ रहे हैं, ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि कुछ वर्षों पश्चात दुग्धाभिषेक की बजाय मदिराभिषेक ही आरम्भ हो जाए... जब अज्ञान का अँधेरा पसरता है, मानसिक विकृति चरम पर होती है, और बिना सोचे-समझे-जाने-पढ़े हिन्दू धर्म की की आस्थाओं की खिल्ली उड़ाना ही परम ध्येय बन चुका हो... तब कुछ भी हो सकता है. 

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साभार : संस्कृति मैग्जीन

Brihadishwara Temple - Classic Indian Architechture

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बृहदीश्वर मंदिर : अदभुत वास्तुकला का उदाहरण 


क्या आप पीसा की झुकी हुई मीनार के बारे में जानते हैं?? जरूर जानते होंगे. बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों से लेकर जवानी तक आप सभी ने पीसा की इस मीनार के बारे में काफी कुछ पढ़ा-लिखा होगा. कई पैसे वाले भारतीय सैलानी तो वहाँ होकर भी आए होंगे. पीसा की मीनार के बारे में, वहाँ हमें बताया जाता है कि उस मीनार की ऊँचाई 180 फुट है और इसके निर्माण में 200 वर्ष लगे थे तथा सन 2010 में इस मीनार ने अपनी आयु के 630 वर्ष पूर्ण कर लिए. हमें और आपको बताया गया है कि यह बड़ी ही शानदार और अदभुत किस्म की वास्तुकला का नमूना है. यही हाल मिस्त्र के पिरामिडों के बारे में भी है. आज की पीढ़ी को यह जरूर पता होगा कि मिस्त्र के पिरामिड क्या हैं, कैसे बने, उसके अंदर क्या है आदि-आदि. 

लेकिन क्या आपको तंजावूर स्थित “बृहदीश्वर मंदिर” (Brihadishwara Temple) के बारे में जानकारी है? ये नाम सुनकर चौंक गए ना?? मुझे विश्वास है कि पाठकों में से अधिकाँश ने इस मंदिर के बारे में कभी पढ़ना तो दूर, सुना भी नहीं होगा. क्योंकि यह मंदिर हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है. ना तो भारतवासियों ने कभी अपनी समृद्ध परंपरा, विराट सांस्कृतिक विरासत एवं प्राचीन वास्तुकला के बारे में गंभीरता से जानने की कोशिश की और ना ही पिछले साठ वर्ष से लगभग सभी पाठ्यक्रमों पर कब्जा किए हुए विधर्मी वामपंथियों एवं सेकुलरिज़्म की “भूतबाधा” से ग्रस्त बुद्धिजीवियों ने इसका गौरव पुनर्भाषित एवं पुनर्स्थापित करने की कोई कोशिश की. भला वे ऐसा क्योंकर करने लगे?? उनके अनुसार तो भारत में जो कुछ भी है, वह सिर्फ पिछले 400 वर्ष (250 वर्ष मुगलों के और 150 वर्ष अंग्रेजों के) की ही देन है.उससे पहले ना तो कभी भारत मौजूद था, और ना ही इस धरती पर कुछ बनाया जाता था. “बौद्धिक फूहड़ता”की हद तो यह है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा द्वारा बताई जाती है, तो फिर वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हम क्या थे?? बन्दर?? या भारत में कश्मीर से केरल तक की धरती पर सिर्फ जंगल ही हुआ करते थे?? स्पष्ट है कि इसका जवाब सिर्फ “नहीं” है. क्योंकि वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हजारों वर्षों पुरानी हमारी पूर्ण विकसित सभ्यता थी, संस्कृति थी, मंदिर थे, बाज़ार थे, शासन थे, नगर थे, व्यवस्थाएँ थीं... और यह सब जानबूझकर बड़े ही षडयंत्रपूर्वक पिछली तीन पीढ़ियों से छिपाया गया. उन्हें सिर्फ उतना ही पढ़ाया गया अथवा बताया गया जिससे उनके मन में भारत के प्रति “हीन-भावना” जागृत हो. पाठ्यक्रम कुछ इस तरह रचाए गए कि हमें यह महसूस हो कि हम गुलामी के दिनों में ही सुखी थे, उससे पहले तो सभी भारतवासी जंगली और अनपढ़ थे... 


बहरहाल... बात हो रही थी बृहदीश्वर मंदिर की. दक्षिण भारत के तंजावूर शहर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर भारत का सबसे बड़ा मंदिर कहा जा सकता है. यह मंदिर “तंजावूर प्रिय कोविल” के नाम से भी प्रसिद्ध है. सन 1010 में अर्थात आज से एक हजार वर्ष पूर्व राजराजा चोल ने इस विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था. इस मंदिर की प्रमुख वास्तु (अर्थात गर्भगृह के ऊपर) की ऊँचाई 216 फुट है (यानी पीसा की मीनार से कई फुट ऊँचा).यह मंदिर न सिर्फ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि तत्कालीन तमिल संस्कृति की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करता है. कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाईट की बड़ी-बड़ी चट्टानों से निर्मित है. ये चट्टानें और भारी पत्थर पचास किमी दूर पहाड़ी से लाए गए थे. इसकी अदभुत वास्तुकला एवं मूर्तिकला को देखते हुए UNESCO ने इसे “विश्व धरोहर” के रूप में चिन्हित किया हुआ है. 


दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश के अरुलमोझिवर्मन नाम से एक लोकप्रिय राजा थे जिन्हें राजराजा चोल भी कहा जाता था. पूरे दक्षिण भारत पर उनका साम्राज्य था. राजराजा चोल का शासन श्रीलंका, मलय, मालदीव द्वीपों तक भी फैला हुआ था. जब वे श्रीलंका के नरेश बने तब भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस आधार पर उन्होंने इस विराट मंदिर की आधारशिला रखी.चोल नरेश ने सबसे पहले इस मंदिर का नाम “राजराजेश्वर” रखा था और तत्कालीन शासन के सभी प्रमुख उत्सव इसी मंदिर में संचालित होते थे. उन दिनों तंजावूर चोलवंश की राजधानी था तथा समूचे दक्षिण भारत की व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी. इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक वास्तुज्ञान पर आधारित था, जिसे चोलवंश के नरेशों की तीन-चार्फ़ पीढ़ियों ने रहस्य ही रखा. बाद में जब पश्चिम से मराठाओं और नायकरों ने इस क्षेत्र को जीता तब इसे “बृहदीश्वर मंदिर” नाम दिया. 


तंजावुर प्रिय कोविल अपने समय के तत्कालीन सभी मंदिरों के मुकाबले चालीस गुना विशाल था. इसके 216 फुट ऊँचे विराट और भव्य मुख्य इमारत को इसके आकार के कारण “दक्षिण मेरु” भी कहा जाता है. 216 फुट ऊँचे इस शिखर के निर्माण में किसी भी जुड़ाई मटेरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इतना ऊँचा मंदिर सिर्फ पत्थरों को आपस में “इंटर-लॉकिंग” पद्धति से जोड़कर किया गया है. इसे सहारा देने के लिए इसमें बीच में कोई भी स्तंभ नहीं है,अर्थात यह पूरा शिखर अंदर से खोखला है. भगवान शिव के समक्ष सदैव स्थापित होने वाली “नंदी” की मूर्ति 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊँची है तथा एक ही विशाल पत्थर से निर्मित है. अष्टकोण आकार का मुख्य शिखर एक ही विशाल ग्रेनाईट पत्थर से बनाया गया है.इस शिखर और मंदिर की दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न नक्काशी और कलाकृतियां उकेरी गई हैं. गर्भगृह दो मंजिला है तथा शिवलिंग की ऊँचाई तीन मीटर है. आगे आने वाले चोल राजाओं ने सुरक्षा की दृष्टि से 270 मीटर लंबी 130 चौड़ी बाहरी दीवार का भी निर्माण करवाया. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक यह मंदिर कपड़ा, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्यों आदि के क्रय-विक्रय का प्रमुख केन्द्र था. आसपास के गाँवों से लोग सामान लेकर आते, मंदिर में श्रद्धा से अर्पण करते तथा बचा हुआ सामान बेचकर घर जाते. सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यह मंदिर अभी तक छः भूकंप झेल चुका है, परन्तु अभी तक इसके शिखर अथवा मंडपम को कुछ भी नहीं हुआ.दुर्भाग्य की बात यह है कि शिरडी में सांई की “मजार” की मार्केटिंगइतनी जबरदस्त है, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसे अदभुत मंदिर की जानकारी भारत में कम ही लोगों को है. इस मंदिर के वास्तुशिल्पी कुंजारा मल्लन माने जाते हैं. इन्होंने प्राचीन वास्तुशास्त्र एवं आगमशास्त्र का उपयोग करते हुए इस मंदिर की रचना में (एक सही तीन बटे आठ या 1-3/8 अर्थात, एक अंगुल) फार्मूले का उपयोग किया. इसके अनुसार इस मात्रा के चौबीस यूनिट का माप 33 इंच होता है, जिसे उस समय "हस्त", "मुज़म"अथवा "किश्कु"कहा जाता था. वास्तुकला की इसी माप यूनिट का उल्लेख चार से छह हजार वर्ष पहले के मंदिरों एवं सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माण कार्यों में भी पाया गया है.कितने इंजीनियरों को आज इसके बारे में जानकारी है??

सितम्बर 2010 में इस मंदिर की सहस्त्राब्दि अर्थात एक हजारवाँ स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया. UNESCO ने इसे “द ग्रेट चोला टेम्पल” के नाम से संरक्षित स्मारकों में स्थान दिया.इसके अलावा केन्द्र सरकार ने इस अवसर को यादगार बनाने के लिए एक डाक टिकट एवं पाँच रूपए का सिक्का जारी किया. परन्तु इसे लोक-प्रसिद्ध बनाने के कोई प्रयास नहीं हुए. 


अक्सर हमारी पाठ्यपुस्तकों में पश्चिम की वास्तुकला के कसीदे काढ़े जाते हैं और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को कमतर करके आँका जाता है अथवा विकृत करके दिखाया जाता है. इस विराट मंदिर को देखकर सहज ही कुछ सवाल भी खड़े होते हैं कि स्वाभाविक है इस मंदिर के निर्माण के समय विभिन्न प्रकार की गणितीय एवं वैज्ञानिक गणनाएँ की गई होंगी. खगोलशास्त्र तथा भूगर्भशास्त्र को भी ध्यान में रखा गया होगा. ऐसा तो हो नहीं सकता कि पत्थर लाए, फिर एक के ऊपर एक रखते चले गए और मंदिर बन गया... जरूर कोई न कोई विशाल नक्शा अथवा आर्किटेक्चर का पैमाना निश्चित हुआ होगा. तो फिर यह ज्ञान आज से एक हजार साल पहले कहाँ से आया?इस मंदिर का नक्शा क्या सिर्फ किसी एक व्यक्ति के दिमाग में ही था और क्या वही व्यक्ति सभी मजदूरों, कलाकारों, कारीगरों, वास्तुविदों को निर्देशित करता था? इतने बड़े-बड़े पत्थर पचास किमी दूर से मंदिर तक कैसे लाए गए?? 80 टन वजनी आधार पर दूसरे बड़े-बड़े पत्थर इतनी ऊपर तक कैसे पहुँचाया गया होगा?? या कोई स्थान ऐसा था, जहाँ इस मंदिर के बड़े-बड़े नक़्शे और इंजीनियरिंग के फार्मूले रखे जाते थे?? फिर हमारा इतना समृद्ध ज्ञान कहाँ खो गया और कैसे खो गया?? क्या कभी इतिहासकारों ने इस पर विचार किया है??यदि हाँ, तो इसे संरक्षित करने अथवा खोजबीन करने का कोई प्रयास हुआ?? सभी प्रश्नों के उत्तर अँधेरे में हैं. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि भारतीय कला, वास्तुकला, मूर्तिकला, खगोलशास्त्र आदि विषयों पर ज्ञान के अथाह भण्डार मौजूद थे (बल्कि हैं) सिर्फ उन्हें पुनर्जीवित करना जरूरी है. बच्चों को पीसा की मीनार अथवा ताजमहल (या तेजोमहालय??) के बारे में पढ़ाने के साथ-साथ शिवाजी द्वारा निर्मित विस्मयकारी और अभेद्य किलों, बृहदीश्वर जैसे विराट मंदिरों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए. इन ऐतिहासिक, पौराणिक स्थलों की “ब्राण्डिंग-मार्केटिंग” समुचित तरीके से की जानी चाहिए,वर्ना हमारी पीढियाँ तो यही समझती रहेंगी कि मिस्त्र के पिरामिडों में ही विशाल पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है, जबकि तंजावूर के इस मंदिर में मिस्त्र के पिरामिडों के मुकाबले चार गुना वजनी पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है.

ICHR and Intellectual Thugs

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ICHR में बौद्धिक लुटेरे


क्या आपने कभी सुना है कि सरकार ने एक पुस्तक लिखवाने के लिए चालीस लाख रूपए खर्च कर दिए हों? या फिर कभी किसी ऐसे बौद्धिक प्रोजेक्ट(?) के बारे में सुना है जो पिछले 43 वर्ष से चल रहा हो, जिस पर करोड़ों रूपए खर्च हो चुके हों और अभी भी पूरा नहीं हुआ हो? 

यदि नहीं सुना हो, तो दिल थामकर बैठिये... ICHR जिसे हम “भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्” के नाम से जानते हैं, वहाँ पर ऐसी कई बौद्धिक लूट हुई हैं. जैसा कि शायद आप जानते ही होंगे, पिछले साठ वर्षों से इतिहास शोध, संगोष्ठियों, सेमिनारों, फेलोशिप्स, स्कॉलरशिप से लेकर पाठ्यक्रमों में हिन्दू विरोधी तथा भारत विरोधी ज़हर भरने का ठेका वामपंथ के पास था. केन्द्र में जो भी काँग्रेस सरकार आई, उसने कभी इन अजगरों की आरामतलबी में कोई खलल उत्पन्न नहीं किया, बल्कि इन्हें समुचित हड्डियाँ देकर पाला-पोसा. पिछले कई वर्षों से “स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स” के नाम पर यह बौद्धिक डाकाजनी चल रही थी. 


उपरोक्त स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स, जिन्हें मात्र कुछ वर्षों एवं दो-चार लाख रुपयों में खत्म हो जाना चाहिए था, करदाताओं की गाढ़ी कमाई के बल पर इन्हें लगातार कई वर्षों तक घसीटा गया. ना तो कोई हिसाब दिया गया और ना ही देरी की वजह बताई गई. कई तथाकथित सम्माननीय इतिहासकार और विद्वान इस खुली लूट में शामिल रहे, जिनमें प्रमुख हैं बिपन चंद्रा, इरफ़ान हबीब और के एम श्रीमाली. आधुनिक भारतीय इतिहास के “विद्वान”(??) माने जाने वाले स्वर्गीय बिपन चंद्रा साहब का एक प्रोजेक्ट “Towards Freedom” तो 1972 में शुरू हुआ था, लेकिन आज तक खत्म नहीं हुआ. लाखों रूपए खर्च हो गए, बिपन चंद्रा साहब बिना हिसाब दिए स्वर्गवासी भी हो गए, लेकिन यह प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है. ऐसे होते हैं महान बुद्धिजीवी...इसी महालूट से व्यथित होकर ही श्री अरुण शौरी ने 1998 में रोमिला थापर समेतऐसे ढेरों फर्जी बुद्धिजीवियों की सरेआम पोल खोलते हुए एक पुस्तक लिखी थी “Eminent Historians”जिसमें तथ्य-दर-तथ्य इस गिरोह के बखिए उधेड़े गए हैं. अरुण शौरी के अनुसार बिपन चंद्रा साहब के इस कथित प्रोजेक्ट पर कम से कम तीन करोड़ रूपए खर्च हो चुके थे. पहले बिपन चंद्रा के बचाव में उतरे कुछ बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि इस प्रोजेक्ट में सहायकों आदि के वेतन भत्ते को भी इस राशि में जोड़ा गया और छवि खराब करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया. लेकिन जैसे ही पिछली ऑडिट रिपोर्ट सामने आना शुरू हुईं इनके नकली तर्कों और कथित बौद्धिकता की पोल खुल गई. 

ICHR की 2006-07 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार प्रोफ़ेसर बिपन चंद्रा को दो सहायक “विशेष बजट मद” के तहत दिए गए थे. प्रोफ़ेसर विशालाक्षी मेनन और IGNOU के प्रोफ़ेसर सलिल मिश्र को बिपन चंद्रा के मदद हेतु नियुक्त किया गया जिसका पूरा खर्च ICHR ने दिया, इस शर्त पर कि पहले ही प्रोजेक्ट देरी से चल रहा है, अतः अब इस प्रोजेक्ट को किसी भी हालत में 2008 तक पूरा किया जाना है. तो अब सवाल उठता है कि 2008 से लेकर बिपन चंद्रा की मौत तक (अर्थात 30 अगस्त 2014 तक) यह प्रोजेक्ट कहाँ अटका पड़ा था?? और इस पर जो खर्च जारी रहा, उसका हिसाब कौन देगा?करदाताओं के धन का ऐसा अनुपम अपव्यय करने वाले ये कथित बुद्धिजीवी इसके लिए जिम्मेदार क्यों नहीं माने जाने चाहिए? 

जब वाजपेयी सरकार ने ऐसे तमाम प्रोजेक्ट्स पर लगाम कसने की कोशिश की थी, उस समय भी पेट पर लात पड़ने के कारण यह गिरोह बुरी तरह बौखला गया था, परन्तु वाजपेयी सरकार को ना तो बहुमत हासिल था और ना उस सरकार में इस गिरोह से निपटने की इच्छाशक्ति थी. इसलिए जब कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों से ऐसे बाँटे गए लाखों रुपयों का हिसाब-किताब और प्रोजेक्ट्स में देरी की वजह पूछी गई तो जवाब देने में भारी टालमटोल की और बहाने बनाए. 

इरफ़ान हबीब और श्रीमाली का मामला भी इतना ही “रोचक”(??) है. इन्हें 1989 में एक प्रोजेक्ट सौंपा गया था, अगले पन्द्रह वर्ष में जिसके नौ खंड प्रकाशित होने चाहिए थे. प्रोजेक्ट का नाम था “Dictionary of Social, Economic and Administrative Terms in Indian/South Asian Inscriptions”, (अर्थात भारत एवं दक्षिण एशियाई देशों के शिलालेखों की सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक डिक्शनरी). आज तक इस प्रोजेक्ट पर 42 लाख रूपए खर्च हो चुके हैं और श्रीमाली साहब ने ICHR में अभी तक पन्द्रह में से एक भी पांडुलिपि जमा नहीं करवाई है.नवनियुक्त अध्यक्ष सुदर्शन राव के अनुसार उन्हें आज भी पता नहीं है कि वास्तव में इस डिक्शनरी प्रोजेक्ट की आज की स्थिति क्या है? रिकॉर्ड के अनुसार 1990 से लेकर अब तक श्रीमाली के पास सिर्फ कुछ हजार कंप्यूटराइज्ड कार्ड भर हैं, जो कि उनके शोध सहायकों ने तैयार किए हैं (जिनका वेतन भी ICHR ने दिया). फिर सवाल उठता है कि पिछले पच्चीस वर्ष में किस बात का शोध हुआ? जो शोध हुआ, उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं सौंपी गई? जो पैसा खर्च हुआ, उसका हिसाब कौन देगा? लेकिन यदि आप ऐसे सवाल पूछते हैं तो तत्काल “साम्प्रदायिक” और भाजपा के एजेंट” घोषित कर दिए जाते हैं. 

इरफ़ान हबीब नामक कथित महान इतिहासकार का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हें दिए गए प्रोजेक्ट की मियाद 2006-07 में ही खत्म हो चुकी है, लेकिन उन्होंने अभी तक अपनी पांडुलिपि ICHR में जमा ही नहीं की है. मजे की बात यह है कि 2011-12 और 2012-13 की वार्षिक रिपोर्ट में उनके शोध कार्य की फाईल पर “संतोषजनक प्रगति” लिखा गया है. जब कुछ पत्रकारों ने इस सम्बन्ध में पूछताछ की तो पता चला कि हबीब साहब ने खुद को उस प्रोजेक्ट से अलग कर लिया है और अब प्रोफ़ेसर शिरीन मूसावी उस पर काम कर रही हैं. फिर वही सवाल उठता है कि फिर तथाकथित इतिहास शोध के नाम पर जो लाखों रूपए खर्च हुए, उसकी उपयोगिता और हिसाब-किताब कौन देगा? क्या ये पैसा इरफ़ान हबीब से वसूला नहीं जाना चाहिए? 

यह तो मात्र तीन उदाहरण दिए हैं, जबकि वास्तव में यदि काँग्रेस-वामपंथ के तथाकथित बुद्धिजीवियों को मिले फंड्स, ग्रांट्स और फेलोशिप की सूक्ष्मता से जाँच की जाए तो एक विराट फर्जीवाड़ा सामने आ सकता है.इसके अलावा सेमीनार आयोजित करने, संगोष्ठियों और विभिन्न शोध यात्राओं के नाम पर हुए अनाप-शनाप खर्च का तो कोई हिसाब ही नहीं है. क्योंकि “जब सैंयाँ भए कोतवाल तो डर काहे का?”. इसीलिए जब मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ आई और स्मृति ईरानी, सुदर्शन राव आदि की नियुक्तियाँ हुईं तो इन कथित बुद्धिजीवियों और तथाकथित प्रोफेसरों/इतिहासकारों की तबियत यकायक गडबड होने लगी. अचानक इन्हें शिक्षा के स्तर की चिंता सताने लगी? इतिहास के विकृतिकरण (जो इन्होंने खुद किया) को लेकर बयान जारी होने लगे... क्योंकि इनकी असली बेचैनी यही है कि पिछले साठ साल की “पोलमपोल” खुलने वाली है. 


इसी ‘हिन्दू विरोधी मानसिकता’ से जुड़ा ताज़ा मामला FTII में गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर होने वाले विरोध का है. कथित बुद्धिजीवियों को गजेन्द्र चौहान अयोग्य मालूम पड़ते हैं, लेकिन इन वामपंथी बुद्धिजीवियों ने यूआर अनंतमूर्ति की योग्यता पर कभी सवाल नहीं उठाए, जबकि उनका फिल्मज्ञान शून्य था लेकिन उनकी एकमात्र योग्यता “वामपंथी” और “हिन्दू-विरोधी” होना थी.अब FTII में पिछले दो माह से जो हडताल और प्रदर्शनों की नौटंकी चल रही है, उसकी परतें खुलने लगी हैं और जानकारी मिली है कि लगभग 40 छात्र वहाँ ऐसे हैं जो “घुसपैठिये” हैं. अर्थात जिनका कोर्स और पढ़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन वे होस्टलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं और यही लोग गुण्डागर्दी करके बाकी छात्रों को भड़का रहे हैं कि वे गजेन्द्र चौहान का विरोध करें. सवाल उठता है कि पिछले पाँच वर्ष में इन गुर्गों को पाला-पोसा किसने? जवाब वही है... “कथित बौद्धिक गिरोह” ने. 

पिछले साठ वर्ष से “मिलीभगत द्वारा मुफ्त की मलाई” खाती हुई बिल्ली को, अचानक कोई डंडा मार दे, तो वह कैसे किकियाएगी??बिलकुल वही ICHR, FTII जैसी संस्थाओं में हो रहा है...

Missionaries, NGOs and Child Labour

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मिशनरी संस्थाएँ और एनजीओ :- बाल श्रमिक तथा यौन शोषण दुष्चक्र  


हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं. परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है. आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकरों-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन”, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं. ऐसा क्यों होता है? जब एक स्वयंसेवी संस्था ने ऐसे कुछ मामलों में अपने नाम-पते गुप्त रखकर तथा पहचान छिपाकर खोजबीन और जाँच की तब कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता-अहमदाबाद जैसे महानगरों में की गई इस जाँच से पता चला कि बड़े-बड़े शक्तिशाली NGOs तथा कई मिशनरी संस्थाएँ एक बड़े “रैकेट” के रूप में इस करोड़ों रूपए के “धंधे” को चला रही हैं

इस संस्था को जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार इन NGOs एवं मिशनरी संस्थाओं की कार्यशैली इस प्रकार है. सबसे पहले ईसाई मिशनरियाँ भारत के दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों को शहर में अच्छी नौकरी और परिवार को नियमित मासिक धन का ऐसा लालच देती हैं कि उसे नकार पाना मुश्किल ही होता है. उस गरीब परिवार की एक लड़की को वह संस्था पहले अपनी शरण में लेकर ईसाई बनाती है और उसे महानगर में उन्हीं की किसी कथित “प्लेसमेंट एजेंसी” के जरिये नौकरानी बनाकर भेज देती है. यह प्लेसमेंट एजेंसी उस धनाढ्य परिवार से पहले ही 30 से 50,000 रूपए “विश्वसनीय नौकरानी” की फीस के रूप में वसूल लेते हैं. 

गाँव में बैठी मिशनरी संस्था और महानगरों की एजेंसी के बीच में भी “दलालों” की एक कड़ी होती है, जो इन नौकरों-नौकरानियों को बेचने अथवा ट्रांसफर करने का काम करते हैं. यह एक तरह से “मार्केट सप्लाय चेन” के रूप में काम करता है और प्रत्येक स्तर पर धन का लेन-देन किया जाता है. महानगर में जो कथित प्लेसमेंट एजेंसी होती है, वह इन नौकरानियों को किसी भी घर में चार-छह माह से अधिक टिकने नहीं देती और लगातार अलग-अलग घरों में स्थानान्तरित किया जाता है. जो परिवार पूरी तरह सिर्फ नौकरों के भरोसे रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके यहाँ कौन काम कर रहा है, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ अपने काम पूर्ण होने से मतलब रहता है.चूँकि विश्वसनीयता (खासकर उस नौकर द्वारा चोरी करने वगैरह) की जिम्मेदारी उस एजेंसी की होती है, इसलिए मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौकरानी कौन है, कहाँ से आई है या चार महीने में ही क्यों बदल गई? इस प्रकार यह प्लेसमेंट एजेंसी एक ही नौकरानी को तीन-चार-छः घरों में स्थानांतरित करते हुए उन धनाढ्यों से धन वसूलती रहती है.  

सामान्यतः इन घरेलू नौकरानियों को ना तो अच्छी हिन्दी आती है और ना ही अंग्रेजी. चूँकि उधर सुदूर गाँव में मिशनरी ने मोर्चा संभाला हुआ होता है, इसलिए परिवार को भी कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि उस नौकरानी के वेतन में से अपना कमीशन काटकर वह NGO उस परिवार को प्रतिमाह एक राशि देता है,इसलिए वे कोई शिकायत नहीं करते. परन्तु इधर महानगर में वह नौकरानी सतत तनाव में रहती है और बार-बार घर बदलने तथा प्लेसमेंट एजेंसी अथवा NGO पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अवसादग्रस्त हो जाती है. इसी बीच इन तमाम कड़ियों में कुछ व्यक्ति ऐसे भी निकल आते हैं जो इनका यौन शोषण कर लेते हैं, परन्तु परिवार से कट चुकी इन लड़कियों के पास वहीं टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में लगभग 6000 ऐसी नौकरानियां काम कर रही हैं. जबकि उधर दूरस्थ आदिवासी इलाके में उसका परिवार चर्च से एकमुश्त मोटी रकम लेकर धर्मान्तरित ईसाई बन चुका होता है



अपने “शिकार” पर मजबूत पकड़ तथा इन संस्थाओं की गुण्डागर्दी की एक घटना हाल ही में दिल्ली में दिखाई दी थी, जब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में ऊँचे वेतन पर पदस्थ एक महिला को दिल्ली पुलिस ने अपनी “नौकरानी पर अत्याचार” के मामले में थाने पर बैठा लिया था. महिला पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मारपीट की है. पुलिस जाँच में पता चला कि वह लड़की झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आई है और उसका परिवार बेहद गरीब है. हमारी “सनसनी-प्रिय” मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपका और दिन भर “बालश्रम” विषय पर तमाम लेक्चर झाडे, खबरें बनाईं. जाँच में आगे पता चला कि उस लड़की को सिर्फ तीन माह पहले ही उस संभ्रांत महिला के यहाँ किसी एजेंसी द्वारा लाया गया था और इससे पहले कम से कम बीस घरों में वह इसी प्रकार काम कर चुकी थी. दिल्ली पुलिस ने जब झारखंड संपर्क किया तो पता चला कि लड़की 18 वर्ष पूर्ण कर चुकी है. यहाँ पर पेंच यह है कि जब उस महिला ने पुलिस को पैसा खिलाने से इनकार कर दिया तब पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, जबकि होना यह चाहिए था कि पुलिस उस नौकरानी द्वारा काम किए पिछले सभी घरों की जाँच करती (क्योंकि तब वह नाबालिग थी) और साथ ही उस कथित प्लेसमेंट एजेंसी के कर्ताधर्ताओं की भी जमकर खबर लेती, तो तुरंत ही यह “रैकेट” पकड़ में आ जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि जिस NGO और मिशनरी संस्था से उस एजेंसी की साँठगाँठ थी, उसने ऊपर से कोई राजनैतिक दवाब डलवा दिया और वह नौकरानी चुपचाप किसी और मालिक के यहाँ शिफ्ट कर दी गई. केस खत्म हो गया

दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी इस रैकेट के बारे में काफी कुछ जानते हैं, परन्तु कोई भी कार्रवाई करने से पहले उन्हें बहुत सोचना पड़ता है. क्योंकि अव्वल तो वह नौकरानी “ईसाई धर्मान्तरित” होती है, और उसके पीछे उसका बचाव करने वाली शक्तिशाली मिशनरी संस्थाएँ, NGOs होते हैं, जिनके तार बड़े राजनेताओं से लेकर झारखंड-उड़ीसा के दूरदराज स्थानीय संपर्कों तक जुड़े होते हैं. इन्हीं संगठनों द्वारा ऐसे ही कामों और ब्लैकमेलिंग के लिए महानगरों में कई मानवाधिकार संगठन भी खड़े किए होते हैं. इसलिए पुलिस इनसे बचकर दूर ही रहती है. दिल्ली की उस संभ्रांत महिला के मामले में भी यही हुआ कि वृंदा करात तत्काल मामले में कूद पड़ी और उस महिला पर दबाव बनाते हुए उसे शोषण, अत्याचार वगैरह का दोषी बता डाला, लेकिन इस बात की माँग नहीं की, कि उस एजेंसी तथा उस नौकरानी के पूर्व-मालिकों की भी जाँच हो. क्योंकि यदि ऐसा होता तो पूरी की पूरी “सप्लाय चेन” की पोल खुलने का खतरा था. यही रवैया दूसरे राजनैतिक दलों का भी रहता है. उन्हें भी अपने आदिवासी गरीब वोट बैंक, मिशनरी संस्थाओं से मिलने वाले चन्दे और दूरदराज में काम कर रहे NGOs से कार्यकर्ता आदि मिलते हैं. इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मामले में गंभीर नहीं है और यथास्थिति बनाए रखता है

बालश्रम, शोषण के ऐसे मामलों में कुछ शातिर NGOs इसमें भी ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोज लेते हैं. चूँकि उनके पास संसाधन हैं, अनुभव है, नेटवर्क है, तो वे धनाढ्य परिवार को धमकाते हैं कि यदि वे अपनी भलाई चाहते हों तथा पुलिस के चक्करों से बचना चाहते हों तो फलाँ राशि उन्हें दें अन्यथा नौकरानी कैमरे और पुलिस के सामने कह देगी कि उसके साथ यौन शोषण भी किया गया है. पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि जब उस एजेंसी (अथवा NGO) को यह लगने लगता है कि बात बिगड़ने वाली है या अब उस परिवार को नौकरानी की जरूरत नहीं रहेगी इसलिए भविष्य में उस परिवार से उनकी आमदनी का जरिया खत्म होने वाला है तो वे इन्हीं नौकरानियों को डरा-धमकाकर महँगे माल की चोरी करवाकर उन्हें रातोंरात वापस उनके गाँव भेज देती हैं. यदि कभी कोई लड़की गलती से तेजतर्रार निकली, बातचीत अच्छे से कर लेती हो, थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीख चुकी है तो उसे “गोद लेने” के नाम पर अपने किसी विदेशी नेटवर्क के जरिये यूरोप अथवा खाड़ी देशों में भेज दी जाती है. 

भारत के मीडिया के बारे में तो कहना ही क्या?? “खोजी पत्रकारिता” किस चिड़िया का नाम है, ये तो वे बरसों पहले भूल चुके हैं. इतने सारे संसाधन और रसूख होने के बावजूद उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं. किसी घरेलू नौकरानी के शोषण और अत्याचार का मामला उनके लिए TRP बढ़ाने और सनसनीखेज खबर बनाने का माध्यम भर होता है, उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि आखिर ये नौकरानियाँ कहाँ से आती हैं? क्यों आती हैं? कौन इन्हें लाता है? इनका पूरा वेतन क्या वास्तव में उनके ही पास अथवा परिवार के पास पहुँचता है या नहीं? “प्लेसमेंट एजेंसी” क्या काम कर रही है? उनकी फीस कितनी है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं परन्तु मीडिया, नेता, पुलिस, तंत्र सभी खामोश हैं और उधर खबर आती है कि 2014-15 में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक 11,000 लड़कियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं, जिनका कोई एक साल से कोई अतापता नहीं चला. 

यदि केन्द्र सरकार अपनी सक्षम एजेंसियों के मार्फ़त महानगरों में काम करने वाली नौकरानियों के बारे में एक विस्तृत जाँच करवाए तो कई जाने-माने मिशनरी संस्थाएँ एवं NGOs के चेहरे से नकाब उतारा जा सकता है, जो दिन में "Save the Girl Child", "Donate for a Girl Child"के नारे लगाते हैं, लेकिन रात में "मानव तस्कर"बन जाते हैं... 

Impose Ban on Dirty Websites in India

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भारत के लिए भस्मासुर हैं अश्लील वेबसाइटें


क्या कभी आपने सोचा है कि हमारी अपनी संस्कृति पर अधिकार जताने के लिए हम क्यों विवश हैं? क्यों ग्लोबलाइजेशन व उदारवादी विश्व अर्थव्यवस्था के नाम पर अनाचार, अश्लील, अनैतिक व अवैध कार्यों को वैध बनाने की कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की साजिश में हमें भागीदार बनाया जा रहा है?

जी हाँ भारत में इंटरनेट क्रांति आने के 10-12 सालों के बाद आखिरकार पोर्न साईटों और समाज व देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों पर एक खुली बहस छिड़ ही गई है। चुपके-चुपके एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत भारत के कानूनों के अनुसार अवैध इन बेवसाइटों को विदेशी सर्वरों के माध्यम से हर घर व आफिस में संवेदनहीन अन्र्तराष्ट्रीय बाजारू ताकतों व उनके भारतीय एजेंटों द्वारा घुसा दिया गया. बिना इस बात का अध्ययन, विश्लेषण, बहस व रक्षात्मक उपाय किये बगैर, कि इस वैचारिक अतिक्रमण व सांस्कृतिक प्रदुषण से आम भारतीय विशेषकर बच्चे, किशोर व औसत बुद्धि के व्यस्क पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेंगे? कैसे समाज का पारिवारिक ढांचा टुटने लगेगा और समाज यौन पिपासु हो आत्मघाती होता जायेगा? हमें इस षडयंत्र के भारतीय गुनहगारों को खोजकर सजा दिलानी होगी. 


किन्तु इसकी आवाज उठाने से पूर्व हम अपनी माँग कि अश्लील पोर्न साईटों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगना चाहिए के पक्ष में कुछ तर्क रखना चाहते हैं-

- उच्चतम न्यायालय ने पोर्न साईटों से संबंधित याचिका की सुनवाई के समय माना कि ‘चाइल्ड पोनोग्राफी’ गलत है और इससे संबंधित सामग्री को इंटरनेट पर प्रतिबंधित करने के सरकार को आदेश दिये। हमारा उच्चतम न्यायालय से आग्रह है कि जितने संवेदनशील आप उन विदेशी बच्चों के प्रति है जिनका शोषण कर ऐसी पोर्न फिल्मों का निर्माण किया जाता है उतना ही संवेदनशील अपने देश के के बच्चों, किशोरों व औसत बुद्धि के व्यस्कों के प्रति भी हो और उन पर इन साईटों के देखने से पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करा लेने के बाद ही कोई निर्णय लें। 

- कुछ लोग पोर्न को सही मानते हैं और इसे व्यक्ति की नैसर्गिक जरूरत तक के रूप में परिभाषित करते हैं। उनके अपने तर्क हो सकते हैं, किन्तु हमारे अनुसार किसी भी देश व समाज की अपनी-अपनी संस्कृति, सामाजिक सोच व बौद्धिक विकास की प्रक्रिया व दुनिया को देखने व जीने के तरीका होता है यह सबके लिये एक जैसा हो ही नहीं सकता। 

- मौलिक भारत नामक संस्था ने सैकड़ों सामाजिक व धार्मिक संगठनों के साथ मिलकर पिछले एक वर्ष से अश्लीलता, नशाखोरी व इनके कारण नारी पर हाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध एक अभियान चलाया हुआ है। हमें अभी तक 100 प्रतिशत लोगों ने समर्थन दिया है, हमारी खुली चुनौती है कि सरकार इस मुद्दे पर सभी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से जनता के सामने रखकर जनमत संग्रह करा लें। हमारा पूरा विश्वास है कि 99 प्रतिशत भारतीय इस प्रकार की अश्लील बेवसाईटों के विरोध में मत देंगे। जनता से प्राप्त सुझावों व उनपर चिंतन-मंथन, विश्लेषण और शोध के उपरान्त हमारे कुछ स्पष्ट मत व तर्क हैं। हमारा उच्चतम न्यायाल व भारत सरकार से अग्रह है कि वे अदालती सुनवाई के समय इन तर्को व प्रश्नों का सारगर्भित जवाब देश की जनता को दे अन्यथा तुरन्त प्रभाव से पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरु करें। 

- क्या पश्चिमी देशों में पोर्न साइटों व इनसे संबंधित व्यापारिक गतिविधियों को 5-7 वर्षों के अंदर समाज पर थोप दिया गया था? 
- क्या जिन देशों में पोर्न देखना वैध है उन्होंने पहले किसी अन्य देश की ऐसी फिल्में देखी और फिर अपने देश में ऐसे व्यापार को प्रारंम्भ किया जो हम पर विदेशी पोर्न साइटों को हमसे पूछे बिना व बिना बहस के ही थोप दिया गया। 
- क्या ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वेक्षण है जो यह बताता हो कि पोर्न के व्यापार में लगे लोग अपने कार्यों से खुश हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उनके कार्यों को सुरक्षित व्यापार की श्रेणी में मान्यता दी हो? 
- पोर्न साइटों की वकालत करने वाले मीडिया समूह इनका विरोध करने वालों को अपनी कवरेज में जगह क्यों नहीं देते? 
- ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान हमारे पास उपलब्ध हैं जो प्रमाणित करते हैं कि पोर्न-देखने के बाद मानव में पशुता का भाव आ जाता है और उसके मन में रिश्तों की दीवार समाप्त हो जाती है व वह सामने वाले पुरुष या स्त्री को वस्तु की तरह देखने लगता है। विशेषकर स्त्रियों के प्रति आपराधिक होता जाता है। 
- अगर पोर्न देखना, बनाना और दिखाना सही है तो इसे भारत में कानूनी मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है? 
- अगर पोर्न जो दिखा रही है वह सही हैं तो फिर विवाह, परिवार व समाज की अन्य संस्थाओं की मान्यता समाप्त की जानी चाहिए। सेंसर बोर्ड व अन्य सभी संबंधित कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 
- जो भारतीय पोर्न देखने के समर्थक हैं वे अपनी पोर्न बनाकर अश्लील साइटों पर क्यों नहीं क्यों नहीं डालते हैं? 
- पोर्न के व्यापार में लगी हुई साइटों से भारत सरकार टैक्स क्यों नहीं वसूलती? निश्चित रूप से इस कर चोरी की आड़ में अरबों रुपयों का अवैध लेन देने होता होगा। 
- क्यों सरकार ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को ऐसी अवैध साइटों को नहीं दिखाने की स्पष्ट कार्यनीति व जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं कराये? हमारे खाली पड़े लाखों आई टी इंजीनियर इस दिशा में मददगार सिद्ध होंगे। 
- इन बैवसाइटों पर जाने के लिए कोई पंजीकरण व शुल्क देकर ही प्रवेश करने की प्रक्रिया क्यों नहीं है? 
- भारत सरकार विदेशी सर्वरों पर ही क्यों निर्भर है वह चीन की तरह अपने सर्वर क्यों नहीं विकसित कर रही है? ऐसे में अवैध अश्लील सामाग्री स्वयं ही छंटती जायेगी। 
- क्या भारत जैसा एक विकासशील देश जिसका विश्व अर्थव्यवस्था में मात्रा 2 प्रतिशत व बौद्धिक संपदा में 0.01 प्रतिशत हिस्सा हो, वह अपनी नयी पीढ़ी को पोर्न, नशाखेरी, सट्टे व, उपभोक्तावाद व पश्चिमी अपसंस्कृति को शिकार बना तबाह करने की विदेशी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद फैलाने के षडयंत्र का मोहरा बनता जा रहा है? 90 करोड़ गरीबो के देश में पहले सबका विकास हमारी प्राथमिकता है या पोर्न उन्माद? 
- क्या कहीं ऐसा तो नहीं है कि चूंकि पश्चिमी देशों में भयंकर मंदी व बेरोजगारी है और बाजार अर्थव्यवस्था में नये रोजगार पैदा नहीं हो रहे ऐसे में वे अपनी ही आबादी की ऐसे अधकचरे रोजगारों में धकेल रहे हों और भारत जैसे देश को भी अपन बाजार बना रहे हैं? 
- देश में पोर्न समर्थक मीडिया व बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग कहीं इन बाजारु शक्तियों के ‘लाॅबिंग एजेन्ट तो नहीं हैं, जो भ्रम फैलकार अपनी फंडिंग एजेंसियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं? 
- क्यों पिछले 20-25 वर्षो में बाजारवाद व खुली अर्थव्यवस्था आने के बाद ही अश्लील बेवसाइटों, ड्रग्स व सट्टे का अवैध कारोबार से धन की निकासी भारत में बढ़कर 15 से 20 लाख करोड़ तक हो गयी और इनके नियमन के लिए कोई कानून नहीं बनाये गये। 
- क्या पोर्न समर्थकों ने इन फिल्मों में निर्माण में धकेले गये लोगों के उत्पीड़न व इन पोर्न को देखकर उत्पीड़न का शिकार हुए लोगों की स्थिति जानने की कोशिश की हैं? क्या इनमें मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई है?
देशवासियों, क्षणिक भावनाओं में आकर अगर आप अपनी नयी पीड़ी व देश के भविष्य को गर्त में ढकेलना चाहते हैं तो आपकी मर्जी मगर हम यह कानते हैं कि हर देश की अपनी संस्कृति व विकास चक्र होता है, ग्लोवलाइजेशन’ को अबाध रूप से थोप देने से जो संवेदनहीन व पशुवत समाज हम बनाते जा रहे हैं वह हमें भस्मासुर’ ही बना रहा है अर्थात हम स्वयं ही स्वयं का सर्वनाश करने का प्रबंध कर रहें हैं।
मौलिक भारत ट्रस्ट का आहवान है कि हम अपनी सोच, संस्कृति, मौलिकता, क्रमिक बौद्धिक विकास व चिंतन मंथन से निकली हुई जीवन शैली को ही स्वीकार करें, ग्लोवलाइजेशन के नाम पर हावी बाजारु ताकतों के जीवन दर्शन को कदापि नहीं। अगर सरकार व न्यायालय इस प्रकार के संविधन कानून मानवता, नैतिकता व जनविरोधी कार्यो को रोक पानें में असमर्थ हैं व इनके परिचालन पर नियंत्रण नहीं कर सकती तो उनका अस्तित्व ही निरर्थक है (चीन ने सफलतापूर्वक यह कर दिखाया है). नेताओं को इस लोकतांत्रिक देश की जनता ने अपने-अपने पदों पर इसीलिये बैठाया है, कि वे देश में यथासंभव कानून का राज्य स्थापित करें न कि अवैध व गैर कानूनी गतिविधियों को संरक्षण दें या उनके आगे आत्मसमर्पण कर दें।

Indian Muslims in Cognitive Dissonance

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Cognitive Dissonance का प्रैशर कुकर


(साभार :- Anand Raajadhyaksh जी) 

सबसे पहले Cognitive Dissonance का अर्थ समझ लें. अगर मनुष्य का किसी ऐसी जानकारी से सामना हो जाये या उसे कोई ऐसी जानकारी दी जाये, जो उसकी कोई दृढ़ मान्यता – विश्वास – श्रद्धा को ध्वस्त कर दें, तो जो मानसिक स्थिति पैदा होती है उसे Cognitive Dissonance कहते हैं ।अचानक वो मानसिक रूप से खुद को एक शून्य अवकाश में लटकता पाता है और आधार के लिए हाथ पैर मारता है । Dissonance याने विसंगति, या अगर संगीत के परिभाषा में देखें तो बेसुरापन. मानव का स्वाभाविक आकर्षण सुसंगति या सुर (harmony) में रहने के लिए होता है, और उसका मन वही प्रयास करता है कि Cognitive Harmony पुनर्स्थापित हों । अब इस हेतु वह कोई आधार खोजता है... कोई सबूत खोजता है जो उसे Harmony पुनर्स्थापित करने हेतु योग्य लगे.. लेकिन यहाँ एक खतरा है, जिसमें वह अक्सर फंस ही जाता है. क्या है वह खतरा? 


इस स्थिति में उसका तर्क कठोर नहीं रह जाता. वह निष्पक्ष नहीं रहता. वह यह भी नहीं देखता कि मिलनेवाला तर्क या सबूत सत्यता की कसौटी पर कितना खरा उतरता है. उसके लिए यह काफी है अगर वह उसकी स्थापित मान्यता को फिर से मजबूत कर सके. वह यह नहीं देखता कि जहां से ये आधार लिया जा रहा है वह कितना विश्वसनीय है. उस वक़्त तिनका भी जहाज हो जाता है उसके लिए. 

ऐसा क्यूँ होता है? - असल में सब से बड़ी बात है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ख नहीं दिखना चाहता. वह नहीं चाहता कि कोई उस पर हँसे या उसे मूर्ख कहे कि वह किसी झूठ पर कैसे विश्वास करता रहा.इसलिए वह अपने जैसों को खोजता है. कोई महंगी चीज खरीदता है, तो उसके दस और खरीदार ढूँढता है, ताकि कल वह वस्तु फेल हो जाये तो उन दस लोगों का हवाला अपनी पत्नी और बाकी परिवार को दे सके. वह खुद उस वस्तु का मुफ्त प्रचारक भी बन जाता है. अपने निर्णय के समर्थन में संख्या का उसे बड़ा आधार महसूस होता है. जितनी बड़ी संख्या, उतना बड़ा सत्य. 

धर्म के बारे में भी यही चीज होती है. अगर उसका मन उसे सवाल करता भी है, तो अपने मन को यही कहकर चुप कराता है – कि इतने सारे लोग मूर्ख हैं क्या? घर के बड़े, समाज के बड़े और देश और विश्व में इतने लोग अगर इसमें मानते हैं तो क्या वे मूर्ख हैं? मेरे से अधिक जानकार, अधिक विद्वान... और बड़े बड़े तीस्मारखां मानते हैं तो सत्य ही होगा. यहाँ पर एक बात और भी दिखती है. संख्या से जुड़कर न केवल खुद को आश्वस्त किया जाता है, बल्कि संख्या को अपने साथ जोड़कर विरोधी विचारकों को परास्त भी किया जाता है. जहां तक बात चर्चा, संवाद और विवाद तक सीमित है, ठीक है, लेकिन यह अक्सर हिंसा पर भी उतर आती है.

अगर फिर भी उसको कोई टोके या उसके प्रचार को ही नहीं बल्कि उसके विश्वास को ही बेबुनियाद साबित करें तो उसको बड़ा धक्का पहुंचता है. लेकिन इस वक़्त भी वो तिनके ही पहले ढूँढता है, और खोखले तिनकों के देनेवालों को अपना तारणहार मानता है. तर्क से नहीं लेकिन तर्क की परिणति से अधिक डरता है, क्योंकि अंत में जब सत्य का सामना होगा तो तेज:पुंज सामर्थ्यशाली कवचधारी योद्धा, केवल एक बिजूका – कागभगोड़ा दिखाई देगा. उसकी पूरी प्रतिमा ध्वस्त होगी, जिसके रक्षण के लिए वो जरूरत पड़ने पर हिंसक भी हो जाता है. 


वह प्रश्नकर्ता की विश्वसनीयता पर पहला वार करता है – तुम झूठ बोल रहे हो. 

दूसरा वार प्रश्नकर्ता की बनिस्बत अपनी योग्यता पर होता है, वह पूछता है – तुम्हारी औकात क्या है जो हमें सिखाने चले आए हो? 

तीसरा वार प्रश्नकर्ता की निजता पर होता है, जो यूं देखें तो उसको भगाने के लिए होता है – तुम अपनी गिरेबान में झाँको जरा. यहाँ कुछ आरोप लगाकर निकल लेने की कवायद होती है, कि सामनेवाला भी नंगा हो जाये तो चुप हो जाएगा. सत्य का सामना नहीं करना पड़ेगा. 

चौथा और सब से हिंसक वार यह होता है, कि तुम्हें हम से शत्रुता है, इसलिए ऐसे कह रहे हो, तुम्हारे साथ कठोर से कठोर व्यवहार होना चाहिए. अब यहाँ कुछ भी हो सकता है और अक्सर विश्व भर में होता आया है. 

इसी बात के तहत ये मजेदार कहानी भी फिट बैठती है कि :- एक मनुष्य की टांग टूटी तो उसे बैसाखी लेनी पड़ी. बाद में वह तो सामान्य लोगों से भी अधिक चपल हो गया, तो लोगों में जिज्ञासा जागी और उन्होने भी जरूरत न होते भी बैसाखी अपनाई. बाद में तो यह प्रथा ही हो गयी और बगैर बैसाखी चलने पर रोक लगा दी गयी. अगर किसी ने बगैर बैसाखी चलने की जुर्रत की, तो या तो उसकी टांग तोड़ी गयी या वो गाँव छोड़ गए – बेचारे और कर ही क्या सकते थे? 

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इंटरनेट के कारण हिंदुस्तान में Cognitive Dissonance का सब से बड़ा मारा कोई है तो युवा मुसलमान है. वह जानता है कि अब सब जानते हैं कि जब उसके पुरखों ने इस्लाम कुबूल किया होगा, वह कोई बहुत गौरवशाली घटना नहीं होगी.वह जिनसे अपना संबंध बता रहा है, उनकी नजर में तो उसकी औकात धूल बराबर भी नहीं है यह भी सब जानते हैं. समाज के तथाकथित रहनुमाओं ने समाज को मजहब के नाम पर पिछड़ा रखा है, यह भी उसे पता है. वह लगातार जिस मजहब की बड़ाई करता है, उसकी भी जानकारी सब को हासिल होने लगी है, यहाँ तक कि काफिर इस्लाम के बारे में उस से ज्यादा जानने लगे हैं और उनके सवाल, मन में सवाल पैदा कर रहे हैं कि क्या उसकी श्रद्धा सही है? उसकी हालत उस बाप की तरह है जो अपनी बेटी की मासूमियत को चिल्लाकर साबित करने की कोशिश कर रहा हो, और बेटी को उसी वक़्त आई मितली सब के सामने सच्चाई खोल दें.


अब सवाल यह है कि भारत का मुसलमान क्या करेगा? सोशल मीडिया में आजकल वो पहले जैसा आक्रामक नहीं दिखता – बुरी तरह एक्सपोज हो चुका है, और जानता है कि गंदी गालियां देना अपनी जीत नहीं है. वह कहाँ तक ये कह सकता है, कि आप लोग कुछ जानते नहीं तो कुछ बोलना मत, जबकि उसके सामने रखी आयत, खुद उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है? कहाँ तक जाति प्रथा को ले कर टोकेगा, जब पास्मांदा और अशरफ के बारे में सवाल पूछे जाएंगे? और कहाँ तक काफिर देवताओं के नाम से गालियां देगा, जब हजरत के चरित्र के प्रसंग सही सबूतों के साथ उजागर किए जाते हैं ? कहीं तो मन के आईने में वो सच्चाई की बदसूरत शक्ल देख ही रहा है. Cognitive Dissonance सिद्धांत अपना काम कर रहा है. उसे समझ आ रहा है कि आज तक उसे सिर्फ इस्तेमाल किया गया है और अभी भी किया जा रहा है. कहीं तो वह वैचारिक खालीपन में सहारा ढूंढ रहा है. 

और इसी स्तर पर उसे सहारा देने के लिए "तिनकों के दुकानदार"दौड़े आ रहे हैं. मेमन को शहीद कहनेवाली यही जमात है. गोद में उठाई जानेवाली छोटी बच्ची को भी हिजाब पहनाने वाले यही हैं. मदरसे में साईंस आवश्यक कर देने पर हल्ला मचानेवाले यही लोग हैं.अपनी दुकानों को ही उन्होने मजहब का नाम दे रखा है और दूकानदारी खतरे में दिखती है, तो मजहब खतरे में होने की आवाज उठाई जाती है.

हिंदुस्तान का युवा मुसलमान वाकई एक प्रैशर कुकर में है. Cognitive Dissonance का अभूतपूर्व प्रैशर हैइक्कीसवीं सदी में. देखना यह है कि इस प्रेशर का निपटारा कैसे होगा. दुकानदार तो उन्हें इस तरह आंच दे रहे हैं कि कुकर का विस्फोट ही हो. भाँप अंदर जम रही है, सीटी तो रह रह कर बज रही है. इस खदबदाहट को उचित मार्ग दिखाकर ठण्डा करने में ना तो मुस्लिम धार्मिक नेताओं की रूचि है और ना ही सेकुलर-वामपंथ के पैरोकार इस युवा मुस्लिम को समझाते हैं कि वह किस खोखली जमीन पर खड़ा है...

इस "प्रेशर कुकर"की सीटी किसे सुनाई दे रही है? 
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(फेसबुक के विद्वान श्री आनंद राजाध्यक्ष जीद्वारा लिखा गया अदभुत विश्लेषण) 

Indian Ancient Knowledge and Culture

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अभिमन्यु, वामकुक्षी और भारतीय शौच पद्धति...


सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है. जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा. 

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं.इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी. 




अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना?? 

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है.जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे... या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ?? 


तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है.परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है.जबकि जैसा कि चित्र में दिखाया है, कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता. 


अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है.शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है. 

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं.जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं... वे फिर कभी किसी अगले लेख में... 

तब तक के लिए नमस्कार...

How to Recognize Secular Vs Communal Rape

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सेक्युलर बलात्कार बनाम साम्प्रदायिक बलात्कार

मित्रों भारत में आजकल रेपका फैशन चल रहा है. अखबार-चैनल-सोशल मीडिया सभी पर रेप छाया हुआ है. जिस दिन रेप की खबर नहीं होती, लगता है कि दिन सूना हो गया. इसलिए जब प्रगतिशीलमहिलाएँ बोर होने लगती हैं तब सात-आठ साल से लिव-इन में रखैलकी तरह खुशी-खुशी रहने के बाद अचानक उन्हें याद आता है कि, अरे!! ये तो रेप हो गया. सो सेकुलर बौद्धिक तरक्की करते हुए आधुनिक भारत में ऐसी ख़बरें भी सुनाई दे जाती हैं. अब तो बुद्धिजीवियों के पसंदीदा चैनल BBCने भी दुनिया को समझा दिया है कि भारत के सारे मर्द रेपिस्ट होते हैं.तालियाँ बजाते हुए सभी प्रगतिशीलों ने BBCकी इस राय का समर्थन भी किया और मुकेश नामक हीरोकी फिल्म भारत में दिखाने की पुरज़ोर माँग रखी. बहरहाल, वह झमेला अलग है, मैं तो आपको इस लेख में रेप के एक बिलकुल नए दृष्टिकोण के बारे में बताने जा रहा हूँ. वह है सेकुलर रेपऔर साम्प्रदायिक रेप... हैरान हो गए ना!!! जी हाँ... भारत में अधिकाँश रेप इन्हीं दो प्रकारों का होता है...

आईये हम समझते हैं कि सेकुलर रेपऔर साम्प्रदायिक रेपमें क्या अंतर होता है... पहले इस ब्लॉक डायग्राम को ध्यान से देख लीजिए. यही सेकुलर रेप का पूरा सार है, जिसे मैं शुद्ध हिन्दी में आपको समझाने की कोशिश करूँगा.




चलिए शुरू करते हैं... - जब भी देश में कहीं बलात्कार होता है तो “आदर्श लिबरल” या कहें कि प्रगतिशील सेकुलर बुद्धिजीवी सबसे पहले यह देखता है कि बलात्कार भाजपा शासित राज्य में हुआ है या गैर-भाजपा सरकारों के राज्य में.यदि भाजपा शासित राज्यों में बलात्कार हुआ है तब तो प्रगतिशीलों की बाँछें खिल जाती हैं. क्योंकि इस “कम्युनल रेप” के द्वारा यह सिद्ध करने का मौका मिलता है कि भाजपा शासित राज्यों में क़ानून-व्यवस्था नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है. यदि बलात्कार किसी सेकुलर राज्य में हुआ हो, तो यहाँ फिर इसके दो भाग होते हैं, पहले भाग में यह देखा जाता है कि रेप पीड़ित लड़की हिन्दू है या गैर-हिन्दू. यदि लड़की हिन्दू हुई और आरोपी कोई सेकुलर किस्म का शांतिदूत हुआ तो मामला खत्म, कोई प्रगतिशील अथवा महिला संगठन उसके पक्ष में आवाज़ नहीं उठाएगा, यह होता है “सेकुलर रेप”. यदि वह लड़की गैर हिन्दू हुई तो यह देखा जाता है कि वह दलित है या अल्पसंख्यक और आरोपित कौन है. यदि आरोपी पुनः सेकुलर व्यक्ति निकला तो भूल जाईये कि कोई रेप हुआ था.लेकिन यदि रेपिस्ट कोई हिन्दू हुआ, तो ना सिर्फ उसका नाम जोर-जोर से चैनलों पर लिया जाएगा, बल्कि यह सिद्ध करने की पूरी कोशिश होगी कि किस तरह हिन्दू संस्कृति में बलात्कार जायज़ होता था, हिन्दू मर्द स्वभावगत बलात्कारी होते हैं आदि. 

यदि बलात्कार गैर-भाजपा शासित राज्य में हुआ है और आरोपी सेकुलर अथवा मुस्लिम है, तो लड़की पर ही आरोप मढ़ा जाएगा और उसे बदचलन साबित करने की कोशिश होगी, और यदि बलात्कार करने वाला हिन्दू है तो गरियाने के लिए भारतीय संस्कृति तो है ही. इसी प्रकार यदि बलात्कार भाजपा शासित राज्य में हुआ हो, आरोपी भी हिन्दू हो तो समूची भारतीय संस्कृति को बदकार साबित करना होता है, उस घटना को अल्पसंख्यकों पर भारी अत्याचार कहकर चित्रित किया जाता है तथा तमाम चैनलों पर कम से कम दस दिन बहस चलाई जाती है, यह होता है “कम्युनल रेप”. कहते हैं कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है, यही स्थिति सेकुलर-कम्युनल बलात्कार के बारे में भी है. सवाल उठता है कि बलात्कार जैसे घृणित अपराध को धार्मिक रंग और राजनैतिक ट्विस्ट कैसे दिया जाता है, औरयह मानसिकता शुरू कैसे होती है. यह इन दो प्रगतिशील महिलाओं के ट्वीट्स पढ़कर समझ में आ जाता है. 

पहला ट्वीट है आदर्श लिबरल (Adarsh Liberal) प्रगतिशील मालिनी पार्थसारथी का, जिसमें हिन्दू महिलाओं की मंगलसूत्र परम्परा को वे पाखण्ड और पुरुष सत्तात्मक प्रतीकात्मकता बताती हैं... जबकि दूसरे ट्वीट में मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को वे हिन्दू पुरुषों के डर से अपनाई गई "परंपरा"बता रही हैं. 



दूसरा ट्वीट भी एक और प्रगतिशील महिला कविता कृष्णन जी का है. बेहद आधुनिक विचारों वाली महिला हैं, बहुत सारे NGOs चलाती हैं और आए दिन टीवी चैनलों पर महिला अधिकारों पर जमकर चिल्लाती हैं. फिलहाल वे टाईम्स नाऊ के अर्नब गोस्वामी से नाराज़ चल रही हैं, क्योंकि अर्नब ने सरेआम इनकी वैचारिक कंगाली को बेनकाब कर दिया था, और इन्हें देशद्रोही कहा). बहरहाल, देखिये ट्वीट में मोहतरमा कितनी गिरी हुई हरकत कर रही हैं. इसमें एक तरफ वे कहती हैं कि मुम्बई के गैंगरेप को "धार्मिक रंग"देने की कोशिश हो रही है फिर घोषणा करती हैं कि "Rape has no Religion". परन्तु अपने ही एक और ट्वीट में प्रगतिशीलता का बुर्का फाड़ते हुए "कंधमाल में हिन्दू दलित लड़की और संघ परिवार"का नाम ले लेती हैं... तात्पर्य यह है कि सेकुलर-प्रगतिशील मानसिकता के कारण ही भारत में बलात्कार के दो प्रकार हैं - सेकुलर रेप और कम्युनल रेप. 



अब अंत में संक्षेप में आपको एक-दो उदाहरण देकर समझाता हूँ कि सेक्युलर रेप क्या होता है और कम्युनल रेप कैसा होता है. पहला उदाहरण है पश्चिम बंगाल में एक नन के साथ लूट और बलात्कार का मामला. आपने देखा होगा कि किस तरह न सिर्फ आरोपियों के नाम छिपाए गए, बल्कि नन के उस संदिग्ध बलात्कार के कई झोलझाल किस्म के तथ्यों की ठीक से जाँच भी नहीं हुई. लेकिन ना सिर्फ इसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया, बल्कि यहाँ कोलकाता और दिल्ली में मोमबत्ती मार्च भी आयोजित हो गए.. यानी रेप हुआ कोलकाता में, आरोपी पाए गए अवैध बांग्लादेशी... लेकिन छाती कूटी जा रही है भाजपा के नाम पर... यह है “साम्प्रदायिक बलात्कार”. वहीं उसी बंगाल में रामकृष्ण मिशन की दो साध्वियों के साथ भी बलात्कार हुआ, क्या आपको पता चला??किसी चैनल पर आपने किसी हिन्दू संगठन की कोई आवाज़ सुनी? क्या कोई मोमबत्ती मार्च निकला? नहीं... क्योंकि यह एक सेकुलर रेप है. इसमें हिन्दू साध्वी के साथ हुए बलात्कार को पूरी तरह निरस्त करने का प्रगतिशील फैशन है. इसी प्रकार जब बीबीसी की फिल्म मेकर लेस्ली उड़विन भारत के तिहाड़ में घुसकर फिल्म बना लेती है तो ना सिर्फ पीडिता का, बल्कि उसके माता-पिता का और आरोपी मुकेश का नाम सरेआम उजागर कर दिया जाता है. पहचान उजागर कर दी जाती है, क्योंकि ये सांप्रदायिक लोग हैं, लेकिन जिस नाबालिग(???) आरोपी ने निर्भया की आँतें बाहर निकाली थीं और जो क़ानून के पतली गली एवं सेकुलर मानवाधिकार गिरोह की वजह से फिलहाल चित्रकारी और मौज-मजे कर रहा है, उस “मोहम्मद अफरोज” का नाम जानबूझकर छिपा लिया जाता है, उसके माँ-बाप का चेहरा नहीं दिखाया जाता... यह “सेकुलर रेप” का ही एक प्रकार है.... 


तो मित्रों, अधिक न लिखते हुए भी आप समझ ही गए होंगे कि "सेकुलर रेप"क्या होता है और "कम्युनल रेप"कैसा होता है... तो अगली बार से ख़बरों पर ध्यान बनाए रखिए, मोमबत्ती गैंगकी हरकतों और महिला अत्याचार के नाम पर सहानुभूति (यानी विदेशों से मोटा चन्दा) हासिल करने वालों पर भी निगाह बनाए रखियेगा... फिर आप इस खेल को और भी गहरे समझ सकेंगे... 

जय जय... 

Bharti Singh - The Chinese Bamboo

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बच्चे नहीं, बल्कि प्रतिभा परीक्षण का हमारा "सिस्टम"खराब है... 

(प्रस्तुत पोस्ट भाई Ajit Singh - https://www.facebook.com/SinghCorpt की फेसबुक वाल से साभार ली गई है. अजीत सिंह एक मस्तमौला लेखक हैं जो दिल से लिखते हैं तथा अपनी लेखनी में हिन्दी शब्दों की शुद्धता अथवा व्याकरण आदि की कतई परवाह नहीं करते. अजीत सिंह, माहपुर में "मुसहर"बच्चों के लिए अपने NGO "उदयन"के तहत एक स्कूल भी चलाते हैं... मैं अजीत सिंह जी की इस पोस्ट को बिना किसी सुधार के जस का तस रहने देना चाहता हूँ, ताकि अन्य पाठक भी देखें-समझे-जानें कि लिखने के लिए भाषा की नहीं "दिल"की जरूरत होती है, हिन्दी-अंग्रेजी की खिचड़ी, देशज शब्दों के उपयोग के सहारे भी कोई शानदार लेख लिख सकता है, उसके लिए किसी को लेखक होना जरूरी नहीं है, बस आँखें-कान खुले हों और मन में तड़प हो). 
पूरा पढ़िए और एक सच्चाई से रू-ब-रू होने का आनंद लीजिए... 


सावधान, आपके आसपास ज़मीन में चाईनीज बाँस गड़े हुए हैं. 
दोस्तों........अपने लेख कई बार मैं एक कहानी सुना के शुरू करता हूँ जो ज़्यादातर काल्पनिक होती है ....आज फिर एक कहानी सुना रहा हूँ ,,,,,पर ये काल्पनिक नहीं है. यह एक सच्ची घटना है .........काफी पुरानी बात है ...एक लड़की थी ........बचपन में एकदम सामान्य ........सामान्य से घर में जन्मी थी .अक्सर बीमार रहती थी .....बचपन में पैर जल गए ...महीनों बिस्तर में पड़ी रही ....dull सी personality थी ......स्कूल जाने लगी ......पढने में शुरू से ही dull थी ....बाकी activities में भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी .........सो ऐसे बच्चों को स्कूल में भी कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता ..........वो अक्सर back benchers बन के रह जाते हैं ...स्कूल के गुमनाम चेहरे ........तो साहब उसके जीवन में शुरू से ही एक सिलसिला शुरू हो गया ....fail होने का ......हर टेस्ट में fail .....क्लास टेस्ट में ...fail ....unit टेस्ट में fail ....half yearly ....fail ...annual exam ...fail ....अब CBSE बोर्ड की कोई policy है शायद की पांचवीं तक किसी को fail नहीं करना है ...उसे अगली क्लास में promote कर देना है ...... सो वो fail होते होते 6th में पहुँच गयी ........अब साहब fail होना तो उसका जैसे trade mark हो गया था सो वो 6th में भी fail हो गयी ......

इस बीच ऐसा भी नहीं था की घर वालों ने कोई कोशिश नहीं की ...पर तमाम कोशिशों का कोई रिजल्ट नहीं निकला ....और ये भी नहीं की स्कूल वालों का कोई दुराग्रह था क्योंकि स्कूल तो उसका हर 2 या 3 साल में बदल जाता था ....खैर जब 6th में भी फेल हो गयी तो इस बार promotion नहीं हुआ ...उसी क्लास में रोक दी गयी ......घर वालों ने हाथ पाँव जोड़ के किसी तरह अगली क्लास में promote कराया .......और इसी तरह वो लुढ़कते पुढ़कते .......consistently and persistently ....हर एक टेस्ट में fail होती हुआती 10th में पहुँच गयी .......अब CBSE बोर्ड के exam में कौन सी सिफारिश चलनी थी सो वहां भी उसने असफलता का झंडा गाड़ दिया .....यानी 10th में भी फेल.......... 

अब आप ये बताइये की क्या किया जा सकता है ..........एक बच्चा जो लगातार 10 साल तक रोजाना fail हुआ उसका क्या किया जा सकता है .....कभी सोच के देखा है ????????? 10th fail लड़की का क्या future होता है ....आइये मैं बताता हूँ...
१) वो 11th में admission नहीं ले सकती .इसलिए BA का भी कोई चांस नहीं ......
२) वो सारी जिंदगी 10th fail कहलाएगी .
३) उसे कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी .....चपरासी की भी नहीं .....अब तो फ़ौज में भी भर्ती नहीं हो सकती ...वहां भी 10th पास मांगते हैं .....
४) उसकी शादी किसी अच्छे, पढ़े लिखे well settled लड़के से नहीं होगी .... अजी 10th फ़ैल लड़की से कौन शादी करना चाहता है आजकल .....
५) कहने का मतलब उसका future ख़तम ......

आइये अब ये देखते हैं की ऐसे बच्चे ,जो की पढ़ाई में dull होते हैं उनके साथ क्या होता है समाज में ........रोज़ रोज़ का तिरस्कार .....teachers की रोज़ रोज़ की डांट फटकार ...कई बार तो मार पीट .....हर रोज़ हर subject में failure का ठप्पा ......ऊपर से घर में डांट .... उन्हें पूरी तरह नकारा ...निकम्मा ...कामचोर ....नालायक ....मान लिया जाता है ........सहपाठियों द्वारा तिरस्कार ,दुत्कार ....ऐसे बच्चों से अक्सर तेज़ तर्रार बच्चे कोई मेल मिलाप नहीं रखते .......और वो और ज्यादा dull होते चले जाते हैं .......उन्हें एक ऐसे सिस्टम ने failure ...नकारा घोषित किया है जो की एक फूल प्रूफ सिस्टम माना जाता है ........जो हर साल लाखों करोड़ों बच्चों का मूल्यांकन करता है ...सैकड़ों साल पुराना एक जांचा परखा सिस्टम है .......अब आप यूँ समझ लीजिये की जौहरियों की एक संस्था जो हर साल लाखों पत्थरों का मूल्यांकन करती है ,उसने एक पत्थर का 10 साल मूल्यांकन कर के उसे पत्थर घोषित कर दिया और बाकियों को हीरा तो ऐसी संस्था के ऊपर शक भी कैसे किया जा सकता है .......तो साहब अब आप कल्पना कीजिये की उस लड़की का क्या हुआ होगा .... ज्यादातर लोग यही कहेंगे की शादी कर के बच्चे पाल रही होगी ........ 

तो सुनिए साहब ....जिस दिन उस लड़की को certified नाकारा यानि failure ....... घोषित किया गया ,उसके ठीक 10 साल बाद वो लड़की राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में ....हिन्दुस्तान की नामचीन और महान हस्तियों की तालियों की गडगडाहट के बीच , अपने क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट सेवाओं और उपलब्धियों के लिए ...देश का सबसे बड़ा पुरस्कार ,खुद महामहिम राष्ट्रपति जी के हाथों से प्राप्त कर रही थी .......उस लड़की का नाम है भारती सिंह ......और उसे मैं इसलिए जानता हूँ क्योंकि वो मेरी सगी छोटी बहन है ..........और मैंने उसे प्रतिदिन ......असफलता से आगे निकल कर सफलता की बुलंदियों तक पहुँचते देखा है .......भारती ने 1996 में भारत का sports का सर्वोच्च पुरस्कार ..."अर्जुन पुरस्कार"प्राप्त किया और वो अपने करियर में विश्व के सबसे महान weightlifters में गिनी गयीं ...और उन्होंने world championship और Asian games में कई पदक जीते ......Olympics में उन दिनों Women Weightlifting नहीं थी ....नहीं तो वहां भी मेडल जीतती .उन्होंने हाल ही में CISF से ASSISTANT COMMANDANT के पद से Voluntary Retirement लिया है ...अगर वो अपनी पूरी नौकरी करती तो शायद DIG या IG बन के retire होतीं ......अब सोचने वाली बात ये है की आखिर गड़बड़ कहाँ हुई इस कहानी में ...और भारती सिंह की लाइफ में turning point कहाँ से आया . 


गौर से देखने पर पता लगता है की वो जीवन में कभी भी एक dull या failure बच्चा नहीं थी ...दरअसल हमारा सिस्टम उसको गलत पैमाने से नाप रहा था .........अब साहब अगर आपको Quadratic Equation ...और Trignometry नहीं आती तो आप fail .......अगर आप लिखने में Spelling Mistake करते हैं तो आप fail .....सूर्य ग्रहण कैसे लगता है ... ये आपने रटा नहीं है तो आप fail .......फिर आपमें चाहे जितनी भी प्रतिभा है ....चाहे आप किसी अन्य field में विश्व की महानतम हस्ती बनने की क्षमता रखते हों ..........पर चूंकि आपको quadratic equation नहीं आती इसलिए आप फेल ...और आपका future ख़तम .......हमारे education system ने तो आपको fail यानी नकारा घोषित कर दिया है .......अब आप ऐसा करो सब्जी की रेड़ी लगा लो सड़क पे.. 


(चित्र में बाँए से तीसरी भारती सिंह... अर्जुन सिंह एवं राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के साथ)

कायदे से होना तो ये चाहिए कि सिस्टम उस बच्चे का मूल्यांकन करे और यह बताये की बेशक इस बच्चे को Trignometry नहीं आती ..और ये Shakespeare के नाटकों पर निबंध नहीं लिख सकता ...पर इसमें ... xyz field में अपार क्षमता है लिहाजा इसे 10th में पास किया जाता है और आगे पढने की इजाज़त दी जाती है ...इसे आगे इस इस field में पढाई करनी चाहिए ...... अब मुझे आप ये बताइये की भारती सिंह के केस में ...भारती सिंह fail हुई या भारती सिंह का मूल्यांकन करने में हमारा education system fail हुआ ..... दरअसल भारती सिंह तो एक विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं ...पर उस प्रतिभा को पहचानने में हमारे अकादमिक महारथी और हमारा अकादमिक सिस्टम fail हो गए और खामखाह 10 साल तक उस बेचारी बच्ची को परेशान करते रहे ...उसे दुत्कारते रहे ..........अब ये तो उसकी हिम्मत थी की उसने हार नहीं मानी और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करती रही और एक दिन दुनिया के शीर्ष पर विराजमान हुई .......पर न जाने ऐसी कितनी भारती सिंह होंगी इस दुनिया में जिसे ये सिस्टम अपने पैरों तले कुचल देता है.

यहाँ एक बात मैं और साफ़ कर देना चाहता हूँ की अपने Professional Career में भारती ने सिर्फ sports में ही excell नहीं किया बल्कि हर field में टॉप किया ..........कॉलेज से BA किया 2nd division ...बढ़िया अंग्रेजी बोलती है .........फिर CISF में सब इंस्पेक्टर के पद पर ज्वाइन किया और promotion ले कर Assistant Commandant तक पहुंची .......300 से 500 मर्दों की कंपनी को सफलता पूर्वक कमांड किया .....लखनऊ .जोधपुर और दिल्ली के International Airports की security की incharge रही और इस दौरान लीडरशिप की मिसाल पेश की ....अपने करियर के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे cases solve किये जहाँ उनकी intelligence को देख के उनके senior officers दंग रह गए, CISF की ट्रेनिंग की passing out parade में बेस्ट कैडेट घोषित हुई और परेड को command किया .......1 किलोमीटर लम्बे मैदान में हजारों Dignitries की भीड़ के सामने 1500 officers को command देना कोई हंसी खेल नहीं होता ....अच्छे अच्छों की टांगें कांपने लगती हैं ......जब वो retirement लेने लगी तो उनके एक senior ऑफिसर ने कहा था की आप गलती कर रही हैं ...अगर आप पूरी नौकरी करेंगी तो IG बन के retire होंगी .........विचारणीय विषय ये है की हमारे education system ने शुरू में ऐसी विलक्षण प्रतिभा को पहचानने में चूक कैसे कर दी ........क्या ये सिस्टम ऐसी ही हज़ारों लाखों प्रतिभाएं हर साल नष्ट कर रहा है ......मैं अक्सर ये प्रश्न अपने व्याख्यानों में उठता हूँ ........तो कुछ लोग इसका ये जवाब देते हैं की आप जिस सिस्टम की इतनी आलोचना कर रहे हैं वही सिस्टम विश्व स्तरीय प्रतिभाएं पैदा भी तो कर रहा है ....तो इसका जवाब ये है मेरे दोस्त ...की खराब से खराब सिस्टम भी कुछ results तो देता ही है ....100 किलो सरसों में 35 किलो तेल निकलना ही चाहिए ........अब अगर एक कोल्हू 20 किलो निकालता है तो आप उसे 20 किलो के लिए शाबाशी देंगे या उससे उस 15 किलो का हिसाब मांगेंगे जो waste हो गया.


यहाँ मैं ये बता दूं की इस success स्टोरी में उनके parents का क्या role रहा ....पहले तो उन्होंने उसे किसी तरह (व्याख्या करने की ज़रुरत नहीं है ) 10th पास कराया .अब चूंकि उसका maths और science से पिंड छूट गया इसलिए आगे पढ़ाई में कोई समस्या नहीं हुई .दुसरे जब उसे इतने सालों तक नाकारा घोषित किया जाता था तब उसके parents रोजाना ground में ये सिद्ध करते थे की देखो ...you are the best ...तुम तो यहाँ दौड़ में लड़कों को भी हरा देती हो ...you are the best ......तुम तो एक दिन world champion बनोगी ........और वो रोज़ इसी तरह जीतती रही ...रोज़ शाम को उसके लिए तालियाँ बजती थीं ......शाम को वो दिन भर का अपमान और तिरस्कार भूल जाती थी .........और इसी तरह धीरे धीरे ..एक दिन वो सचमुच world champion बन गयी ...... ज़रा कल्पना करें ...अगर उसके parents भी स्कूल वालों की तरह उसे नाकारा मान लेते तो ??

Moral of the Story

1 ) अगर आपका बच्चा आज पढने में कमजोर है तो ,निराश न हों .......वो कल का Thomas Alva Edison हो सकता है .

2 ) सब बच्चों को 9 नंबर का जूता पहना के मत दौड़ाओ ...........भाई मेरे सबके पाँव छोटे बड़े होते हैं .......आखिर एक ही question paper और एक ही syllabus से सारे देश के बच्चों का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है .......
3 ) 20 किस्म का बीज एक साथ खेत में डाल दोगे ...तो ध्यान रखो सबका जमाव एक साथ नहीं होगा .........मूंग तीसरे दिन जम जाएगी ,आम १५ दिन बाद निकलेगा ,सूरन ( जिमीकंद, yam ) दो महीने बाद जमेगा और chinese bamboo ...... 2 साल बाद निकलेगा ... इसलिए आपको कोई हक़ नहीं की आप उस बेचारे Chinese Bamboo को निकम्मा ,नाकारा या failure घोषित करें ......क्योकि आपको पता होना चाहिए की Chinese Bamboo बेशक शुरू में थोडा ज्यादा टाइम लेता है Germination में ,पर जिस दिन वो जमीन तोड़ के ऊपर आ जाता है तो सिर्फ 7 हफ्ते में 40 फुट लम्बा हो जाता है ........
सावधान : कृपया ध्यान दीजिये .....आपके इर्द गिर्द ज़मीन में ,आपके घर में , स्कूल में या समाज में .........कुछ Chinese Bamboo गड़े हो सकते हैं ....कृपया उन्हें अपने पैरों तले न कुचलें .......क्योंकि एक दिन वो जमीन तोड़ के बहार आने वाले हैं... 

है ना अदभुत... तो अकेले-अकेले मत पढ़िए... इसे दूसरे मित्रों से शेयर कीजिए..

What is Rest in Peace (RIP)

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ये "रिप-रिप-रिप-रिप"क्या है? 


आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIPलिखने का "फैशन"चल पड़ा है. ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ, या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं...

RIP शब्द का अर्थ होता है "Rest in Peace" (शान्ति से आराम करो). यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो. क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी "जजमेंट डे"अथवा "क़यामत का दिन"आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे... अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में "शान्ति से आराम करो".


लेकिन हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है.हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके "Rest in Peace"का सवाल ही नहीं उठता. हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/काया/शरीर/नवजात में प्रवेश कर जाती है... उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं. अतः किसी हिन्दू मृतात्मा हेतु "विनम्र श्रद्धांजलि", "श्रद्धांजलि", "आत्मा को सदगति प्रदान करें"जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए. जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु पर उनके लिए RIP लिखा जा सकता है...

होता यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी "शॉर्टकट(?)अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दू मृत्यु पर भी "RIP"ठोंक आते हैं... यह विशुद्ध "अज्ञान और जल्दबाजी"है, इसके अलावा कुछ नहीं... अतः कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो एवं हम लोग "दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि"प्रदान करें... ना कि उसे RIP (apart) करें. मूल बात यह है कि चूँकि अंग्रेजी शब्द SOUL का हिन्दी अनुवाद "आत्मा"नहीं हो सकता, इसलिए स्वाभाविक रूप से "RIP और श्रद्धांजलि"दोनों का अर्थ भी पूर्णरूप से भिन्न है.


धार्मिक अज्ञान एवं संस्कार-परम्पराओं के प्रति उपेक्षा की यही पराकाष्ठा, अक्सर हमें ईद अथवा क्रिसमस पर देखने को मिलती है, जब अपने किसी ईसाई मित्र अथवा मुस्लिम मित्र को बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ देना तो तार्किक एवं व्यावहारिक रूप से समझ में आता है, लेकिन "दो हिन्दू मित्र"आपस में एक-दूसरे को ईद की शुभकामनाएँ अथवा "दो हिन्दू मित्रानियाँ"आपस में क्रिसमस केक बाँटती फिरती रहें... अथवा क्रिसमस ट्री सजाने एक-दूसरे के घर जाएँ, तो समझिए कि निश्चित ही कोई गंभीर"बौद्धिक-सांस्कारिक गडबड़ी"है...

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"हिन्दू श्मशान एवं शवयात्रा"पर बहुत समय पहले तीन भागों में लेख लिखे थे... यदि वाकई समझना चाहते हों तो इन लेखों को भी पढ़ें...

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_06.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_07.html


What is the Mystery of Oregon Sriyantra

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अमेरिका के ओरेगॉन का रहस्यमयी श्रीयंत्र


इडाहो एयर नेशनल गार्ड का पायलट बिल मिलर 10 अगस्त 1990 को अपनी नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था. अचानक उसने ओरेगॉन प्रांत की एक सूखी हुई झील की रेत पर कोई विचित्र आकृति देखी. यह आकृति लगभग चौथाई मील लंबी-चौड़ी और सतह में लगभग तीन इंच गहरे धंसी हुई थी. बिल मिलर चौंका, क्योंकि लगभग तीस मिनट पहले ही उसने इस मार्ग से उड़ान भरी थी तब उसे ऐसी कोई आकृति नहीं दिखाई दी थी. उसके अलावा कई अन्य पायलट भी इसी मार्ग से लगातार उड़ान भरते थे, उन्होंने भी कभी इस विशाल आकृति के निर्माण की प्रक्रिया अथवा इसे बनाने वालों को कभी नहीं देखा था. आकृति का आकार इतना बड़ा था, कि ऐसा संभव ही नहीं कि पायलटों की निगाह से चूक जाए.

 


(9000 फुट की ऊँचाई से दिखाई देती है ऐसी आकृति) 

सेना में लेफ्टिनेंट पद पर कार्यरत बिल मिलर ने तत्काल इसकी रिपोर्ट अपने उच्चाधिकारियों को दी, कि ओरेगॉन प्रांत की सिटी ऑफ बर्न्स से सत्तर मील दूर सूखी हुई झील की चट्टानों पर कोई रहस्यमयी आकृति दिखाई दे रही है. मिलर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह आकृति अपने आकार और लकीरों की बनावट से किसी मशीन की आकृति प्रतीत होती है. इस खबर को लगभग तीस दिनों तक आम जनता से छिपाकर रखा गया, कि कहीं उस स्थान पर भीडभाड ना हो जाए. लेकिन फिर भी 12 सितम्बर 1990 को प्रेस को इसके बारे में पता चल ही गया. सबसे पहले बोईस टीवी स्टेशन ने इसकी ब्रेकिंग न्यूज़ दर्शकों को दी. जैसे ही लोगों ने उस आकृति को देखा तो तत्काल ही समझ गए कि यह हिन्दू धर्म का पवित्र चिन्ह “श्रीयंत्र” है. परन्तु किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि हिन्दू आध्यात्मिक यन्त्र की विशाल आकृति ओरेगॉन के उस वीरान स्थल पर कैसे और क्यों आई? 

(श्रीयंत्र आकृति की एकदम सटीक लोकेशन इस प्रकार है) 

14 सितम्बर को अमेरिका असोसिएटेड प्रेस तथा ओरेगॉन की बैण्ड बुलेटिन ने भी प्रमुखता से दिखाया और इस पर चर्चाएं होने लगीं. समाचार पत्रों ने शहर के विख्यात वास्तुविदों एवं इंजीनियरों से संपर्क किया तो उन्होंने भी इस आकृति पर जबरदस्त आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी बड़ी आकृति को बनाने के लिए यदि जमीन का सिर्फ सर्वे भर किया जाए तब भी कम से कम एक लाख डॉलर का खर्च आएगा. श्रीयंत्र की बेहद जटिल संरचना और उसकी कठिन डिजाइन को देखते हुए जब इसे सादे कागज़ पर बनाना ही मुश्किल होता है तो सूखी झील में आधे मील की लम्बाई-चौड़ाई में जमीन पर इस डिजाइन को बनाना तो बेहद ही मुश्किल और लंबा काम है, यह विशाल आकृति रातोंरात नहीं बनाई जा सकती.इस व्यावहारिक निष्कर्ष से अंदाजा लगाया गया कि निश्चित ही यह मनुष्य की कृति नहीं है.

तमाम माथापच्ची के बाद यह निष्कर्ष इसलिए भी निकाला गया, क्योंकि जितनी विशाल यह आकृति थी, और इसकी रचना एवं निश्चित पंक्तियों की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए इसे जमीन पर खड़े रहकर बनाना संभव ही नहीं था. बल्कि यह आकृति को जमीन पर खड़े होकर पूरी देखी भी नहीं जा सकती थी, इसे पूरा देखने के लिए सैकड़ों फुट की ऊँचाई चाहिए थी. अंततः तमाम विद्वान, प्रोफ़ेसर, आस्तिक-नास्तिक, अन्य धर्मों के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि निश्चित ही यह आकृति किसी रहस्यमयी घटना का नतीजा है. फिर भी वैज्ञानिकों की शंका दूर नहीं हुई तो UFO पर रिसर्च करने वालेदो वैज्ञानिक डोन न्यूमन और एलेन डेकर ने 15 सितम्बर को इस आकृति वाले स्थान का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस आकृति के आसपास उन्हें किसी मशीन अथवा टायरों के निशान आदि दिखाई नहीं दिए,बल्कि उनकी खुद की बड़ी स्टेशन वैगन के पहियों के निशान उन चट्टानों और रेत पर तुरंत आ गए थे.

ओरेगॉन विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेम्स देदरोफ़ ने इस अदभुत घटना पर UFO तथा परावैज्ञानिक शक्तियों से सम्बन्धित एक रिसर्च पेपर भी लिखा जो “ए सिम्बल ऑन द ओरेगॉन डेज़र्ट” के नाम से 1991 में प्रकाशित हुआ. अपने रिसर्च पेपर में वे लिखते हैं कि अमेरिकी सरकार अंत तक अपने नागरिकों को इस दैवीय घटना के बारे कोई ठोस जानकारी नहीं दे सकी, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि श्रीयंत्र की वह विशाल आकृति वहाँ बनी कैसे? कई नास्तिकतावादी इस कहानी को झूठा और श्रीयंत्र की आकृति को मानव द्वारा बनाया हुआ सिद्ध करने की कोशिश करने वहाँ जुटे. लेकिन अपने तमाम संसाधनों, ट्रैक्टर, हल, रस्सी, मीटर, नापने के लिए बड़े-बड़े स्केल आदि के बावजूद उस श्रीयंत्र की आकृति से आधी आकृति भी ठीक से और सीधी नहीं बना सके. 


आज भी वह आकृति रहस्य ही बनी हुई है... वैज्ञानिक उस पर अपनी रिसर्च जारी रखे हुए हैं.

Anti Modi Propaganda and Secular Intellectuals in India

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विकास एजेंडे को पीछे करती दुष्प्रचार की दुर्गन्ध...

गत दिनों एक सामूहिक चर्चा के दौरान कुछ युवाओं ने मुझसे शिकायत की, कि नरेंद्र मोदी तो तेजी से अपने आर्थिक एजेंडे, विदेश नीति एवं विकास की राजनीति को बढ़ाने में लगे हुए हैं, ताकि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और युवाओं को रोजगार मिले, लेकिन विभिन्न चर्चों पर लगातार “हिन्दूवादियों” द्वारा किए जा रहे हमलों के कारण देश की छवि भी खराब हो रही है और अंदरूनी माहौल पर भी बुरा असर पड़ रहा है... इसे जल्द से जल्द रोकना होगा. उस समय मैंने स्पष्टीकरण देने की कोशिश की, परन्तु मीडिया का “प्रभाव” (?) इतना ज्यादा है कि उन युवाओं को यह भरोसा दिलाना कठिन था कि चर्च पर हुए तमाम हमलों की सच्चाई कुछ और है.

जैसा कि सभी जानते हैं स्वतन्त्र मीडिया एक दोधारी तलवार की तरह होता है. यदि इसकी कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं तो कुछ अधिकार भी होते हैं. भारत के मुख्यधारा के मीडिया के सन्दर्भ में यह बात अर्धसत्य है. यहाँ मीडिया सिर्फ अपने अधिकारों की बात करता है, जिम्मेदारी की नहीं. ऊपर से इस मीडिया को सेकुलर-प्रगतिशील “कहे जाने वाले” एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों का पूर्ण आर्थिक, नैतिक, वैचारिक और राजनैतिक समर्थन हासिल है. इस कारण स्थिति “करेला, वह भी नीम चढ़ा” जैसी हो गई है... इसीलिएहमारा तथाकथित “नेशनल” मीडिया दिल्ली के किसी मामूली से चर्च की दो खिडकियों के काँच फूटने अथवा छोटी-मोटी चोरी को “चर्च पर हमला”, “हिन्दूवादियों की करतूत”, “अल्पसंख्यकों में आक्रोश” जैसी ब्रेकिंग न्यूज़ तो चलाता है ताकि TRP हासिल हो, लेकिन यही मीडिया उन घटनाओं के हल होने के बाद यह कभी नहीं बताता कि चर्च की खिड़कियाँ फोड़ने वाले शराबी भी ईसाई ही थे और दूसरे चर्च में चोरी करने वाला चोर भी उसी चर्च का कर्मचारी था, जो वेतन नहीं मिलने से नाराज था... मीडिया को यह दूसरा पक्ष दिखाना ही नहीं है, क्योंकि उसका स्वार्थ सिद्ध हो चुका है.चाहे जैसे भी हो नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करो... चाहे जो भी हो नरेंद्र मोदी के भाषणों में कोई विवादास्पद मुद्दा खोजो... चाहे कुछ भी करना पड़े, मोदी सरकार के मंत्रियों के खिलाफ आलोचना एवं दुष्प्रचार जारी रखो... यही इनका मूल एजेंडा है. 


क्या यह महज संयोग है कि जब भी नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर जाते हैं, तभी भारत में किसी चर्च पर हमला होता है. फिर अचानक अमेरिका सरकार की सार्वजनिक नसीहत भी सुनाई देती है और इधर दिल्ली में मोमबत्ती मार्च भी होता है. इसीलिए जब-जब दिल्ली-आगरा-मुम्बई आदि स्थानों पर चर्च हमले अथवा मूर्ति तोड़ने जैसे मामले सामने आते हैं, तब-तब मीडिया को “सेकुलर हिस्टीरिया” के दौरे पड़ने शुरू हो जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि चर्च पर हमले, आज़म-आज़मी-ओवैसी के जहरीले बयान, मीडिया द्वारा भाजपा अथवा मोदी के बयानों को तोड़मरोड़ कर पेश करना... ध्यान से देखें तो इन घटनाओं में एक “निश्चित पैटर्न” है.

फरवरी 2015 में जब बीबीसी की संवाददाता लेस्ली उडविन ने तिहाड़ जेल जाकर निर्भया बलात्कार मामले में सजायाफ्ता मुकेश सिंह से मुलाक़ात कर उसका इंटरव्यू बीबीसी पर दिखाया था, उस समय भी यही बौद्धिक षड्यंत्र काम कर रहा था कि, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि “बलात्कारियों के देश” के रूप में बनाने की पूरी कोशिश की जाए. ज़ाहिर है कि मोदी सरकार द्वारा NGOs पर लगाम कसने तथा भ्रष्टाचार के तमाम रास्ते धीरे-धीरे बन्द करते जाने एवं विकासवादी एजेंडे को लागू किए जाने के कारण विपक्षी खेमे में बौखलाहट का माहौल है. अभी तक पिछले एक वर्ष में दिल्ली विधानसभा चुनावों को छोड़कर लगभग सभी चुनावों में मोदी की लोकप्रियता बरकरार दिखी है और भाजपा ने चुनाव जीते हैं. इसीलिए काँग्रेस, जनता परिवार, NGOs “गिरोह” तथा बुद्धि बेचकर जीविका कमाने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवियों में भारी बेचैनी है और अब वे दुष्प्रचार के जरिये मोदी सरकार पर हमले किए जा रहे हैं, और इस काम में इन्हें काँग्रेस और मिशनरी का पूरा सहयोग प्राप्त हो रहा है. जैसा किविश्व भर के तमाम उदाहरण बताते हैं कि मिशनरी संस्थाएँ दुष्प्रचार के मामले में बेहद निपुण और संसाधन सम्पन्न हैं.

मिशनरी संस्थाओं की संगठित शक्ति येन-केन-प्रकारेण नरेंद्र मोदी सरकार की छवि को आम जनमानस तथा विदेशों में बदनाम और बदरंग करने के लिए कमर कसे हुए है. मीडिया के साथ मिली-जुली संयुक्त शक्ति द्वारा समूचे विश्व में यह बात फैलाई जा रही है कि भारत में एक “हिन्दू-सरकार” है, जो सिर्फ हिंदुओं के हित देखती है और अल्पसंख्यकों पर भारी अत्याचार हो रहे हैं. इसीलिए पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश में हजारों हिन्दू महिलाओं पर रोज़ाना हो रहे बलात्कारों के बारे में भारत का कोई चैनल अथवा अखबार जनता को सच्चाई नहीं बताता, परन्तु पश्चिम बंगाल के दूरदराज इलाके में एक वृद्ध नन के साथ हुई लूटपाट को “नन के साथ बलात्कार” कहकर इतना जबरदस्त कवरेज मिलता है कि पश्चिमी देशों की कुछ सरकारें भी इस पर अपने चिंता व्यक्त कर देती है... और जब जाँच में यह पता चलता है कि उस वृद्धा नन के साथ कोई बलात्कार हुआ ही नहीं था, अपितु यह एक सामान्य लूटपाट की घटना थी तथा लूटपाट करने वाले भी किसी हिन्दू संगठन के सदस्य नहीं बल्कि बांग्लादेश से आए हुए अवैध मुस्लिम घुसपैठिये थे, तो मीडिया ने तत्काल इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया.

सामान्य तथ्य है कि दृश्य माध्यमों का प्रभाव (बल्कि दुष्प्रभाव कहना अधिक उचित होगा) ज्यादा पड़ता है, बजाय प्रिंट माध्यम के. इसीलिए भारत के टीवी चैनल “पीड़ितों”(?) को अधिकाधिक नाटकीय बनाकर पेश करने की कोशिश करते हैं. पीड़ित अथवा बलात्कृत महिला के मामले में भी यह देखा जाता है कि महिला किस जाति अथवा धर्म की है. इसीलिएदूरदराज के किसी इलाके में हुए बलात्कार की खबर अचानक राष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है. सिर्फ दिल्ली में पिछले एक वर्ष में २५६ मंदिरों में चोरी, मूर्तियों से छेड़छाड़ आदि के मामले हुए हैं, लेकिन क्या किसी ने भी इनके बारे में कथित नेशनल मीडिया में कोई खबर देखी? अथवा किसी हिन्दू संगठन को मोमबत्ती लेकर प्रदर्शन करते देखा? परन्तु दिल्ली के किसी मामूली से चर्च की चार खिड़कियों के कांच फूटना अथवा किसी शराबी कर्मचारी द्वारा अपने ही चर्च में चोरी की घटना को अन्तर्राष्ट्रीय रंग मिल जाता है...जब तक जाँच नहीं होती, तब तक सेकुलरिज़्म के पुरोधा बलात्कार को धर्म से जोड़कर हिन्दू धर्म (अर्थात प्रकारांतर से मोदी सरकार) पर लगातार हमले बोलते हैं, लेकिन जब जाँच के बाद यह पता चलता है कि पूरी घटना में किसी हिन्दू संगठन का हाथ नहीं था, बल्कि यह कोई अंदरूनी घटना थी या इसमें किसी मुस्लिम व्यक्ति का ही हाथ था, तो अचानक सभी बुद्धिजीवी चुप्पी साध लेते हैं. जब अधिक कुरेदा जाता है तो बड़े दार्शनिक अंदाज में कह दिया जाता है कि “अपराधी का कोई धर्म नहीं होता..”... यही असली पेंच है.

सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा महाराष्ट्र और हरियाणा सरकारों द्वारा गौहत्या बंदी क़ानून तथा गौमांस पर प्रतिबन्ध के खिलाफ भी यही “बदनाम करो... पीड़ित दर्शाओ” का खेल खेला गया. भारत के तेजी से घटते गौवंश की सुरक्षा एवं हिंदुओं की पूज्य गौ की हत्या से उत्पन्न आक्रोश के कारण जब महाराष्ट्र की सरकार ने “बीफ” पर प्रतिबन्ध की घोषणा की, तो मानो तूफ़ान ही आ गया. सारे के सारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को अचानक गरीबों के प्रोटीन की चिंता सताने लगी... भोजन के अधिकार याद आने लगे... कुरैशी समुदाय के आर्थिक हितों के बारे में बौद्धिक विमर्श होने लगे. मजे की बात यह कि इस मामले में मुस्लिमों की तरफ से कोई धरना-प्रदर्शन आदि आयोजित नहीं हुआ, बल्कि उच्चवर्गीय कहे जाने वाले कथित हिन्दू सेलेब्रिटी ही आगे बढ़चढ़कर भाजपा सरकारों के खिलाफ धार्मिक भेदभाव के आरोप लगाने लगे. गिरीश कर्नाड जैसे कथित बुद्धिजीवी ने तो सरेआम गौमांस खाकर सरकार के खिलाफ नाराजगी व्यक्त कर डाली, मानो वे बचपन से गौमांस खाकर ही बड़े हुए हों. वास्तव में इन बुद्धिजीवियों को गौमांस के प्रोटीन अथवा गरीबों की कतई चिंता नहीं है, इनका असली उद्देश्य था देश-विदेश में भाजपा सरकारों की छवि खराब करना, यह प्रचारित करना कि मोदी सरकार मुस्लिम एवं ईसाई विरोधी है... क्योंकि जहाँ एक तरफ मुस्लिम समुदाय बीफ कारोबार से गहरे जुड़ा हुआ है, वहीं केरल, तमिलनाडु, आंधप्रदेश, गोवा के ईसाई परिवारों में गौमांस उनके नियमित भोजन का हिस्सा है. भले ही वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका हो कि बीफ (गौमांस) का निर्माण करने में पानी की खपत सर्वाधिक होती है, भले ही यह साबित हो चुका हो कि बीफ के मुकाबले सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है... फिर भी गौमांस पर प्रतिबन्ध के खिलाफ सर्वाधिक हल्ला मचाया गया क्योंकि इससे सेकुलरिज़्म के पुरोधाओं का अपने विदेशी आकाओं की निगाह में स्कोर बढ़ता है और फडनवीस और खट्टर सरकारों के खिलाफ हमला बोलने का मौका भी बार-बार मिलता रहता है. हालाँकि दोनों ही सरकारें फिलहाल इस निर्णय पर कायम हैं, इसलिए महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों से गौवंश की तस्करी भी थमी है. कसाईयों ने धीरे-धीरे अपने लिए दुसरे काम खोजने शुरू कर दिए हैं और उधर सुदूर बांग्लादेश में गौमांस की कीमतें आसमान छूने लगी हैं क्योंकि अब पश्चिम बंगाल तक अवैध गौवंश पहुँच ही नहीं रहा... लेकिन भारत में सेक्यूलरिज्म के नाम पर इस प्रकार की नौटंकियाँ सतत जारी रहती हैं.

कहावत है कि धूर्त दावा करते हैं और मूर्ख उसे मान लेते हैं. भारत में ऐसा ही कुछ “सेक्यूलरिज्म” के नाम पर भी होता आया है. विश्व के अन्य देशों में सेक्यूलरिज्म का अर्थ है “धर्म को राजनीति से अलग रखना” और इस परिभाषा का उद्भव भी पश्चिम में ही हुआ. लेकिन जो मुस्लिम संगठन अरब देशों में सेक्यूलरिज़्म का “स” भी नहीं उच्चारते वे भारत में सेक्यूलरिज़्म की माला जपते हैं. यही हाल ईसाई संगठनों का है, पश्चिम में चर्च और वेटिकन प्रत्येक राजनैतिक मामले में अपनी पूरी दखल रखते हैं (यहाँ तक कि भारत में भी केरल, उड़ीसा में कई मामलों में चर्च ने खुद अपने “सेक्यूलर उम्मीदवार” तय किए हैं). लेकिन यही ईसाई संगठन भारत में सेक्यूलरिज्म के पुरोधा बने फिरते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि भारत में सेक्यूलरिज़्म की अवधारणा “हिन्दू विरोधी विचारधारा” के रूप में है. हिन्दू धर्म, हिंदुत्व, हिन्दू परम्पराओं, हिन्दू विश्वासों-अंधविश्वासों के खिलाफ जो भी अधिकाधिक जोरशोर से चिल्लाएगा, उसे भारत में सेक्यूलर माना जाएगा... परन्तु यह नियम विश्व के इस्लामी-ईसाई देशों में लागू नहीं होता. ज़ाहिर है कि कोई भी ईसाई अथवा मुस्लिम कभी सेक्यूलर हो ही नहीं सकता. इसलिए जब हम सेक्यूलर शब्द का उच्चारण करते हैं तो वह वास्तव में जन्मना हिन्दू के लिए ही होता है जिसके मन में भारतीय परम्पराओं एवं हिन्दू धर्म के प्रति संशय की भावना बलवती है.

इस नकली सेक्यूलरिज़्म का ही दबाव है कि जब मिशनरी संस्थाएँ बाकायदा सुसंगठित अभियान के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सरकारों को बदनाम करती हैं, चर्चों पर “कथित हमलों” अथवा “नन के साथ बलात्कार” अथवा “ग्राहम स्टेंस की हत्या” के खिलाफ हाहाकाल मचाती हैं तो सरकार मजबूती से कभी यह नहीं पूछती कि इन तमाम हमलों में कोई वैचारिक कोण नहीं है, ये सिर्फ चोरी-लूटपाट की सामान्य घटनाएँ हैं तो इन्हें धर्म से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?उलटे वह सार्वजनिक रूप से आश्वासन देती है कि “चर्च पर हुए हमलों” के प्रति सख्त दृष्टिकोण अपनाएगी... ऐसा करके भाजपा खुद अपने ही शत्रुओं के जाल में फँस जाती है. यही दब्बूपन कश्मीर मसले पर भी होता आया है. पाकिस्तान से जोर देकर पाक अधिकृत कश्मीर खाली करने को कहना हो, अथवा पाक अधिकृत कश्मीर का कुछ हिस्सा चीन को सौंपने के के विरोध में दबाव बनाना हो अथवा बलूचिस्तान में आत्मनिर्णय की माँग को हवा देना हो... भारत की सरकारें दब्बूपन की शिकार रही हैं.


सेक्यूलरिज़्म के नाम पर चल रहे इसी अन्तर्राष्ट्रीय “गेम” का एक हिस्सा है स्मृति ईरानी पर लगातार हमले तथा दीनानाथ बत्रा का कड़ा विरोध. स्मृति ईरानी के मानव संसाधन मंत्रालय संभालने के पहले दिन से ही वे कथित बुद्धिजीवियों की आँखों का काँटा बनी हुई हैं. स्मृति ईरानी को लेकर सतत मीडिया में विवाद पैदा किए जाते रहे हैं, चाहे वह उनके ज्योतिषी को हाथ दिखाने वाला मामला हो अथवा गोवा के स्टोर में छिपा हुआ कैमरा पकड़ने का मामला हो अथवा विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों तथा भारतीय इतिहास संकलन एवं अन्य संस्थानों में नियुक्ति का विवाद हो... बारम्बार स्मृति ईरानी को निशाना बनाया जाता रहा है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अब इन कथित सेक्यूलर बुद्धिजीवियों को लग रहा है कि अगले पाँच वर्ष में कुछ ऐसा बदलाव आ सकता है जो इनके पिछले साठ वर्षों के झूठ, दुष्प्रचार और इतिहास को विकृत करने के षड्यंत्र की पोल खोलकर रख देगा. एक बार भारतीय जनमानस को उसके वैभवशाली इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी हो गई तो वह हनुमान की तरह उठ खड़ा होगा. यही बात प्रगतिशील बुद्धिजीवी नहीं चाहते. सेक्यूलरिज़्म के नाम पर अभी तक अकबर को महान और राणा प्रताप को भगोड़ा कहा जाता रहा है, तात्या टोपे अथवा चाफेकर जैसे वीरों की तो बात ही छोडिये, छत्रपति शिवाजी महाराज को भी जानबूझकर पुस्तकों में वह स्थान नहीं दिया गया, स्वतन्त्र भारत में जिसके वे हकदार हैं. यह पराजित मानसिकता और गुलामगिरी के पाठ्यक्रमों को बदलने की कवायद शुरू करने के कारण ही स्मृति ईरानी और दीनानाथ बत्रा दोनों ही वामपंथी बुद्धिजीवियों के निशाने पर रहे हैं.

अंग्रेज लेखिका वेन्डी डोनिगर द्वारा हिन्दू धर्म की दुराग्रही आलोचना हो, बीबीसी की संवाददाता लेस्ली उडविन द्वारा निर्भया के बलात्कारी मुकेश सिंह का चेहरा-नाम सार्वजनिक किया जाना, लेकिन चालबाजी के साथ “कथित” नाबालिग, लेकिन दुर्दांत आरोपी मोहम्मद अफरोज का नाम और उसके परिवार की पहचान छिपाते हुए पूरी डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन कुछ इस प्रकार करना कि सभी भारतीय मर्द बलात्कारी दिखाई दें... फिर चर्चों पर “कथित हमले” या नन के साथ कथित बलात्कार की मीडियाई चीख-पुकार हों... देखने में भले ही यह सब कड़ियाँ अलग-अलग दिखाई दे रही हों, परन्तु वास्तव में यह सब एक ही छतरी के नीचे से संचालित हो रही हैं. सनद रहे कि मैंने “कथित हमले” शब्द का उपयोग इसलिए किया क्योंकि ना तो इन हमलों(?) में कोई घायल हुआ, ना ही इन हमलों(?) में चर्च का कोई कर्मचारी अथवा पादरी मारा गया, मीडिया द्वारा बहुप्रचारित धार्मिक रंग देने के इन प्रयासों में किसी किसी हिन्दू संगठन द्वारा किसी बिशप पर कोई प्राणघातक हमला नहीं हुआ... जबकि उधर केन्या में एक मुस्लिम आतंकवादी संगठन ने एक कॉलेज में बाकायदा धर्म पूछ-पूछकर सौ से अधिक ईसाई युवकों को गोलियों से भून दिया, परन्तु वेटिकन को उस तरफ झाँकने की भी फुर्सत नहीं मिली. ज़ाहिर है कि जिससे “माल” मिल रहा है और जहाँ “माल” कमाया जा रहा है, उसी के अनुसार ख़बरें बनाई, गढी और प्लांट की जाएँगी.

जिस समय नरेंद्र मोदी सरकार ने कश्मीर में PDP के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया था, वह बहुत सोच-समझकर ली गई “कैलकुलेटेड रिस्क” थी. सरकार बनने के पहले दिन से ही मोदी विरोधी प्रोपोगेंडा चलाने वालों ने मुफ्ती-मोदी के इस मिलन की खिल्ली उड़ाना शुरू कर दी थी. यह एक स्वाभाविक सी बात थी, क्योंकि घाटी में पहली बार कोई ऐसी सरकार बनी है, जिसमें भाजपा-संघ की सीधी हिस्सेदारी है. भला यह बात दिल्ली में बैठे बुद्धिजीवियों को कैसे हजम होती? जिसे अंग्रेजी में “टीथिंग पेन्स” (बच्चों को दाँत निकलने वाला दर्द) कहते हैं, फिलहाल वैसा ही वैसा ही कश्मीर की सरकार के साथ भी हो रहा है और यह प्रत्येक सरकार के साथ होता है.पिछली दो अब्दुल्ला-काँग्रेस सरकारों ने मसर्रत आलम के खिलाफ कभी कोई मजबूत केस नहीं बनाया. ज़ाहिर है कि कोर्ट के आदेशों के बाद उसे छोड़ना पड़ा. मसर्रत की रिहाई मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों के लिए अंधे के हाथ बटेर जैसी लगी. तमाम चैनलों-अखबारों में मोदी-मुफ्ती सरकार के इस निर्णय की छीछालेदार हुई, आलोचनाएं की गईं, लेकिन किसी भी बुद्धिजीवी ने यह नहीं पूछा कि पिछली सरकारों ने मसर्रत के खिलाफ कमज़ोर धाराएं क्यों लगाईं कि वह न्यायालय द्वारा बरी कर दिया जाए?और फिर जैसा कि होना था, वही हुआ. मसर्रत ने जेल से रिहा होते ही अपने रंग दिखाने शुरू किए. मोदी-मुफ्ती सरकार भी उसे ढील देती रही, झाँसा देती रही कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, उसे गलतियाँ करने के लिए पूरा मौका दिया गया. इससे मसर्रत _अति-आत्मविश्वास” और “अति-उत्साह” में आ गया तथा उसने एक रैली में न सिर्फ भारत विरोधी नारे लगाए, बल्कि पाकिस्तान के झण्डे भी लहराए... एक बार पुनः मोदी विरोधियों को “कोहराम” मचाने का मौका मिल गया. मसर्रत को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो की चीख-पुकार होने लगी. मोदी-मुफ्ती सरकार इसी मौके की तलाश में थी, उसने मसर्रत को गिरफ्तार कर लिया. अब दिल्ली के बुद्धिजीवियों में चारों तरफ सन्नाटा है, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जब खुद ही गिरफ्तारी की माँग की थी तो अब विरोध कैसे करें? फिर सदाबहार दिग्गी राजा सामने आए और सरकार से पूछा कि “मसर्रत साहब”(?) को किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है? यदि उस समय रिहा होते ही मसर्रत को गिरफ्तार कर लेते तो उसे सहानुभूति भी मिल सकती थी, ज़ाहिर है कि अब मसर्रत को लंबे समय तक जेल में रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी. बहरहाल, अब जम्मू-कश्मीर में भाजपा की टांग प्रत्येक निर्णय में फँसी हुई है, जो सेकुलरों को रास नहीं आ रहा. कश्मीरी पंडितों के मामले पर भी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है, इसीलिए यासीन मालिक और अग्निवेश जैसे लोग बेचैन हैं. पाखण्ड की इन्तहा यह है कि जिन लोगों ने इस्लाम के नाम पर पंडितों को वहाँ से बेदखल किया, हत्याओं की अगुआई की अब वही लोग पंडितों की अलग कालोनी बसाने का विरोध कर रहे हैं, भाई-चारे के झूठे नारे लगा रहे हैं... क्या यह “अच्छे दिन” नहीं हैं? परन्तु मोदी सरकार विरोधी दुष्प्रचारियों की “Paid” सेना को यह मंजूर नहीं, अब कुछ दिनों बाद वह कोई नया मुद्दा खोजेंगे.

उधर उत्तरप्रदेश और बिहार में भी “राजनैतिक तंदूर” गरम होना शुरू हो गया है, इसीलिए आज़म खान की सेकुलर कारगुजारियों की भी शुरुआत हो चुकी है. इसके अलावा नए-नए समधी बने मुलायम-लालू की जोड़ी ने समूचे जनता परिवार को हाईजैक करके खुद का कब्ज़ा लगभग स्थापित कर लिया है. समाजवादियों के इस झगड़ालू और “पीठ में खंजर घोंपने की प्रवृत्ति” से भरपूर जमावड़े को समाजवादी जैसा कुछ नाम भी मिल गया है. इधर 59 दिन गुमनामी बाबा बने रहने के बाद अचानक “राजकुमार” की वापसी हुई है जिसे “दुष्प्रचारी बुद्धिजीवी गिरोह” ने बुद्ध की वापसी जैसी हास्यास्पद तुलना तक कर डाली है. साठ वर्ष तक सत्ता में रहने और जमाई राजा द्वारा DLF के साथ मिलकर जमीन हड़पने वाले फाईव स्टार किसानों की पार्टी काँग्रेस को अब अचानक किसानों की चिंता सताने लगी है. चूँकि भूमि अधिग्रहण बिल के मुद्दे पर मोदी सरकार राज्यसभा में अल्पमत में घिरी हुई है इसलिए फिलहाल वह फूँक-फूँककर कदम रख रही है, और विरोधी इसे कमज़ोरी और हार कहकर खुश हो रहे हैं. ज़ाहिर है कि मोदी की सफल विदेश यात्राओं तथा घरेलू विकास के मुद्दों पर बढ़ती लोकप्रियता के बीच भूमि अधिग्रहण का यही एक मुद्दा रह गया है जो यूपी-बिहार में काँग्रेस और क्षेत्रीय दलों की खोई हुई जमीन वापस लौटा सकता है. मीडिया, मिशनरी और NGOs “गिरोह” की मिलीभगत से किसानों के फायदे वाले इस क़ानून को लेकर जमकर झूठ बोला जा रहा है. जब नितिन गड़करी ने सोनिया गाँधी को भूमि अधिग्रहण बिल पर सार्वजनिक बहस की चुनौती दी तो दुष्प्रचारी गिरोह ने उसे नज़रअंदाज कर दिया, लेकिन जैसे ही बैंकाक से “आत्मचिंतन”(??) करके लौटे बाबा ने संसद में अपना (दस साल में शायद दूसरा या तीसरा) भाषण दिया तो सभी “दरबारी”, जय हो महाराज, जय हो महाराज करने लगे. कुल मिलाकर बात यह है कि अभी मोदी सरकार को एक वर्ष भी नहीं हुआ है, लेकिन विभिन्न गुटों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. मोदी सरकार सुभाषचंद्र बोस के रहस्यों को उजागर करने जैसे कई महत्त्वपूर्ण “राजनैतिक” मुद्दों पर चुपचाप काम कर रही है और इसके नतीजे जल्दी ही देखने को मिलेंगे. 


हाल ही में गुजरात सरकार ने फोर्ड फाउन्डेशन और तीस्ता सीतलवाड की मिलीभगत एवं झूठ व दुष्प्रचार फैलाने के मामले में आधिकारिक रूप से फोर्ड फाउन्डेशन से जवाब-तलब किया है. जबकि इधर केन्द्र सरकार ने “ग्रीनपीस” नामक जाने-माने अन्तर्राष्ट्रीय NGO के हिसाब-किताब की जाँच हेतु कार्रवाई आरम्भ की है. ज़ाहिर है कि सेकुलर-प्रगतिशील खेमे में खलबली है, क्योंकि इन दोनों ही परजीवियों का पेट NGOs को मिले चन्दे से ही चलता है. हाल ही में एक शोध किया गया जिसमें UPA-2 सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत सरकार के FCRA (विदेशी मुद्रा विनियमन क़ानून) के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं की जानकारी निकाली गई. समूचे भारत में सिर्फ बाईस हजार संस्थाओं ने FC-6 फॉर्म के माध्यम से संस्था को मिली रकम का ब्यौरा दिया है. जबकि इनके अलावा कम से कम दो लाख संस्थाएँ और भी ऐसी हैं जिन्होंने अपनी संस्था का पंजीकरण “समाजसेवा” के नाम पर करवा रखा है और इसमें धार्मिक कोण को गायब कर दिया है. यदि हम इन सिर्फ बाईस हजार संस्थाओं के आँकड़े भी ध्यान से देखें तो पाते हैं कि 5200 संस्थाएँ ऐसी हैं जिन्होंने घोषित रूप से अपने कॉलम में “ईसाई धर्म प्रचार” लिखा हुआ है, अर्थात विदेशी मुद्रा प्राप्त करने वाली कुल संस्थाओं में से कुल लगभग बीस-बाईस प्रतिशत सिर्फ “ईसाई” संस्थाएँ हैं. ऐसा क्यों है? क्या भारत में ईसाई धर्म प्रचार करने का मार्केट इतना जबरदस्त है? सिर्फ दिल्ली में लगभग 200 संस्थाएं हैं जिन्हें लगभग छः सौ करोड़ रूपए से अधिक का विदेशी “दान”(??) प्राप्त हुआ है. सवाल उठता है कि क्या वास्तव में इतना सारा धन सिर्फ धर्म प्रचार में लगता है? सामान्य समझ का कोई भी व्यक्ति कह देगा कि नहीं, यह पैसा निश्चित रूप से विभिन्न चैनलों के माध्यम से शहरी मीडिया एवं प्रचार संस्थानों, ग्रामीण क्षेत्रों में दुष्प्रचार फैलाने तथा स्कूलों-अस्पतालों की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में काम आता है. यह इसी बात से सिद्ध होता है कि जैसे ही फोर्ड फाउन्डेशन से सरकार ने जवाबतलबी की, तो यहाँ भारत में कई कथित पत्रकारों के पेट में मरोड़ उठने लगे. कोर्ट के निर्देशों के अनुसार फोर्ड फाउन्डेशन अथवा गुजरात दंगों के समय सुप्रीम कोर्ट में लगातार झूठ बोलने वाली तथा दंगापीड़ितों का पैसा खा जाने वाली तीस्ता सीतलवाड के बैंक खातों और लेन-देन की जाँच से भला किसी को क्या तकलीफ हो सकती है? इसी प्रकार जब “ग्रीन-पीस” नामक भारी-भरकम NGO से जवाब माँगे गए, तब भी एक पत्रकारों की विशिष्ट लॉबी ने यह दुष्प्रचार किया कि सरकार बदले की कार्रवाई कर रही है. फोर्ड फाउन्डेशन ने सन 2006 में 104 संस्थाओं को 41 करोड़ रूपए, 2007 में 128 संस्थाओं को 75 करोड़ रूपए गरीबी मिटाने के नाम पर “दान”(?) दिए... इस प्रकार UPA-2 के शासनकाल में 2006-2012 के छः वर्षों में फोर्ड फाउन्डेशन ने लगभग पाँच सौ करोड़ रूपए भारत की सैकड़ों समाजसेवी संस्थाओं को चन्दा दिया. सवाल घूम-फिरकर वही आता है कि क्या वाकई उक्त संस्थाएँ समाजसेवा कर रही हैं? क्या फोर्ड फाउन्डेशन इतना बड़ा समाजसेवी है कि वह अपने दिए हुए धन का उपयोग, सदुपयोग, दुरुपयोग आदि के बारे में पूछताछ नहीं करता? यदि नहीं करता, तो भारत के नियम-कानूनों के अनुसार इस विशाल फंडिंग की जाँच की शुरुआत करते ही भारत सरकार के खिलाफ अचानक यह दुष्प्रचार क्यों आरम्भ हो जाता है? और बुद्धिजीवियों से असली सवाल यह है कि अपने देश की सरकार पर भरोसा करने की बजाय, विदेशी संस्थाओं से यह कैसा प्रेम और गठबंधन है?

प्रधानमंत्री सड़कों की बात करते हैं तो “कथित रूप से दस लाख के सूट” का झूठा मुद्दा उछल जाता है, प्रधानमंत्री बिजली उत्पादन और परमाणु समझौतों की बात करते हैं तो अचानक किसी नामालूम सी साध्वी के किसी दूरदराज इलाके में दिए गए बयानों को हेडलाईन बनाकर चार दिनों तक चबाया जाता है... मानव संसाधन मंत्री शिक्षा और पाठ्यक्रम में सुधार की बात करें तो उन्हें संसद में ही अपमानित कर दिया जाए... जनरल वीके सिंह हिम्मत दिखाकर युद्धग्रस्त यमन से पाँच हजार भारतीयों को निकाल लाएँ तो उनकी तारीफ़ करना तो दूर उनकी पाकिस्तानी दूतावास संबंधी ट्वीट को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया जाता है. अब समय आ गया है कि सरकार NGOs, मिशनरी संस्थाओं, मीडिया में घुसे बैठे चंद स्वार्थी तत्त्वों और शैक्षणिक संस्थाओं में पनाह लिए हुए बुद्धिजीवियों के इस नापाक गठबंधन के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करे.

Baji Rao Peshwa - The Great Maratha Warrior

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अदभुत योद्धा... बाजीराव पेशवा 

(भाई विशाल अग्रवाल की फेसबुक वाल से साभार ग्रहण).

 विश्व इतिहास, कई सारी महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने दूसरों द्वारा अपने को नष्ट करने के लिए किये गये विभिन्न आक्रमणों और प्रयासों को सहा है। यद्यपि इसके चलते इसने वीरों और योद्धाओं की एक लंबी शृंखला उत्पन्न की है, जो आक्रान्ताओं से अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए समय-समय पर उठ खड़े हुए हैं। भारत के इतिहास में एक ऐसे ही महान योद्धा और हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में प्रख्यात नाम है- 18वीं शताब्दी में उत्पन्न बाजीराव पेशवा। अपने अद्वितीय पराक्रम द्वारा ‘राव के नाम से सभी को डराने वाले’ ऐसी धाक निर्माण करनेवाले, मात्र बीस वर्ष की कार्यकाल में धुआंधार पराक्रम के नए–नए अध्याय रचने वाले, विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख किलोमीटर की घुडदौड करने वाले, ‘देवदत्त सेनानी’ ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने वाले, तथा मराठा साम्राज्य की धाक संपूर्ण हिंदुस्थान पर निर्माण करने वालेइन्हीं ज्येष्ठ बाजीराव पेशवाजी का 28 अप्रैल को निर्वाण दिवस है।


जैसा कि हम जानते हैं कि विजयनगर राज्य के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा व्यवस्थित तरीके से स्थापित हिंदू पद पादशाही के अंतर्गत एक नवीन हिंदू राज्य का पुनर्जन्म किया गया, जिसने पेशवाओं के समय में एक व्यापक आकार ले लिया। इसी "पेशवा"पद को एक नई उँचाई तक ले जाने वाले कोंकण क्षेत्र के प्रतिष्ठित और पारंपरिक चितपावन ब्राह्मण परिवार के बालाजी विश्वनाथ राव के सबसे बड़े पुत्र के रूप में बाजीराव का जन्म 18 अगस्त 1700 ई. को हुआ था। बालाजी विश्वनाथ (बाजीराव के पिता) यद्यपि पेशवाओं में तीसरे थे लेकिन जहाँ तक उपलब्धियों की बात है, वे अपने पूर्ववर्तियों से काफी आगे निकल गये थे।


इस प्रकार बाजीराव जन्म से ही समृद्ध विरासत वाले थे। बाजीराव को उन मराठा अश्वारोही सेना के सेनापतियों द्वारा भली प्रकार प्रशिक्षित किया गया था, जिन्हें 27 वर्ष के युद्ध का अनुभव था। माता की अनुपस्थिति में किशोर बाजीराव के लिए उनके पिता ही सबसे निकट थे, जिन्हें राजनीति का चलता-फिरता विद्यालय कहा जाता था। अपनी किशोरावस्था में भी बाजीराव ने शायद ही अपने पिता के किसी सैन्य अभियान को नजदीक से न देखा हो जिसके चलते बाजीराव को सैन्य विज्ञान में परिपक्वता हासिल हो गई। बाजीराव के जीवन में पिता बालाजी की भूमिका वैसी ही थी, जैसी छत्रपति शिवाजी के जीवन में माता जीजाबाई की। 1716 में जब महाराजा शाहू जी के सेनाध्यक्ष दाभाजी थोराट ने छलपूर्वक पेशवा बालाजी को गिरफ्तार कर लिया, तब बाजीराव ने अपने गिरफ्तार पिता का ही साथ चुना, जब तक कि वह कारागार से मुक्त न हो गए। बाजीराव ने अपने पिता के कारावास की अवधि के दौरान दी गई सभी यातनाओं को अपने ऊपर भी झेला और दाभाजी के छल से दो-चार होकर नितांत नए अनुभव प्राप्त किये।

कारावास के बाद के अपने जीवन में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा-मुगल संबंधों के इतिहास में नया आयाम स्थापित किया। किशोर बाजीराव उन सभी विकासों के चश्मदीद गवाह थे। 1718 ई. में उन्होंने अपने पिता के साथ दिल्ली की यात्रा की जहाँ उनका सामना अकल्पनीय षडयंत्रों से हुआ, जिसने उन्हें शीघ्र ही राजनीतिक साजिशों के कुटिल रास्ते पर चलना सीखा दिया। यह और अन्य दूसरे अनुभवों ने उनकी युवा ऊर्जा, दूरदृष्टि और कौशल को निखारने में अत्यन्त सहायता की, जिसके चलते उन्होंने उस स्थान को पाया जिसपर वह पहुँचना चाहते थे।वह एक स्वाभाविक नेता थे, जो अपना उदाहरण स्वयं स्थापित करने में विश्वास रखते थे। युद्ध क्षेत्र में घोड़े को दौड़ाते हुए मराठों के अत्यधिक वर्तुलाकार दंडपट्ट तलवार का प्रयोग करते हुए अपने कौशल द्वारा अपनी सेना को प्रेरित करते थे।

वो 2 अप्रैल 1719 का दिन था, जब पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने अपनी अंतिम साँसे ली। ऐसे में सतारा शाही दरबार में एकत्रित विभिन्न मराठा शक्तियों के जेहन में केवल एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था कि क्या दिवंगत पेशवा का मात्र १९ वर्षीय गैर-अनुभवी पुत्र बाजीराव इस सर्वोच्च पद को सँभाल पाएगा? वहाँ इस बात को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचनाओं का दौर चल रहा था कि क्या इतने अल्प वयस्क किशोर को यह पद दिया जा सकता है? ऐसे में मानवीय गुणों की परख के महान जौहरी महाराजा शाहू ने इस प्रश्न का उत्तर देने में तनिक भी देर नहीं लगाई और तुरंत ही बाजीराव को नया पेशवा नियुक्त करने की घोषणा कर दी जिसे शीघ्र ही एक शाही समारोह में परिवर्तित कर दिया गया।

17 अप्रैल 1719 को तलवारबाजी में दक्ष, निपुण घुड़सवार, सर्वोत्तम रणनीतिकार और नेता के रूप में प्रख्यात बाजीराव प्रथम ने मात्र बीस वर्ष की आयु में शाही औपचारिकताओं के साथ पेशवा का पद ग्रहण किया। उन्हें यह उच्च प्रतिष्ठित पद आनुवंशिक उत्तराधिकार या उनके स्वर्गीय पिता के द्वारा किये गये महान कार्यों के फलस्वरूप नहीं दिया गया, अपितु उनकी राजनैतिक दूरदर्शिता से युक्त दृढ़ मानसिक और शारीरिक संरचना के कारण सौपा गया। इसके बावजूद भी कुछ कुलीन जन और मंत्री थे, जो बाजीराव के खिलाफ अपने ईर्ष्या को छुपा नहीं पा रहे थे परन्तु बाजीराव ने राजा के निर्णय के औचित्य को गलत ठहराने का एक भी अवसर अपने विरोधियों को नहीं दिया, और इस प्रकार अपने विरोधियों का मुँह को बंद करने में वह सफल रहे। 


(मध्यप्रदेश के सनावद में स्थित है बाजीराव पेशवा की समाधि)

बाजीराव का शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य या "हिंदू पद पादशाही"के उदात्त स्वप्न में अटूट विश्वास था और इस स्वप्न को मूर्त रूप देने हेतु अपने विचारों को छत्रपति शाहू के दरबार में रखने का उन्होंने निश्चय किया। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोर हो रही स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिए शाहू महाराज को उत्साहित करने के लिए कहा कि -'आइये हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखायें तो स्वयं ही गिर जायेंगी, हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेगी।'इसके उत्तर में शाहू ने कहा था कि, 'निश्चित रूप से ही आप इसे हिमालय के पार गाड़ देगें, क्योंकि आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं।'

छत्रपति शाहू ने धीरे धीरे राज-काज से अपने को क़रीब-क़रीब अलग कर लिया और मराठा साम्राज्य के प्रशासन का पूरा काम पेशवा बाजीराव पर सौंप दिया। उन्होंने वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी और छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को पूरा करने के लिए उन्हें हर मार्ग अपनाने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। बाजीराव की महान सफलता में, उनके महाराज का उचित निर्णय और युद्ध की बाजी को अपने पक्ष में करने वाले उनके अनुभवी सैनिकों का बड़ा योगदान था। इस प्रकार उनके निरंतर के विजय अभियानों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठा सेना की वीरता का लोहा मनवा दिया जिससे शत्रु पक्ष मराठा सेना का नाम सुनते ही भय व आतंक से ग्रस्त हो जाता था।

बाजीराव का विजय अभियान सर्वप्रथम दक्कन के निजाम निजामुलमुल्क को परास्त कर आरम्भ हुआ जो मराठों के बीच मतभेद के द्वारा फूट पैदा कर रहा था। 7 मार्च, 1728 को पालखेड़ा के संघर्ष में निजाम को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और ‘मुगी शिवगांव’ संधि के लिए बाध्य होना पड़ा जिसकी शर्ते कुछ इस प्रकार थीं-शाहू को चौथ तथा सरदेशमुखी देना, शम्भू की किसी तरह से सहायता न करना, जीते गये प्रदेशों को वापस करना एवं युद्ध के समय बन्दी बनाये गये लोगों को छोड़ देना आदि। 1731 में एक बार पुनः निज़ाम को परास्त कर उसके साथ की गयी एक सन्धि के द्वारा पेशवा को उत्तर भारत में अपनी शक्ति का प्रसार करने की छूट मिल गयी। बाजीराव प्रथम का अब महाराष्ट्र में कोई भी प्रतिद्वन्द्वी नहीं रह गया था और राजा शाहू का उनके ऊपर केवल नाम मात्र नियंत्रण था।

दक्कन के बाद गुजरात तथा मालवा जीतने के प्रयास में बाजीराव प्रथम को सफलता मिली तथा इन प्रान्तों में भी मराठों को चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ। ‘बुन्देलखण्ड’ की विजय बाजीराव की सर्वाधिक महान विजय में से मानी जाती है। मुहम्मद खां वंगश, जो बुन्देला नरेश छत्रसाल को पूर्णतया समाप्त करना चाहता था, के प्रयत्नों पर बाजीराव प्रथम ने छत्रसाल के सहयोग से 1728 ई. में पानी फेर दिया और साथ ही मुगलों द्वारा छीने गये प्रदेशों को छत्रसाल को वापस करवाया। कृतज्ञ छत्रसाल ने पेशवा की शान में एक दरबार का आयोजन किया तथा काल्पी, सागर, झांसी और हद्यनगर पेशवा को निजी जागीर के रूप में भेंट किया।

बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था। यह कहा जाता है कि मुगल बादशाह उनसे इस हद तक आतंकित हो गया था कि उसने बाजीराव से प्रत्यक्षतः मिलने से इंकार कर दिया था और उनकी उपस्थिति में बैठने से भी उसे डर लगता था।मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था। बाजीराव की राजनीतिक बुद्धिमता उनकी राजपूत नीति में निहित थी। वे राजपूत राज्यों और मुगल शासकों के पूर्व समर्थकों के साथ टकराव से बचते थे, और इस प्रकार उन्होंने मराठों और राजपूतों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करते हुए एक नये युग का सूत्रपात किया। उन राजपूत राज्यों में शामिल थे- बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि।

खतरनाक रूप से दिल्ली की ओर बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए सुल्तान ने एक बार फिर पराजित निजाम से सहायता की याचना की। बाजीराव ने फिर से उसे घेर लिया। इस कार्य ने दिल्ली दरबार में बाजीराव की ताकत का एक और अप्रतिम नमूना दिखा दिया। मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध,पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं।

बाजीराव ने 41 से अधिक लड़ाइयाँ लड़ीं और उनमें से किसी में भी वह पराजित नहीं हुए। वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है। पालखेड का युद्ध उनकी नवोन्मेषी युद्ध रणनीतियों का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। कोई भी इस युद्ध के बारे में जानने के बाद उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। भोपाल में निजाम के साथ उनका युद्ध उनकी कुशल युद्ध रणनीतियों और राजनीतिक दृष्टि की परिपक्वता का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है। एक उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, एक जन्मजात नेता और बहादुर सैनिक होने के साथ ही बाजीराव, छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को साकार करने वाले सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।

मशहूर वॉर स्ट्रेटिजिस्ट आज भी अमरीकी सैनिकों को पेशवा बाजीराव द्वारा पालखेड में निजाम के खिलाफ लड़े गए युद्ध में मराठा फौज की अपनाई गयी युद्धनीति सिखाते हैं| ब्रिटेन के दिवंगत सेनाप्रमुख फील्ड मार्शल विसकाउंट मोंटगोमेरी जिन्होने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन्स के दाँत खट्टे किए थे, वे पेशवा बाजीराव से ख़ासे प्रभावित थे उनकी तारीफ वे अपनी किताब 'ए कन्साइस हिस्टरी ऑफ वॉरफेयर'में इन शब्दों में करते हैं -----The Palkhed Campaign of 1728 in which Baji Rao I out-generalled Nizam-ul-Mulk , is a masterpiece of strategic mobility -----British Field Marshall Bernard Law Montgomery, The Concise History of Warfare, 132

अप्रैल 1740 में, जब बाजीराव अपने जागीर के अंदर आने वाले मध्य प्रदेश के खरगौन के रावरखेडी नामक गाँव में अपनी सेना के साथ कूच करने की तैयारी कर रहे थे, तब वे गंभीर रूप से बीमार हो गये और अंततः नर्मदा के तीर पर 28 अप्रैल 1740 को उनका देहावसान हो गया। एक प्रख्यात अंग्रेज इतिहासकार सर रिचर्ड कारनैक टेंपल लिखते हैं, "उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।" 


(बाजीराव पेशवा की समाधि) 

जब बाजीराव ने पेशवा का पद सँभाला था तब मराठों के राज्य की सीमा पश्चिमी भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित थी। 1740 में, उनकी मृत्यु के समय यानि 20 वर्ष बाद में, मराठों ने पश्चिमी और मध्य भारत के एक विशाल हिस्से पर विजय प्राप्त कर लिया था और दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप तक वे हावी हो गये थे। यद्यपि बाजीराव मराठों की भगवा पताका को हिमालय पर फहराने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उनके पुत्र रघुनाथ राव ने1757 ई. में अटक के किले पर भगवा ध्वज को फहराकर और सिंधु नदी को पार कर के अपने पिता को स्वप्न को साकार किया।

निरंतर बिना थके 20 वर्षों तक हिंदवी स्वराज्य स्थापित करने के कारण उन्हें (बाजीराव को) हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पुत्रों बालाजी उर्फ नाना साहेब, रघुनाथ, जनार्दन, उनकी मुस्लिम प्रेमिका मस्तानी से शमशेर बहादुर और छोटे भाई चिमाजी अप्पा के पुत्र सदाशिवराव भाऊ ने भगवा पताका को दिग-दिगंत में फहराने के उनके मिशन को जारी रखते हुए 1758 में उत्तर में अटक के किले पर विजय प्राप्त करते हुए अफगानिस्तान की सीमा को छू लिया, और उसी समय में भारत के दक्षिणी किनारे को भी जीत लिया।लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्कट अभिलाषा की प्रेरणा द्वारा और आधुनिक समय में हिंदुओं को विजय का प्रतीक बनाने के द्वारा वे धर्म की रचनात्मक और विनाशकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे। पेशवा बाजीराव प्रथम अपने जीवन काल में महानायक के रूप में प्रख्यात थे और मृत्यु के बाद भी लोगों के मन उनकी यह छवि उसी प्रकार विद्यमान थी। उनकी उपस्थिति हिंदू जन मानस पर अमिट रूप से अंकित हो चुकी है और इसे समय के अंतराल द्वारा भी खंडित नहीं किया जा सकता।

बाजीराव के बारे में “History of the Marathas” में जे. ग्रांट डफ कहते हैं: "सैनिक और कूटनीतिज्ञ के रूप में लालित और पालित बाजीराव ने कोंकण के ब्राह्मणों को विशिष्ट बनाने वाली दूरदर्शिता और पटुता के माध्यम से शिष्ट तरीके से मराठा प्रमुख के साहस, जोश और वीरता को संगठित रूप दिया।अपने पिता की आर्थिक योजना से पूर्ण परिचित बाजीराव ने एक सामान्य प्रयास द्वारा महाराष्ट्र के विभिन्न जोशीले किन्तु निरुद्देश्य भटकने वाले समुदायों को संगठित करने के लिए उन योजनाओं के कुछ अंशों को प्रत्यक्ष रूप से अमली जामा पहनाया। इस दृष्टिकोण से, बाजीराव की बुद्धिमता ने अपने पिता की अभीप्सित योजनाओं का विस्तार किया; उनके बारे में यह सत्य ही कहा गया है- उनके पास योजना बनाने हेतु एक मस्तिष्क और उसे कार्यान्वित करने हेतु दो हाथ थे, ऐसी प्रतिभा विरले ही ब्राह्मणों में पायी जाती है।

“Oriental Experiences” में सर आर. टेम्पल कहते हैं:"बाजीराव एक उत्कृष्ट घुड़सवार होने के साथ ही (युद्ध क्षेत्र में) हमेशा कार्रवाई करने में अगुआ रहते थे। वे मुश्किल हालातों में सदा अपने को सबसे आगे कर दिया करते थे। वह श्रम के अभ्यस्त थे और अपने सैनिकों के समान कठोर परिश्रम करने में एवं उनकी कठिनाइयों को अपने साथा साझा करने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते थे। राजनैतिक क्षितिज पर बढ़ रहे उनके पुराने शत्रुओं मुसलमानों और नये शत्रुओं यूरोपीय लोगों के खिलाफ उनके अंदर राष्ट्रभक्तिपूर्ण विश्वास के द्वारा हिंदुओं से संबंधित विषयों को लेकर राष्ट्रीय कार्यक्रमों की सफलता हेतु एक ज्वाला धधक रही थी। अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठों के विस्तार को देखना ही उनके जीवन का ध्येय था। उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।

“Peshwa Bajirao I and Maratha Expansion” की प्रस्तुति में जदुनाथ सरकार कहते हैं: "बाजीराव दिव्य प्रतिभा संपन्न एक असाधारण घुड़सवार थे। पेशवाओं के दीर्घकालीन और विशिष्ट प्रभामंडल में अपनी अद्वितीय साहसी और मौलिक प्रतिभा और अनेकानेक अमूल्य उपलब्धियों के कारण बाजीराव बल्लाल का स्थान अतुलनीय था। वह एक राजा या क्रियारत मनुष्य के समान वस्तुतः अश्वारोही सेना के वीर थे। यदि सर राबर्ट वालपोल ने इंग्लैंड के अलिखित संविधान में प्रधानमंत्री के पद को सर्वोच्च महत्ता दिलाई तो बाजीराव ने ऐसा ही तत्कालीन समय के मराठा राज में पेशवा पद के लिए किया।"

यह बाजीराव ही थे जिन्होंने महाराष्ट्र से परे विंध्य के परे जाकर हिंदू साम्राज्य का विस्तार किया और जिसकी गूँज कई सौ वर्षों से भारत पर राज कर रहे मुगलों की राजधानी दिल्ली के कानों तक पहुँच गयी। हिंदू साम्राज्य का निर्माण इसके संस्थापक शिवाजी द्वारा किया, जिसे बाद में बाजीराव द्वारा विस्तारित किया गया, और जो उनकी मृत्यु के बाद उनके बीस वर्षीय पुत्र के शासन काल में चरम पर पहुँचा दिया गया। पंजाब से अफगानों को खदेड़ने के बाद उनके द्वारा भगवा पताका को न केवल अटक की दीवारों पर अपितु उससे कहीं आगे तक फहरा दिया गया। इस प्रकार बाजीराव का नाम भारत के इतिहास में हिंदू धर्म के एक महान योद्धा और सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक के रूप अंकित हो गया... उनके निर्वाण दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि... 

(भाई श्री विशाल अग्रवाल की फेसबुक वाल से साभार) 
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